अंग्रेजों पर 'उधारी'... MP के सेठ ने 109 साल पहले ब्रिटिश सरकार को दिया था 35 हजार रुपये का कर्ज, अब पोते ने मांगा हिसाब

MP के रूठिया परिवार का यह मामला किसी फिल्मी कहानी जैसा लग रहा है, लेकिन इसके पीछे मौजूद दस्तावेज 109 साल पुराने इतिहास की गवाही दे रहे हैं. ब्रिटिश हुकूमत भले ही भारत छोड़कर चली गई, लेकिन एक भारतीय रईस का 'उधार' आज भी लंदन के शाही रिकॉर्ड्स और इंटरनेशनल कानूनों की गलियों में इंसाफ तलाश रहा है.

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इंटरनेशनल कोर्ट जाने की तैयारी में MP का रूठिया परिवार.(Photo:ITG) इंटरनेशनल कोर्ट जाने की तैयारी में MP का रूठिया परिवार.(Photo:ITG)

aajtak.in

  • सीहोर,
  • 24 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:17 PM IST

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के एक प्रतिष्ठित परिवार ने ब्रिटिश क्राउन (लंदन) को कानूनी नोटिस भेजने की तैयारी की है. मामला साल 1917 का है, जब सीहोर के तत्कालीन रईस सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने ब्रिटिश सरकार को अपनी रियासत का प्रबंधन संभालने के लिए 35 हजार रुपए का कर्ज दिया था. एक सदी बीत जाने के बाद भी यह कर्ज और उसका ब्याज चुकता नहीं हुआ है. 

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सेठ जुम्मा लाल रूठिया उस दौर में भोपाल की नवाब सुल्तान जहां बेगम के बाद प्रदेश के सबसे अमीर व्यक्तियों में शुमार थे. 1917 में ब्रिटिश हुकूमत ने भोपाल रियासत में अपने प्रशासनिक मैनेजमेंट को व्यवस्थित करने के लिए यह राशि उधार ली थी. 

1937 में सेठ जुम्मा लाल की मृत्यु के बाद, उनके पुत्र मानकचंद्र रूठिया को वसीयत में ब्रिटिश सरकार के साथ हुई लिखा-पढ़ी के पुख्ता दस्तावेज़ मिले. अब उनके पोते विवेक रूठिया इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं.

आज की कीमत 
विवेक रूठिया का दावा है कि 1917 के 35 हजार रुपए की कीमत आज के बाजार मूल्य के हिसाब से 1 करोड़ रुपए से भी कहीं अधिक है. अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता कानून (International Sovereign Law) का हवाला देते हुए उनका तर्क है कि एक देश अपनी पुरानी देनदारियों को चुकाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होता है, चाहे हुकूमत बदल ही क्यों न गई हो.

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सीहोर का 40% हिस्सा रूठिया परिवार की जमीन पर?
सेठ रूठिया परिवार की संपत्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सीहोर शहर की लगभग 40 से 45 फीसदी बसाहट आज भी रूठिया परिवार की जमीनों पर बसी मानी जाती है. इंदौर, भोपाल और सीहोर में उनकी कई संपत्तियां या तो कब्जे में हैं या विवादित हैं. कई संपत्तियों का किराया आज भी 100 से 500 रुपए जैसे पुराने रेट पर चल रहा है.

क्या कहता है कानून?
कानूनी जानकारों के अनुसार, ब्रिटिश क्राउन को नोटिस तो भेजा जा सकता है, लेकिन सफलता 'एग्रीमेंट' की शर्तों पर निर्भर करेगी. क्या एग्रीमेंट में कर्ज वापसी की कोई निश्चित तारीख तय थी? समय सीमा निकलने के बाद हर्जाने या ब्याज की क्या शर्तें थीं? क्या स्वतंत्र भारत की सरकार ने आजादी के समय ऐसी पुरानी देनदारियों की जिम्मेदारी ली थी या यह सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार का मामला है? 

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