भारत में कई बड़े- बड़े मंदिर हैं, जहां सालाना करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है. इनमें सोने, चांदी और अन्य जवाहरात भी होते हैं. हाल में ही अयोध्या के राम मंदिर में इसी चंदा और चढ़ावे के प्रबंधन से जुड़ी खामियों को लेकर एक मामला सामने आने के बाद मंदिरों के चढ़ावा के सिस्टम के बारे में जानने को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है. ऐसे में जानते हैं कि देश के उस मंदिर के चढ़ावा और चंदा सिस्टम के बारे में जहां सबसे ज्यादा दान के तौर पर कैश और सोना आता है. सोने के चढ़ावे के मामले में तिरुपति बालाजी मंदिर पहले नंबर पर है.
तिरुपति बाला जी मंदिर में 10-50 करोड़ नहीं बल्कि सैकड़ों करोड़ रुपये के कैश, सोना, चांदी, अन्य जवाहरातों के बने आभूषण चढ़ावे के रूप में श्रद्धालुओं की तरफ से दान किए जाते हैं. इनमें भारी मात्रा में मंदिर में सोना और उससे बने आभूषण चढ़ाए जाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इतने सारे चढ़ावे की गिनती और उनका मूल्यांकन कैसे किया जाता है.
तिरुपति बालाजी मंदिर या तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर के चढ़ावे और दान का मैनेजमेंट तिरुमाला तिरुपति देवस्थान (टीटीडी) प्रबंधन द्वारा किया जाता है. मंदिर में हर दिन एक करोड़ रुपये से ज्यादा का चढ़ावा आता है. विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, 2 से 5 करोड़ रुपये हर दिन सोने- चांदी के आभूषण और कैश के तौर पर आते हैं. मंदिर के दानपेटियों को कड़ी सुरक्षा के बीच हर दिन सील कर एक खास बिल्डिंग में ले जाकर रखा जाता है. इस बिल्डिंग का नाम पराकमणि भवन है.
यहां होती है चढ़ावे की गिनती
इसी पराकमणि भवन में चढ़ावे की गिनती होती है. दान और चढ़ावे की गिनती का भी एक सिस्टम है. चढ़ावे में कैश, नोट, सिक्के, सोना- चांदी के आभूषण, अलग-अलग जवाहरात, गोल्ड- सिल्वर कॉइन इन सबको पहले छांटकर अलग किया जाता है. फिर, इनकी गिनती की जाती है और तब इनका मूल्यांकन होता है. यह सारी प्रक्रिया कई सुरक्षा लेयर के बीच होती है. चढ़ावे की गिनती और उसके कैटोगराइजेशन के दौरान कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होती है और सबकुछ सीसीटीवी की निगरानी में होता है.
चढ़ावे की गिनती करने वाले कर्मचारियों और स्वयंसेवकों का पराकमणि भवन में प्रवेश एक विशेष ड्रेसकोड में होता है. गिनती के लिए जाने वाले लोग सिर्फ धोती पहनकर अंदर जाते हैं. गिनती करने जाने से पहले और गिनती करके आने के बाद भी कई चरणों में स्वयंसेवकों और मंदिर स्टाफ की सुरक्षा जांच होती है.
चढ़ावे में आए सोने और कैश का क्या होता है
कैश, नोट, सिक्के, फॉरेन करंसी की छंटाई और गिनती के बाद इन्हें अलग- अलग पेटियों में बंदकर मंदिर के ट्रेजरी में जमा कर दिया जाता है. ठीक इसी प्रकार सोने के आभूषणों, सिक्कों और बिस्कुट को भी अलग- अलग इक्कट्ठा कर मंदिर को कोषागार में रख दिया जाता है.
टीटीडी अलग- अलग तरीके से दान और चढ़ावे में आए कैश, सोने और चांदी का प्रबंधन करती है. चढ़ावे के तौर पर आए नकदी में से कुछ हिस्से को अलग- अलग बैंक में मंदिर के नाम से चल रहे खातों में जमा किया जाता है. वहीं कुछ हिस्से का मंदिर प्रबंधन और मंदिर की द्वारा किए जाने वाले विभिन्न कार्यों में खर्च किया जाता है.
अब बारी आती है आभूषणों और सोने की. मंदिर में चढ़ावे से आए सोने का विशाल भंडार है. कई हजार किलोग्राम सोना मंदिर के पास है. टीटीडी स्वर्ण आभूषणों को पिघला कर इसे बिस्कुट के रूप में ढालकर सोने के बड़े हिस्से को अलग- अलग राष्ट्रीयकृत बैंकों में गोल्ड डिपोजिट स्कीम के तहत जमा करके रखता है. इससे मंदिर प्रबंधन को सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये का इंटरेस्ट मिलता है.
समय- समय पर टीटीडी ने विभिन्न बैंकों में गोल्ड डिपोजिट स्कीम के तहत हजारों- हजार किलोग्राम सोना जमा करवाती है. तिरुपति बाला जी मंदिर के कोषागार में जमा होने वाले सोने के भंडार से समय - समय पर कुछ हिस्सा निकालकर टीटीडी अलग- अलग बैंकों में गोल्ड डिपोजिट स्कीम के तहत सोना जमा करके रखती है. इस तरह मंदिर को दान में मिलने वाले सोने का इस्तेमाल बैंकों में जमा करके इससे आने वाले ब्याज के रूप में सैकड़ों करोड़ रुपये के तौर पर टीटीडी अन्य लोक कल्याणकारी काम में करता है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक टीटीडी ने 2010 एसबीआई के साथ गोल्ड डिपोजिट प्लान के तहत 1,000 किलोग्राम सोना बैंक की गारंटी पर जमा कराया था. टीटीडी अवधि समाप्त होने पर अपना सोना और उस पर प्राप्त ब्याज, सोने या नकद के रूप में प्राप्त कर सकता है. इसी तरह 2014 में भी इसी बैंक में टीटीडी ने 1800 किलो सोना इसी स्कीम के तहत जमा कराया था.
aajtak.in