देश के गृहमंत्री अमित शाह ने आंतरिक सुरक्षा के कई कठिन मोर्चों पर तारीख तय करके काम करने की अपनी शैली दिखाई है. नक्सलवाद के मामले में उन्होंने स्पष्ट समयसीमा दी और दावा किया कि 31 मार्च 2026 तक इसे बड़े पैमाने पर समाप्त कर दिया गया है. पंजाब और पूरे देश में नशे के कारोबार के खिलाफ उन्होंने 31 दिसंबर 2029 की समयसीमा तय की है और कहा है कि इस मोर्चे पर भी वही दृढ़ता दिखाई जाएगी. कश्मीर में अनुच्छेद 370 के बाद की स्थिति को मुख्यधारा में लाने और आतंक के आंकड़ों में कमी लाना किसी से छिपा नहीं है. इन मोर्चों पर राजनीतिक संकल्प, केंद्र-राज्य समन्वय और जवाबदेही की व्यवस्था ने सुखद परिणाम दिए. यही कारण है कि अब दिल्ली और उत्तर भारत की जनता इसी तरह की कार्य शैली पॉल्यूशन के खिलाफ देखना चाहती है.
अक्टूबर 2026 के अंत में दिल्ली की हवा फिर खराब श्रेणी में पहुंच गई है. दशहरे के बाद AQI 200 के पार चला गया, कई इलाकों में 300 के आसपास पहुंच गया और CAQM ने GRAP का चरण-1 लागू कर दिया है. आने वाले दिनों में पराली जलाने का योगदान बढ़ने की भविष्यवाणी है. मौसम संबंधी परिस्थितियां प्रदूषण कारकों को फैलने नहीं देंगी, जिससे देश की राजधानी हर साल की तरह गैस चैंबर जैसा बन जाएगी. यह सालाना चक्र है, लेकिन हर साल जनता को लगता है कि समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है. वाहन, निर्माण धूल, उद्योग, खुले में कचरा जलाना और पड़ोसी राज्यों से आने वाला धुआं मिलकर वायु को जहरीला बनाते हैं. बच्चे, बुजुर्ग और सांस की बीमारी वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. ऐसे में जनता की मांग स्वाभाविक है कि कोई नेता सार्वजनिक रूप से समयसीमा दे और उसकी जिम्मेदारी ले.
पॉल्यूशन नक्सलवाद या नशीले पदार्थों के कारोबार जैसा नहीं
हालांकि पॉल्यूशन नक्सलवाद या नशीले पदार्थों के कारोबार जैसा नहीं है. नक्सलवाद और ड्रग्स में स्पष्ट दुश्मन, संगठित गिरोह और राज्य की शक्ति के इस्तेमाल की गुंजाइश होती है. पॉल्यूशन बहुस्रोतीय, मौसमी और अंतर-राज्यीय समस्या है. पराली जलाना किसानों की आर्थिक मजबूरी से जुड़ा है, वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, निर्माण कार्य शहर के विस्तार का हिस्सा है और मौसम (हवा की गति, तापमान, नमी) का नियंत्रण किसी सरकार के हाथ में नहीं है. केंद्र, दिल्ली सरकार, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच समन्वय की जरूरत पड़ती है. कोई एक मंत्री या एक विभाग अकेले इसे नहीं संभाल सकता है. फिर भी, जनता का यह कहना गलत नहीं है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति और जवाबदेही तय कर दी जाती है, तो प्रशासनिक मशीनरी भी काम करना शुरू कर देती है.
शाह जैसी शैली का मतलब सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि मापने योग्य लक्ष्य, जिम्मेदार अधिकारी, नियमित समीक्षा और परिणाम पर जवाबदेही से है. पॉल्यूशन के मामले में भी ऐसा संभव है. पराली प्रबंधन के लिए मशीनों की उपलब्धता, किसानों को समय पर भुगतान, वैकल्पिक उपयोग (बायोमास, कंपोस्ट) और सख्त निगरानी के लिए समयसीमा तय की जा सकती है. वाहनों के लिए BS-6 से आगे के मानक, पुराने वाहनों का चरणबद्ध प्रतिबंध, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और पार्किंग नीति में सख्ती हो सकती है. निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, सड़कों की नियमित सफाई और खुले में कचरा जलाने पर सख्त कार्रवाई के लिए जिम्मेदारी तय की जा सकती है. GRAP जैसी योजनाएं पहले से मौजूद हैं, लेकिन इन्हें राजनीतिक स्वामित्व और निरंतर निगरानी की जरूरत है.
केंद्र की भूमिका महत्वपूर्ण
दिल्ली-एनसीआर की समस्या सिर्फ दिल्ली की नहीं है. पड़ोसी राज्यों में कृषि अवशेष जलाने पर नियंत्रण के बिना पूर्ण समाधान मुश्किल है. इसके लिए केंद्र की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि समन्वय और धनराशि दोनों की जरूरत होती है. साथ ही, दिल्ली सरकार को स्थानीय स्रोतों पर नियंत्रण मजबूत करना होगा. जनता चाहती है कि कोई नेता सार्वजनिक रूप से कहे कि अगले तीन साल में AQI को खराब श्रेणी से ऊपर नहीं जाने देंगे. पराली का योगदान निश्चित प्रतिशत से नीचे लाएंगे और वाहन प्रदूषण में इतनी कमी लाएंगे. ऐसा वादा करने वाला नेता चाहे किसी भी दल का हो, जनता उस पर नजर रखेगी.
यह मांग इसलिए भी उठ रही है क्योंकि पिछले वर्षों में कई योजनाएं बनी, कई बैठकें हुईं और कई विशेषज्ञ समितियां बनीं, लेकिन साल दर साल स्थिति में कोई निर्णायक बदलाव नहीं दिखता. लोग नक्सलवाद और कश्मीर जैसे जटिल मुद्दों पर दिखी दृढ़ता को याद करते हैं और पूछते हैं कि वायु प्रदूषण जैसी रोजमर्रा की समस्या पर वही दृढ़ता क्यों नहीं दिखती. स्वास्थ्य का मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं है. प्रदूषण से होने वाली बीमारियों का बोझ अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर पड़ता है.
पॉल्यूशन को खत्म करने के लिए शाह जैसी शैली की जरूरत है. मतलब तारीख, जवाबदेही और निरंतर निगरानी पूरी तरह तय होगी. लेकिन यह तभी संभव होगा जब सभी पक्ष इसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर रखकर देखें. केंद्र, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और जनता तीनों को भूमिका निभानी होगी. घोषणाएं आसान होती हैं, परिणाम कठिन. दिल्ली की हवा साफ करने का वादा करने वाला कोई भी नेता अगर समयसीमा दे और उसकी जिम्मेदारी ले, तो जनता उस पर भरोसा करने को तैयार है. समस्या तकनीकी और प्रशासनिक है, लेकिन समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति की मांग करता है.जब तक वह इच्छाशक्ति नहीं दिखेगी, हर अक्टूबर-नवंबर में वही कहानी दोहराई जाती रहेगी.
संयम श्रीवास्तव