दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में बाहुबली नेता और भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को बरी कर दिया है. अदालत का कहना है कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका. बृजभूषण शरण सिंह ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे न्यायपालिका पर अपने भरोसे की जीत बताया है. वहीं आंदोलन का चेहरा रहे पहलवानों ने साफ कर दिया है कि उनकी कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे.
हालांकि, अदालत ने अपना काम कर दिया है. कानून की नजर में फिलहाल बृजभूषण शरण सिंह को राहत मिल चुकी है, लेकिन इस फैसले के साथ कहानी खत्म नहीं होती. इस पूरे प्रकरण ने भारतीय कुश्ती को जिस मोड़ पर लाकर खड़ा किया, उसका असर किसी एक मुकदमे, किसी एक व्यक्ति या किसी एक फैसले से कहीं बड़ा है.
बीजेपी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के कार्यकाल का मूल्यांकन भी केवल इस विवाद के आधार पर नहीं किया जा सकता. उनके नेतृत्व के वर्षों में भारतीय कुश्ती ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलताएं हासिल कीं. ओलंपिक, एशियाई खेल और राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने लगातार पदक जीते. देश के कई नए क्षेत्रों से प्रतिभाएं सामने आईं और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का दायरा पहले की तुलना में व्यापक हुआ. उनके समर्थकों का दावा है कि उन्होंने भारतीय कुश्ती को कुछ पारंपरिक केंद्रों तक सीमित रहने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार दिया और नए राज्यों के खिलाड़ियों को अवसर दिलाए.
हालांकि, उपलब्धियों के समानांतर बहस का दूसरा पक्ष भी हमेशा मौजूद रहा. लंबे समय तक हरियाणा भारतीय कुश्ती का सबसे प्रभावशाली केंद्र रहा और राष्ट्रीय टीमों में वहां के खिलाड़ियों का दबदबा साफ दिखाई देता था. बाद के वर्षों में दूसरे राज्यों के खिलाड़ियों की भागीदारी बढ़ी. समर्थक इसे खेल के स्वाभाविक विस्तार के रूप में देखते हैं, जबकि आलोचकों का मानना है कि इससे वर्षों से चला आ रहा शक्ति-संतुलन बदला. इस बहस का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि भारतीय कुश्ती केवल खेल का मैदान नहीं रही, बल्कि प्रशासन, प्रभाव और क्षेत्रीय राजनीति की चर्चाओं का भी हिस्सा बन गई.
दरअसल, खिलाड़ियों और महासंघ के बीच मतभेद 2023 के आंदोलन से बहुत पहले शुरू हो चुके थे. वर्ष 2016 में नरसिंह यादव और सुशील कुमार के बीच रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने को लेकर हुए विवाद और उसके बाद सामने आए डोपिंग प्रकरण ने महासंघ को चयन प्रक्रिया पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर किया. इसके बाद नियमों में बदलाव किया गया. तय हुआ कि ओलंपिक कोटा कोई भी पहलवान हासिल करे, लेकिन अंतिम प्रतिनिधि का फैसला ट्रायल के आधार पर होगा. साथ ही सभी स्टार पहलवानों के लिए नेशनल चैंपियनशिप या ओपन नेशनल खेलना अनिवार्य कर दिया गया. बिना इसके सीधे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी.
इन नियमों का कई वरिष्ठ खिलाड़ियों ने विरोध किया. उनका मानना था कि विश्व और ओलंपिक स्तर पर पदक जीत चुके खिलाड़ियों को हर बार घरेलू प्रतियोगिताओं में उतरने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है. दूसरी ओर महासंघ इसे सभी खिलाड़ियों के लिए समान अवसर और पारदर्शी चयन प्रक्रिया का हिस्सा बताता रहा. बृजभूषण शरण सिंह भी इन फैसलों पर पीछे नहीं हटे.
इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 2021 का एक और विवाद सामने आया. विनेश फोगाट पर टोक्यो ओलंपिक के दौरान भारतीय दल के साथ अभ्यास नहीं करने और आधिकारिक किट के बजाय प्रायोजक के लोगो वाली किट पहनकर उतरने के आरोप लगे. इस पर कुश्ती की अंतरराष्ट्रीय संस्था ने आपत्ति जताई और भारतीय कुश्ती फेडरेशन को नोटिस जारी कर दिया था. इसके बाद बृजभूषण शरण सिंह ने सार्वजनिक रूप से विनेश की आलोचना की. विनेश को अस्थाई तौर पर निलंबित भी किया गया था. इससे खिलाड़ियों और महासंघ के बीच पहले से मौजूद तनाव और बढ़ गया.
