त्योहार आने वाले हों और घरों में तैयारियां शुरू न हों, ऐसा कैसे हो सकता है? कहीं घर की सफाई चल रही होती है, तो कहीं मिठाइयां बनाने और सजावट की प्लानिंग. बाजारों में रौनक बढ़ने लगती है. लोग नए कपड़े खरीदते हैं, घर सजाते हैं और परिवार के साथ त्योहार मनाने के सपने देखने लगते हैं. लेकिन इसी बीच कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिनके लिए त्योहार की आहट खुशी नहीं, बल्कि उदासी और बेचैनी लेकर आती है.
वे भी चाहते हैं कि उनके घर में रोशनी हो, परिवार के साथ बैठकर हंसी-मजाक हो और वे भी बाकी लोगों की तरह त्योहार मनाएं. लेकिन कई बार हालात ऐसे होते हैं कि चाहकर भी वे ऐसा नहीं कर पाते. किसी को नौकरी की वजह से घर से दूर रहना पड़ता है, किसी को ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलती, तो कोई पैसों की कमी के कारण त्योहार की तैयारी तक नहीं कर पाता. वहीं, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके बीच से कोई अपना हमेशा के लिए चला गया होता है. उनके लिए त्योहार की हर तैयारी उस इंसान की याद दिलाती है, जिसके बिना अब घर पहले जैसा नहीं रहा. ऐसे में सवाल उठता है कि जिस त्योहार का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, वही कुछ लोगों को अंदर से इतना परेशान क्यों कर देता है?
नौकरी के लिए घर से दूर रहने वालों को सताती है परिवार की याद
आज बड़ी संख्या में लोग नौकरी और काम के सिलसिले में अपने घर, शहर और परिवार से दूर रहते हैं. कोई दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद में काम कर रहा है, तो कोई दूसरे राज्यों में रहकर अपने परिवार का खर्च चला रहा है. रोजमर्रा की जिंदगी में वे काम में व्यस्त रहते हैं, लेकिन त्योहार करीब आते ही घर की याद सताने लगती है. उन्हें याद आता है कि पहले त्योहार से कई दिन पहले घर में कैसी रौनक होती थी. मां रसोई में पकवान बनाती थीं, पिता बाजार से सामान लेकर आते थे और भाई-बहन मिलकर घर सजाते थे. अब वही इंसान किसी दूसरे शहर के छोटे से कमरे में बैठकर मोबाइल पर घरवालों की बातें सुनता है.
वीडियो कॉल पर परिवार को खुश देखकर वह मुस्कुराता जरूर है, लेकिन मन में कहीं न कहीं घर पहुंचने की इच्छा होती है. कई बार वह टिकट भी देखता है, छुट्टी का इंतजार भी करता है, लेकिन काम की जिम्मेदारियां उसे घर जाने की इजाजत नहीं देतीं. ऐसे में त्योहार का दिन उसके लिए खुशियों के बजाय घर से दूर होने का एहसास और गहरा कर देता है.
छुट्टी नहीं मिलने पर त्योहार भी बन जाता है आम दिन
कई लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि त्योहार के मौके पर भी उन्हें ऑफिस जाना पड़ता है. कुछ कंपनियों में छुट्टियां नहीं मिलतीं, तो कहीं काम का दबाव इतना ज्यादा होता है कि कर्मचारी घर जाने की योजना ही नहीं बना पाते. कल्पना कीजिए, जब आपके घर में दिवाली की पूजा हो रही हो, परिवार के लोग एक साथ खाना खा रहे हों और आप उसी समय ऑफिस में काम कर रहे हों. मोबाइल पर परिवार की तस्वीरें और वीडियो आ रहे हों, लेकिन आप उनके बीच मौजूद न हों. ऐसी स्थिति में मन का उदास होना स्वाभाविक है. कई लोग अपनी नौकरी और जिम्मेदारियों की वजह से अपनी इच्छाओं को पीछे रख देते हैं. वे जानते हैं कि परिवार के पास जाने का मन है, लेकिन नौकरी भी जरूरी है. इस मजबूरी के बीच त्योहार का उत्साह धीरे-धीरे कम होने लगता है.
त्योहार मनाना चाहते हैं, लेकिन जेब साथ नहीं देती
त्योहारों पर बाजारों में रौनक देखकर हर किसी का मन खरीदारी करने का होता है. नए कपड़े, मिठाइयां, घर की सजावट, बच्चों के लिए खिलौने और परिवार के लिए छोटे-छोटे तोहफे खरीदने की इच्छा किसे नहीं होती? लेकिन हर किसी की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती. कई लोग महीने भर की कमाई से घर का किराया, राशन, बच्चों की फीस और दूसरे जरूरी खर्च पूरे करते हैं. ऐसे में त्योहार के लिए अलग से पैसे बचा पाना मुश्किल हो जाता है. वे भी चाहते हैं कि उनके बच्चे नए कपड़े पहनें, घर में मिठाइयां आएं और परिवार के चेहरे पर खुशी दिखे. लेकिन जब जेब में पैसे कम हों, तो छोटी-छोटी इच्छाएं भी अधूरी रह जाती हैं.
