अखबार का साइज इतना बड़ा क्यों होता है? जानिए ब्रिटेन के एक टैक्स से क्या है कनेक्शन

सुबह चाय के साथ अखबार पढ़ते समय क्या आपने कभी सोचा है कि अखबार के पन्ने इतने बड़े क्यों होते हैं? इसके पीछे सिर्फ छपाई की तकनीक नहीं, बल्कि करीब 300 साल पुराना इतिहास भी है.

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जानिए अखबारों का बड़ा साइज कैसे शुरू हुआ और फिर छोटे आकार के टैब्लॉयड अखबार कैसे लोकप्रिय हुए. ( Photo: ITG) जानिए अखबारों का बड़ा साइज कैसे शुरू हुआ और फिर छोटे आकार के टैब्लॉयड अखबार कैसे लोकप्रिय हुए. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:45 AM IST

सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ना बहुत से लोगों की आदत है. कोई सबसे पहले देश-दुनिया की खबरें पढ़ता है, तो कोई सीधे खेल, मनोरंजन या नौकरी से जुड़ा पन्ना खोल लेता है. लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि अखबार का आकार इतना बड़ा क्यों होता है? आखिर इसे किताब या मैगजीन की तरह छोटा क्यों नहीं बनाया जाता? जब मोबाइल की स्क्रीन पर पूरी दुनिया की खबरें आसानी से पढ़ी जा सकती हैं, तब भी ज्यादातर अखबार बड़े-बड़े पन्नों में ही क्यों छपते हैं.

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दिलचस्प बात यह है कि अखबारों का बड़ा आकार किसी एक व्यक्ति की पसंद या डिजाइन का नतीजा नहीं है. इसके पीछे छपाई की पुरानी तकनीक, कागज की कीमत, ब्रिटेन का एक अजीब टैक्स और अखबारों में ज्यादा से ज्यादा खबरें छापने की जरूरत जैसी कई वजहें हैं. आज जिस बड़े आकार के अखबार को हम देखते हैं, उसकी कहानी करीब 300 साल पुरानी है. इसे समझने के लिए हमें अखबारों के इतिहास में थोड़ा पीछे जाना होगा.

पहले अखबार नहीं, एक बड़े कागज पर छपती थीं खबरें
आज की तरह पुराने समय में अखबारों में कई पन्ने नहीं हुआ करते थे. यूरोप में शुरुआती दौर में खबरें एक बड़े कागज पर छापी जाती थीं. इन्हें ब्रॉडसाइड (Broadside) कहा जाता था. इन कागजों पर युद्ध, राजाओं के आदेश, सरकारी घोषणाएं, राजनीतिक घटनाएं और दूसरी महत्वपूर्ण जानकारियां छापी जाती थीं. इन्हें लोगों तक पहुंचाया जाता था और कई बार सार्वजनिक जगहों पर चिपका भी दिया जाता था. उस समय छपाई का काम आज जितना आसान नहीं था.

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प्रिंटिंग प्रेस में एक-एक अक्षर को हाथ से जमाना पड़ता था. फिर उस पर स्याही लगाकर कागज को दबाया जाता था. यानी एक-एक पन्ना छापने में काफी मेहनत और समय लगता था. ऐसे में प्रिंटर के लिए छोटे-छोटे कई पन्ने छापने के बजाय एक बड़े कागज पर ज्यादा जानकारी छापना आसान और किफायती था. धीरे-धीरे यही बड़ा कागज अखबारों के आकार की पहचान बनने लगा.

ब्रिटेन के एक टैक्स से क्या है कनेक्शन
अखबारों के बड़े आकार की कहानी में साल 1712 बहुत महत्वपूर्ण है. उस समय ब्रिटेन में अखबारों पर टैक्स लगाया गया था. इसे आमतौर पर 'टैक्स ऑन नॉलेज' यानी ज्ञान पर टैक्स कहा जाता है. इस टैक्स व्यवस्था में अखबारों के पन्नों की संख्या के आधार पर शुल्क लगाया जाता था. यानी अखबार में जितने ज्यादा पन्ने होंगे, उसे छापने वाले को उतना ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता था. अब अखबार छापने वालों के सामने मुश्किल थी. उन्हें पाठकों तक ज्यादा से ज्यादा खबरें भी पहुंचानी थीं और टैक्स का खर्च भी कम रखना था.

