आज के समय में महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं. वे ऑफिस में काम कर रही हैं, बिजनेस चला रही हैं और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में भी बराबर का योगदान दे रही हैं. लेकिन क्या महिलाओं के काम करने और कमाने की आजादी के साथ घर की जिम्मेदारियां भी कम हुई हैं. हकीकत यह है कि आज भी कई महिलाओं को नौकरी के साथ घर और परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है. सुबह बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर खाना बनाने, घर की सफाई और बुजुर्गों की देखभाल तक, उनके दिन का बड़ा हिस्सा घरेलू कामों में बीत जाता है.
ऑफिस से लौटने के बाद भी उनकी ड्यूटी खत्म नहीं होती, बल्कि घर के काम उनका इंतजार कर रहे होते हैं. दूसरी ओर, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को खुद के लिए बेहद कम समय मिलता है, जिसका असर उनके करियर, कमाई और खुद के लिए समय निकालने पर भी पड़ता है. हाल ही में जारी एक रिपोर्ट ने महिलाओं के कामकाज और उनके समय के इस्तेमाल को लेकर इसी तरह की कई अहम चुनौतियों को सामने रखा है. रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं की काम में भागीदारी बढ़ने के बावजूद उनके काम की गुणवत्ता और कमाई में उस अनुपात में सुधार नहीं हुआ है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर महिलाएं ज्यादा काम करने के बावजूद आर्थिक रूप से पीछे क्यों हैं और घर की जिम्मेदारियों का बोझ उनके करियर को किस तरह प्रभावित कर रहा है? आइए समझते हैं.
महिलाओं की भागीदारी बढ़ी लेकिन चुनौतियां बरकरार
भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लक्ष्य में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम है. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारत की अर्थव्यवस्था 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गई लेकिन देश की जीडीपी में महिलाओं का योगदान लगभग 18 फीसदी ही है. अनुमान है कि 2047 तक अर्थव्यवस्था में लगभग 14 ट्रिलियन डॉलर जोड़ने के लिए महिला वर्कफोर्स को बढ़ाकर लगभग 40 करोड़ करना होगा. यानी मौजूदा स्तर से इसे करीब दोगुना करने की जरूरत है.
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की 'द पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स: विमेन्स वर्क एंड टाइम-यूज इन इंडिया (2017-18 टू 2025)' नाम की इस रिपोर्ट में पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) और टाइम यूज सर्वे (TUS) के आंकड़ों के आधार पर साल 2017-18 और 2025 के बीच महिलाओं के कामकाज और उनके समय के इस्तेमाल की तुलना की गई है.
रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं की काम में भागीदारी तो बढ़ी है लेकिन उनके काम की गुणवत्ता, कमाई और उत्पादकता में उसी अनुपात में सुधार नहीं हुआ है.
नौकरी बढ़ी लेकिन घर की जिम्मेदारियां कम नहीं हुईं
महिलाओं के कामकाज की बात करते समय सिर्फ उनकी नौकरी या कमाई को देखना काफी नहीं है. घर में खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की जिम्मेदारी जैसे कई काम भी महिलाएं करती हैं. इनमें से ज्यादातर काम बिना किसी वेतन के होते हैं.
यही वजह है कि नौकरी करने वाली महिलाओं को अक्सर घर और ऑफिस दोनों की जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं. वहीं, पुरुषों की तुलना में महिलाओं का काफी समय घरेलू और देखभाल से जुड़े कामों में खर्च होता है. इससे उन्हें अपनी नौकरी, स्किल बढ़ाने और बेहतर करियर के मौके तलाशने के लिए कम समय मिल पाता है.
नौकरी के बाद भी महिलाओं को नहीं मिलता आराम
कई महिलाएं सुबह उठने के साथ ही घर के कामों में जुट जाती हैं. बच्चों को स्कूल भेजना, नाश्ता और खाना तैयार करना, घर की सफाई करना और फिर ऑफिस के लिए निकलना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. ऑफिस से लौटने के बाद भी उनकी जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं. उन्हें दोबारा रसोई, बच्चों की पढ़ाई और घर के दूसरे कामों में लगना पड़ता है.
ऐसे में महिलाओं के पास अपने लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है. लगातार दोहरी जिम्मेदारी निभाने से शारीरिक थकान के साथ मानसिक दबाव भी बढ़ सकता है.
भारतीय परिवारों में आज भी घर संभालने की जिम्मेदारी ज्यादातर महिलाओं की ही मानी जाती है. इसकी एक बड़ी वजह समाज की पुरानी सोच और परवरिश है. बचपन से ही कई लड़कियों को खाना बनाना, सफाई करना और घर के काम सीखने के लिए कहा जाता है, जबकि लड़कों को इन जिम्मेदारियों से अक्सर दूर रखा जाता है. बड़े होने पर यही सोच उनकी आदतों का हिस्सा बन जाती है.
कई पुरुष घर के कामों को अपनी जिम्मेदारी के बजाय महिलाओं का काम समझते हैं. कुछ परिवारों में यह भी माना जाता है कि पुरुष का मुख्य काम पैसे कमाना और महिला का काम घर संभालना है. हालांकि, आज जब महिलाएं भी नौकरी करके परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में योगदान दे रही हैं तो घर के कामों का बंटवारा भी बराबर होना जरूरी है.
खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और घर की सफाई सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार के सभी सदस्यों की साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए.
महिलाओं के लिए सिर्फ नौकरी नहीं, बेहतर मौके भी जरूरी
रिपोर्ट का मुख्य संदेश है कि महिलाओं की कामकाजी भागीदारी बढ़ना अच्छी बात है लेकिन सिर्फ संख्या बढ़ने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होगी. उन्हें बेहतर वेतन, सुरक्षित कामकाजी माहौल, स्किल डेवलपमेंट और आगे बढ़ने के समान अवसर भी मिलने चाहिए.
इसके साथ ही घर की जिम्मेदारियों को महिला और पुरुष दोनों के बीच बराबर बांटना होगा. तभी महिलाएं दोहरी जिम्मेदारी के बोझ से मुक्त होकर अपने करियर पर ध्यान दे पाएंगी और देश की आर्थिक तरक्की में भी उनकी भागीदारी बढ़ सकेगी.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क