चार बेटों ने मां को नहीं दी मुखाग्नि... जिंदगी के आखिरी 8 महीने वृद्धाश्रम में गुजारे, इंदौर की लता बाई की कहानी

इंदौर में एक बुजुर्ग महिला की मौत हो गई थी. महिला के चार बेटे हैं, लेकिन अंतिम संस्कार के लिए कोई नहीं पहुंचा. महिला को जिंदगी के आखिरी 8 महीने वृद्धाश्रम में गुजारने पड़े. अंतिम संस्कार करने वाली संस्था का कहना है कि बेटों ने मां को मुखाग्नि देने से भी इनकार कर दिया. इसके बाद संस्था और वृद्धाश्रम से जुड़े लोगों ने पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया.

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इंदौर के वृद्धाश्रम में बुजुर्ग मां ने गुजारे 8 महीने. (Photo: ITG) इंदौर के वृद्धाश्रम में बुजुर्ग मां ने गुजारे 8 महीने. (Photo: ITG)

धर्मेंद्र कुमार शर्मा

  • इंदौर,
  • 18 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 1:35 PM IST

इंदौर में एक मां की कहानी सामने आई है. कहानी ऐसी कि पढ़ते हुए कई सवाल मन में आते हैं. मां थीं लता बाई. जिंदगी का बड़ा हिस्सा उन्होंने अपने परिवार के लिए बिताया. लेकिन जब जिंदगी की आखिरी घड़ी आई और फिर मौत के बाद अंतिम विदाई का वक्त आया, तो उनके अपने बेटे वहां नहीं थे. जिन लोगों से लता बाई का कोई खून का रिश्ता नहीं था, वही लोग उनकी आखिरी यात्रा में उनके साथ खड़े हुए. उन्होंने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई और सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी.

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ये पूरा मामला इंदौर के सिलिकॉन सिटी इलाके की गणेश रेसिडेंसी से जुड़ा है. लता बाई के बारे में संस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी और जेवर तक बेचकर एक फ्लैट खरीदा था. मतलब जिस उम्र में लोग अपनी जिंदगी की जमा पूंजी को सुरक्षित देखकर सुकून महसूस करते हैं, उस उम्र में लता बाई ने भी शायद यही सोचा होगा कि अब रहने के लिए अपना घर है.

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लेकिन संस्था के मुताबिक, बाद में उनके एक बेटे ने कथित तौर पर वह फ्लैट अपने नाम करवा लिया. आरोप है कि इसके बाद लता बाई को घर से बाहर कर दिया गया. हालांकि इस मामले में बेटों का पक्ष सामने नहीं आया है.

इस सबके बाद लता बाई की जिंदगी मुश्किल हो गई. उन्हें सहारे की जरूरत थी. रहने के लिए जगह की जरूरत थी. और इसी दौरान उनकी जानकारी प्रीयु फाउंडेशन से जुड़े अजय नागदा तक पहुंची. अजय नागदा और संस्था से जुड़े लोगों ने लता बाई की मदद की पहल की. उनका मेडिकल परीक्षण कराया गया और उन्हें जानकी वृद्धाश्रम में आश्रय दिया गया.

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करीब आठ महीने तक लता बाई इसी वृद्धाश्रम में रहीं. इन आठ महीनों में उनकी देखभाल संस्था के लोग करते रहे. यही लोग उनकी जरूरतों का ध्यान रखते रहे. लेकिन फिर एक दिन उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई. उन्हें इंदौर के एमवाय अस्पताल ले जाया गया. इलाज शुरू हुआ, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके. लता बाई की मौत हो गई.

लता बाई के चार बेटे हैं. मां की मौत के बाद उनके बेटों तक खबर पहुंचाने की कोशिश की गई. संस्था के मुताबिक, ओम शांति आश्रम की ब्रह्मकुमारी ज्योति दीदी के माध्यम से चारों बेटों को लता बाई के निधन की सूचना दी गई. संस्था का दावा है कि बेटों को मां की मौत की जानकारी देने के बावजूद वे अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए.

संस्था के मुताबिक, चारों बेटों ने मां को मुखाग्नि देने से भी इनकार कर दिया. अब सवाल था कि लता बाई का अंतिम संस्कार कौन करेगा? जिस परिवार के लिए उन्होंने जिंदगी गुजारी, वहां से कोई नहीं आया. तब वही लोग आगे आए, जो पिछले आठ महीने से उनके साथ थे.

बेटे नहीं आए तो समाजसेवियों ने निभाया फर्ज

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प्रीयु फाउंडेशन और जानकी वृद्धाश्रम से जुड़े लोगों ने लता बाई के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई. जरूरी प्रक्रिया पूरी की गई. इसके बाद उनकी पार्थिव देह को रीजनल पार्क ले जाया गया. वहां पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ लता बाई का अंतिम संस्कार किया गया. यानी जिस अंतिम यात्रा में आम तौर पर परिवार के लोग आगे होते हैं, वहां इस बार समाजसेवी संस्था के लोग साथ थे. जिनके साथ लता बाई का खून का रिश्ता नहीं था, उन्होंने ही आखिरी वक्त में उन्हें अकेला नहीं छोड़ा.

लता बाई की पूरी जिंदगी की कहानी हमारे सामने नहीं है. उनके परिवार के भीतर क्या हुआ, फ्लैट को लेकर क्या परिस्थितियां थीं और उनके बेटों ने अंतिम संस्कार में शामिल होने से क्यों इनकार किया, इस पर उनकी तरफ से कोई पक्ष सामने नहीं आया है. 

एक तरफ एक बुजुर्ग मां, जिसने कथित तौर पर अपनी जमा पूंजी और जेवर बेचकर घर बनाया. दूसरी तरफ आरोप है कि बाद में उन्हें उसी घर से बाहर होना पड़ा. फिर जिंदगी के आखिरी आठ महीने एक वृद्धाश्रम में बीते. और जब मौत आई, तो अंतिम विदाई के लिए भी परिवार मौजूद नहीं था.

कुछ लोग ऐसे थे, जो लता बाई को जानते थे. उनके साथ रहे. उनकी देखभाल की. और आखिर में उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी उठाई. कभी-कभी परिवार सिर्फ वो नहीं होता, जिससे हमारा खून का रिश्ता हो. परिवार वो भी हो सकता है, जो मुश्किल वक्त में हमारे साथ खड़ा रहे. लता बाई की अंतिम यात्रा में उनके बेटों का कंधा नहीं था. लेकिन उन्हें अकेला भी नहीं छोड़ा गया.

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