भीषण गर्मी में भूख मिटाने के लिए मजबूरी में हुआ था 'कढ़ी' का आविष्कार, ऐसा है 2000 साल पुराना इतिहास

History of kadhi: राजस्थान की तपती गर्मी में मजबूरी में बनाई गई खट्टी डिश यानी कढ़ी आज हर किसी की पसंदीदा है. इसकी उत्पत्ति कैसे हुई, इस बारे में जानेंगे.

Advertisement
कढ़ी की उत्पत्ति राजस्थान-गुजरात के पास पानी जाती है. (Photo: ITG) कढ़ी की उत्पत्ति राजस्थान-गुजरात के पास पानी जाती है. (Photo: ITG)

मृदुल राजपूत

  • नई दिल्ली,
  • 02 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 2:37 PM IST

History of kadhi: कढ़ी एक ऐसी डिश है जिसे कोई भी कभी भी खा सकता है. हल्का, स्वादिष्ट और चावल-रोटी-बाटी-बाफले आदि के साथ परोसी जाने वाली कढ़ी छाछ और बेसन से तैयार की जाती है और समय के साथ-साथ ये अलग-अलग तरीके से बनाई जाती है. लोगों ने इसमें अपने क्षेत्रीय स्वाद डाल दिए हैं जिससे जैसे पंजाबी कढ़ी थोड़ी खट्टी होती है, दक्षिण भारतीय कढ़ी में भुना हुआ लहसुन और प्याज, सरसों के बीज, करी पत्ते और लाल मिर्च का पारंपरिक तड़का शामिल होता है.

महाराष्ट्रीयन कढ़ी में कोकम का इस्तेमाल होता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस क्लासिक डिश की उत्पत्ति कहां से हुई थी और इसे पहली बार कैसे बनाया गया था? तो आइए आज हम बताते हैं कि कैसे मजबूरी में बनाई गई कढ़ी कैसे आज घर-घर की फेवरेट है.

Advertisement

क्या कहते हैं इतिहासकार

भारत के मशहूर फूड हिस्टोरियन के. टी. अचाया (K.T. Achaya) की किताब '' में यह दही वाली करी उत्तर-पश्चिम भारत से ब्रिटिश 'कर्री' की पूर्वज हो सकती है, जहां ब्रिटिशों ने 1600 ई. में सूरत आकर इसे जाना था. यह दही को उबालकर मसालों से बनाई जाती थी, जो रेगिस्तान में सब्जियों की कमी पूरी करती थी. इस किताब में प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से दही-मसाला मिश्रण का प्रमाण दिया, जो आज की कढ़ी जैसा था.

बताया जाता है, करीब 2000 साल पहले जब राजस्थान और गुजरात के तपते रेगिस्तानों में न ही हरियाली थी और न सब्जियां, तब इंसान ने अपनी भूख मिटाने के लिए एक अनोखा जुगाड़ लगाई थी. गर्मियों के दौरान दूध को लंबे समय तक ताजा रखना नामुमकिन था क्योंकि उस समय फ्रिज मौजूद नहीं थे. 

Advertisement

रेगिस्तानी इलाकों में पानी और सब्जियों की भी कमी थी इसलिए लोग डेयरी और अनाज पर ही निर्भर थे. फटे हुए दूध और खट्टी छाछ को फेंकने के बजाय, उसमें बेसन घोलकर आग पर हल्की आंच पर चढ़ा दिया गया. बस फिर क्या था, जो बाद में डिश तैयार हुई वो कढ़ी हुई जिसे लोग बड़े चाव से खाते हैं. 

'कढ़ी' नाम कैसे पढ़ा?

जानकारों का कहना है कि कढ़ी नाम संस्कृत के शब्द 'क्वथित' (Kwathit) से आया है. संस्कृत में 'क्वथित' का अर्थ होता है, वह चीज जिसे बहुत देर तक उबाला गया हो या जिसका काढ़ा बनाया गया हो. अब कढ़ी को बनाने की प्रक्रिया ही इसे धीमी आंच पर देर तक उबालने से शुरू होती है इसलिए इसका नाम कढ़ी पड़ा. 

बताया जाता है कि आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ 'चरक संहिता' में भी 'तक्र' (छाछ) के औषधीय गुणों और उसे पकाकर सेवन करने के फायदों का उल्लेख मिलता है. आज यह सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि भारतीय फूड कल्चर की पहचान है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »