विवाह के अवसर पर लिए गए सात फेरे सिर्फ रस्म ही नहीं, बल्कि जिंदगीभर साथ निभाने का वादा होते हैं. 55 साल की मीना गुप्ता ने इस वादे को वाकई हकीकत में बदल दिया. जब 60 साल के उनके पति कृष्णकांत गुप्ता की दोनों किडनियां खराब हो गईं और जिंदगी बचाने के लिए किडनी ट्रांसप्लांट जरूरी हुआ, तो मीना ने बिना किसी हिचक के अपना अंग दान करने का फैसला किया. उनका कहना था- 'आखिरी सांस तक अपने सुहाग को कुछ नहीं होने दूंगी.'
30 अगस्त का दिन ग्वालियर-चंबल संभाग की मेडिकल हिस्ट्री में भी यादगार बन गया. गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में पहली बार सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया गया. इस ट्रांसप्लांट में पत्नी मीना ने पति कृष्णकांत को अपनी किडनी दान की.
पहले जांच, फिर शुरू हुई जिंदगी बचाने की तैयारी
दरअसल, छतरपुर निवासी कृष्णकांत गुप्ता की दोनों किडनियां खराब हो चुकी थीं. परिवार की सहमति के बाद उनकी पत्नी मीना गुप्ता ने पति को किडनी दान करने की इच्छा जताई. इसके बाद मरीज और डोनर की मेडिकल जांच, काउंसलिंग, अनुकूलता परीक्षण और ट्रांसप्लांट से जुड़ी अन्य जरूरी प्रक्रियाएं पूरी की गईं.
सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद दोनों को 29 अगस्त को सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया.
साढ़े छह घंटे चली जटिल प्रक्रिया
रविवार सुबह करीब 8:30 बजे किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू हुई. सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी, एनेस्थीसिया और यूरोलॉजी विभाग के नेतृत्व में मणिपाल हॉस्पिटल के यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट विभागाध्यक्ष डॉ. विकास जैन के सहयोग से विशेषज्ञों की टीम ने ऑपरेशन किया.
करीब साढ़े छह घंटे तक चली जटिल प्रक्रिया दोपहर लगभग 3 बजे पूरी हुई. इस दौरान मरीज और डोनर की स्थिति पर विशेषज्ञों की टीम लगातार नजर बनाए रही. अस्पताल प्रबंधन के अनुसार पूरी प्रक्रिया निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत हुई और कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई.
ट्रांसप्लांट के बाद मरीज कृष्णकांत गुप्ता और उनकी पत्नी मीना गुप्ता दोनों की हालत स्थिर है. डॉक्टरों की टीम लगातार दोनों की निगरानी कर रही है.
आयुष्मान कार्ड से हुआ मुफ्त ट्रांसप्लांट
कृष्णकांत गुप्ता का किडनी ट्रांसप्लांट आयुष्मान योजना के तहत नि:शुल्क किया गया. इससे आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए भी शासकीय अस्पताल में अत्याधुनिक अंग प्रत्यारोपण की सुविधा उपलब्ध होने का रास्ता मजबूत हुआ है.
परिजनों ने अस्पताल की पूरी टीम और शासन की स्वास्थ्य योजनाओं के प्रति आभार जताया.
संक्रमण से बचाने के लिए अलग ICU
ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को संक्रमण से बचाना सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसके लिए सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में कृष्णकांत गुप्ता के लिए अलग ICU की व्यवस्था की गई है. अस्पताल में सेंट्रलाइज्ड AC सिस्टम होने के बावजूद ट्रांसप्लांट मरीज के ICU में अलग से AC की व्यवस्था की गई है, ताकि संक्रमण का खतरा न्यूनतम रखा जा सके.
मरीज के कमरे में डॉक्टरों और अधिकृत चिकित्सा स्टाफ के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को प्रवेश की अनुमति नहीं होगी. उन्हें सात दिन तक मेडिसिन, नेफ्रोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग के चिकित्सकों की विशेष निगरानी में रखा जाएगा. इसके लिए चिकित्सकों की राउंड-द-क्लॉक ड्यूटी लगाई गई है.
बेटे ने कहा- डॉक्टरों के प्रयास से संभव हुआ ट्रांसप्लांट
कृष्णकांत गुप्ता के बेटे सुमित कनकने ने बताया कि ट्रांसप्लांट के दौरान किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं आई. उन्होंने बताया कि पूरा ऑपरेशन आयुष्मान योजना के तहत हुआ है.
सुमित ने महाविद्यालय अधिष्ठाता प्रो. डॉ. आर.के.एस. धाकड़, डॉ. शिवम यादव और डॉ. अंकित शर्मा का आभार जताते हुए कहा कि उनके अथक प्रयासों से ही ग्वालियर में यह ट्रांसप्लांट संभव हो सका.
ग्वालियर-चंबल के लिए नई शुरुआत
महाविद्यालय अधिष्ठाता प्रो. डॉ. आरकेएस धाकड़ ने कहा कि सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में पहला किडनी ट्रांसप्लांट होना गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय और पूरे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में शामिल मणिपाल हॉस्पिटल के डॉ. विकास जैन ने बताया कि वे अपनी टीम के साथ दिल्ली से यहां आए थे और पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी की. उन्होंने सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के स्टाफ की सराहना करते हुए कहा कि काम के दौरान उन्हें ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वे किसी नए सेटअप में पहली बार काम कर रहे हैं.
इस सफल ट्रांसप्लांट में डॉ. नीलिमा टंडन, डॉ. प्रशांत श्रीवास्तव, डॉ. शिवम यादव, डॉ. अंकित शर्मा, डॉ. सीमा शिंदे, डॉ. जिंदल, डॉ. नम्रता जैन, डॉ. कुशल, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर कविता और राहुल सहित पूरी चिकित्सा टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही.
एक तरफ ग्वालियर-चंबल संभाग के सरकारी अस्पताल में पहली सफल किडनी ट्रांसप्लांट की उपलब्धि दर्ज हुई, तो दूसरी तरफ एक पत्नी ने अपने जीवनसाथी के लिए अपनी किडनी देकर सात फेरों में लिए वचन को फिर से जीवंत कर दिया. मीना गुप्ता का यह फैसला सिर्फ एक मेडिकल ट्रांसप्लांट नहीं, बल्कि उस रिश्ते की कहानी है जिसमें जीवनसाथी के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगाने का जज्बा होता है.
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