इसका एक तरीका निकाला गया. उन्होंने कई छोटे पन्नों की जगह बड़े आकार के कागज का इस्तेमाल करना शुरू किया. इस तरह एक ही शीट को मोड़कर ज्यादा जगह हासिल की जा सकती थी और पन्नों की संख्या भी कम रखी जा सकती थी. यहीं से ब्रॉडशीट (Broadsheet) फॉर्मेट को बढ़ावा मिला. यानी अखबार के बड़े आकार के पीछे ब्रिटेन की टैक्स व्यवस्था का भी बड़ा हाथ रहा है.

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बड़े अखबार छापना छोटे अखबारों से ज्यादा आसान क्यों था?
आप सोच सकते हैं कि जब छोटे पन्ने भी छापे जा सकते थे, तो अखबारों को बड़ा ही क्यों रखा गया? इसका जवाब उस समय की प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में छिपा है. पुराने समय में अखबार छापने के लिए लकड़ी और धातु से बनी प्रिंटिंग मशीनों का इस्तेमाल होता था. इन मशीनों में कागज को एक-एक करके छापना पड़ता था. हर पन्ने को अलग से तैयार करना और फिर उन्हें जोड़ना काफी मेहनत वाला काम था. ऐसे में एक बड़ा कागज लेकर उस पर दोनों तरफ छपाई करना और फिर उसे बीच से मोड़कर चार पन्ने तैयार कर लेना ज्यादा आसान था.

इससे तीन फायदे होते थे. बार-बार अलग-अलग पन्ने तैयार करने की जरूरत कम होती थी. एक ही कागज पर ज्यादा खबरें छापी जा सकती थीं. अखबार को तैयार करने और उसके पन्नों को जोड़ने में कम मेहनत लगती थी. यानी अखबार का बड़ा आकार केवल दिखावे के लिए नहीं था, बल्कि उस समय की छपाई व्यवस्था के हिसाब से यह एक व्यावहारिक तरीका था.

मशीनों ने अखबारों को और ज्यादा लोकप्रिय बना दिया
19वीं सदी में प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव आने लगे. पहले अखबार हाथ से चलने वाली मशीनों पर छपते थे, लेकिन धीरे-धीरे भाप से चलने वाली मशीनें आने लगीं. इस बदलाव में साल 1814 काफी अहम है. जर्मनी के फ्रेडरिक कोएनिग और एंड्रियास बाउर ने ऐसी मशीन तैयार की, जिसने अखबारों की छपाई का तरीका बदल दिया.म29 नवंबर 1814 को लंदन के 'द टाइम्स' अखबार ने पहली बार इस भाप से चलने वाली प्रिंटिंग मशीन का इस्तेमाल किया. यह मशीन एक घंटे में करीब 1,100 शीट छाप सकती थी. इससे पहले इतनी तेजी से अखबार छापना मुश्किल था.

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इसके बाद रोटरी प्रिंटिंग प्रेस (Rotary Printing Press) का विकास हुआ. इसमें घूमने वाले सिलेंडर की मदद से कागज पर छपाई की जाती थी. इससे अखबारों की छपाई की रफ्तार बहुत बढ़ गई. साल 1865 में विलियम बुलॉक ने ऐसी रोटरी मशीन विकसित की, जिसमें कागज के बड़े रोल का इस्तेमाल किया जा सकता था. मशीन कागज को लगातार आगे बढ़ाती थी, दोनों तरफ छपाई करती थी और जरूरत के हिसाब से उसे काट भी सकती थी. इस तकनीक ने अखबारों को बड़ी संख्या में छापना आसान बना दिया. अब ज्यादा लोगों तक कम समय में खबरें पहुंचाई जा सकती थीं.