फिर 2023 आया और भारतीय कुश्ती ने वह दौर देखा, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. देश के ओलंपिक और विश्व स्तर के पदक विजेता पहलवान जंतर-मंतर पर धरने पर बैठ गए. संसद में सवाल उठे. पुलिस और खिलाड़ियों के बीच टकराव हुआ. मामला अदालत तक पहुंचा. इस दौरान कांग्रेसी नेता दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी पहलवानों के समर्थन में खुलकर सामने आए, जिसके बाद पूरे विवाद के राजनीतिकरण की चर्चा और तेज हो गई. दूसरी ओर बृजभूषण शरण सिंह अपने रुख पर कायम रहे कि वे खुद को अपराधी मानकर महासंघ के पद से इस्तीफा नहीं देंगे.
इन तमाम घटनाक्रमों के बाद अंतरराष्ट्रीय खेल जगत की नजरें भी भारत पर टिक गईं. जिस खेल की पहचान वर्षों तक पदकों से होती थी, वह आरोपों, विरोध प्रदर्शनों और प्रशासनिक संकट से पहचाना जाने लगा.
सबसे बड़ा नुकसान यहीं हुआ. खिलाड़ियों की तैयारी प्रभावित हुई. महासंघ लंबे समय तक अस्थिर रहा. प्रतियोगिताओं और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे. नई पीढ़ी के पहलवानों के सामने यह संदेश गया कि खेल से बड़ा विवाद भी हो सकता है. किसी भी खेल के लिए यह स्थिति शुभ नहीं कही जा सकती.
यह भी उतना ही सच है कि अदालत का फैसला किसी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी तय करता है, लेकिन खेल व्यवस्था की विश्वसनीयता का फैसला अदालत नहीं करती. वह खिलाड़ियों के अनुभव, संस्थाओं की पारदर्शिता और शिकायतों के निष्पक्ष समाधान से तय होता है.
बृजभूषण शरण सिंह का कार्यकाल इसलिए हमेशा दो संदर्भों में याद किया जाएगा. एक तरफ भारतीय कुश्ती की उपलब्धियों का दौर रहेगा, जब भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार सफलता हासिल की. दूसरी तरफ वही समय भारतीय खेल इतिहास के सबसे बड़े विवादों में भी दर्ज रहेगा. इतिहास दोनों तथ्यों को साथ लेकर चलेगा.
अब जब अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है तो यह समय जीत और हार का राजनीतिक या भावनात्मक हिसाब लगाने का नहीं है. यह समय भारतीय कुश्ती की संस्थागत समीक्षा का है. क्या खिलाड़ियों का भरोसा पहले जैसा है? क्या शिकायतों के समाधान की व्यवस्था पर्याप्त है? क्या खेल संघों में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर आवश्यक सुधार हुए हैं? क्या चयन प्रक्रिया ऐसी है जिस पर खिलाड़ी और प्रशासक समान रूप से भरोसा कर सकें? अगर इन सवालों के जवाब नहीं खोजे गए तो यह पूरा विवाद केवल एक अदालती फैसले तक सीमित होकर रह जाएगा.
भारतीय कुश्ती की पहचान कभी विवाद नहीं रही. उसकी पहचान गांवों के अखाड़े, मिट्टी की खुशबू, कठिन अभ्यास और तिरंगा लहराते खिलाड़ियों से बनी है. इसलिए इस फैसले को अंत नहीं, एक अवसर की तरह देखा जाना चाहिए. ऐसा अवसर, जिसमें भारतीय कुश्ती अपने सबसे कठिन अध्याय से सबक लेकर अधिक पारदर्शी, अधिक विश्वसनीय और अधिक मजबूत व्यवस्था की ओर बढ़े. अगर सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहा तो हार किसी एक पक्ष की नहीं होगी, हार भारतीय कुश्ती की होगी.
टीके श्रीवास्तव