अखबारों में ज्यादा खबरें और विज्ञापन छापने के लिए भी बड़ा आकार जरूरी था. जैसे-जैसे अखबार पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे उनमें खबरों की संख्या भी बढ़ने लगी. पहले अखबारों में मुख्य रूप से राजनीतिक खबरें, युद्ध और सरकारी घोषणाएं छपती थीं. लेकिन बाद में इनमें कारोबार, खेल, मनोरंजन, मौसम, नौकरी, शिक्षा और स्थानीय खबरों के लिए भी जगह बनाई जाने लगी. इसके अलावा अखबारों की कमाई का एक बड़ा जरिया विज्ञापन भी बन गया.

कंपनियां अपने प्रोडक्ट और सेवाओं का प्रचार करने के लिए अखबारों में विज्ञापन देने लगीं. किसी विज्ञापन को जितनी ज्यादा जगह मिलती, वह उतना ही बड़ा और आकर्षक दिखाई देता. ऐसे में अखबारों के बड़े पन्ने प्रकाशकों के लिए फायदेमंद थे. उन पर खबरों के साथ-साथ विज्ञापनों को भी पर्याप्त जगह दी जा सकती थी. 19वीं सदी में कुछ अमेरिकी अखबारों का आकार तो इतना बड़ा हो गया था कि उन्हें संभालना भी मुश्किल होता था. मसलन, 1830 के दशक में न्यूयॉर्क जर्नल ऑफ कॉमर्स के एक पन्ने का आकार करीब 35 इंच चौड़ा और 58 इंच लंबा था. ऐसे विशाल पन्नों को 'ब्लैंकेट शीट' कहा जाता था.

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फिर छोटे अखबार यानी टैब्लॉयड (Tabloid)  कैसे आए?
अगर बड़े अखबार छापना इतना फायदेमंद था, तो फिर आज छोटे आकार के अखबार क्यों दिखाई देते हैं? दरअसल, 19वीं सदी के मध्य से ही छोटे आकार के अखबार लोकप्रिय होने लगे थे. इन्हें टैब्लॉयड (Tabloid) फॉर्मेट कहा जाने लगा. छोटे अखबारों को पकड़ना, मोड़ना और सार्वजनिक परिवहन में पढ़ना आसान था. इनमें खबरें भी आमतौर पर छोटी और सीधे मुद्दे पर लिखी जाती थीं. तस्वीरों और बड़ी हेडलाइन को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा. बाद में छोटे आकार के अखबारों के लिए भी यह नाम प्रचलित हो गया..

आज भी अखबार बड़े आकार में क्यों छपते हैं?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मोबाइल, वेबसाइट और सोशल मीडिया पर खबरें पढ़ना इतना आसान हो गया है, तब भी प्रिंट अखबारों का बड़ा आकार क्यों बना हुआ है? इसकी कुछ व्यावहारिक वजहें हैं. 

पहली वजह- ज्यादा खबरों के लिए जगह: बड़े पन्नों पर एक साथ कई खबरें, तस्वीरें, लेख और विज्ञापन लगाए जा सकते हैं. इससे अखबार में अलग-अलग विषयों को जगह देना आसान होता है.

दूसरी वजह- कई कॉलम में खबरें: बड़े अखबारों में खबरें अलग-अलग कॉलम में छापी जाती हैं. इससे एक ही पन्ने पर कई खबरें व्यवस्थित तरीके से दिखाई जा सकती हैं. पाठक अपनी पसंद की खबर आसानी से चुन सकता है.

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तीसरी वजह- पढ़ने का अनुभव: बड़े पन्नों पर बड़ी तस्वीरें, ग्राफिक्स, चार्ट और बड़ी हेडलाइन लगाना आसान होता है. इससे खबरों को आकर्षक तरीके से पेश किया जा सकता है.

चौथी वजह- पुरानी परंपरा और पहचान: अखबारों का बड़ा आकार सालों से उनकी पहचान बना हुआ है. कई पाठक बड़े पन्नों पर खबरें पढ़ने के आदी हैं. इसलिए कई प्रकाशक पुराने फॉर्मेट को बनाए रखते हैं.

हालांकि, अब कई अखबार छोटे या कॉम्पैक्ट आकार में भी छप रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि छोटे अखबारों को संभालना, ले जाना और पढ़ना आसान होता है. यानी आज अखबार का आकार पाठकों की सुविधा और प्रकाशक की जरूरत के हिसाब से तय किया जाता है.

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