कई बार ऐसे लोग दूसरों को खरीदारी करते देखकर चुप हो जाते हैं. वे अपनी परेशानी किसी से बताते भी नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि त्योहार पर अपनी आर्थिक मजबूरी बताकर माहौल खराब क्यों करें. बाहर से वे सामान्य दिखाई देते हैं, लेकिन मन में इस बात का दुख रहता है कि वे अपने परिवार को वह खुशी नहीं दे पा रहे, जो देना चाहते हैं.
जिनके अपने दुनिया में नहीं रहे, उनके लिए त्योहार पहले जैसे नहीं होते
त्योहारों की सबसे खूबसूरत बात होती है अपनों का साथ. घर में सबका एक साथ होना, पुरानी बातें करना, हंसना और एक-दूसरे के साथ समय बिताना. लेकिन जब परिवार का कोई बेहद करीबी हमेशा के लिए चला जाता है, तो त्योहार की खुशियों का मतलब ही बदल जाता है. किसी ने अपने माता-पिता को खोया होता है, किसी ने जीवनसाथी को और किसी ने भाई-बहन या अपने बच्चे को. त्योहार आते ही उन्हें उन दिनों की याद आने लगती है, जब वह अपना इंसान उनके साथ मिलकर तैयारियां करता था.
कभी मां के हाथों से बनी मिठाई याद आती है, कभी पिता के साथ बाजार जाना और कभी किसी अपने का त्योहार पर सबसे पहले फोन करना. घर में सब कुछ पहले जैसा हो सकता है, लेकिन उस एक इंसान की कमी हर खुशी के बीच महसूस होती है. कई बार ऐसे लोग त्योहार की तैयारी शुरू करने से भी बचते हैं. जिस घर को कभी पूरा परिवार मिलकर सजाता था, अब वहां अकेले सजावट करने का मन नहीं करता.
जिस पूजा में कोई अपना हमेशा साथ बैठता था, उसी पूजा के समय उसकी खाली जगह आंखों में आंसू ला देती है. उनके लिए त्योहार सिर्फ एक तारीख नहीं होता, बल्कि उन यादों का दरवाजा होता है, जिन्हें वे रोजमर्रा की जिंदगी में किसी तरह संभालकर रखते हैं. इसलिए यह कहना आसान है कि त्योहार पर खुश रहना चाहिए, लेकिन किसी ऐसे इंसान के लिए यह कितना मुश्किल हो सकता है, जिसने अपना सबसे करीबी खोया हो, इसे समझना भी जरूरी है.
हर किसी के लिए परिवार के साथ त्योहार मनाना आसान नहीं होता. कुछ लोगों के घरों में रिश्तों के बीच तनाव रहता है, तो कुछ लोग त्योहार के दौरान भी घर की जिम्मेदारियों से घिरे रहते हैं. कई बार महिलाओं पर खाना बनाने, सफाई करने और मेहमानों की देखभाल करने का इतना दबाव होता है कि उन्हें खुद त्योहार का आनंद लेने का समय ही नहीं मिलता. वहीं, कुछ लोग परिवार के बीच रहकर भी अकेलापन महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि उनकी भावनाओं को कोई नहीं समझता. ऐसे में त्योहार उनके लिए खुशी से ज्यादा मानसिक थकान लेकर आते हैं.
दूसरों की खुशियां देखकर बढ़ जाता है अकेलापन
त्योहारों के दौरान सोशल मीडिया पर हर तरफ खुशहाल परिवारों की तस्वीरें दिखाई देती हैं. कोई अपने घर की सजावट दिखा रहा होता है, कोई परिवार के साथ घूम रहा होता है और कोई नए कपड़ों में तस्वीरें साझा कर रहा होता है. ऐसी तस्वीरें देखकर उन लोगों को और ज्यादा अकेलापन महसूस हो सकता है, जो किसी वजह से अपने परिवार के साथ त्योहार नहीं मना पा रहे हैं. उन्हें लग सकता है कि बाकी सभी की जिंदगी में खुशियां हैं, बस वे ही पीछे छूट गए हैं. हालांकि, सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीरें किसी की पूरी जिंदगी नहीं होतीं. हर परिवार की अपनी परेशानियां होती हैं, जो कैमरे में दिखाई नहीं देतीं.
हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे खुशी हो, यह जरूरी नहीं
हम अक्सर मान लेते हैं कि त्योहार का मतलब खुश होना, अच्छे कपड़े पहनना, मिठाई खाना और लोगों से मिलना है. लेकिन यह भूल जाते हैं कि हर इंसान की जिंदगी और परिस्थितियां अलग होती हैं. किसी को घर की याद सता रही होती है, कोई छुट्टी नहीं मिलने से परेशान होता है, किसी की जेब त्योहार की तैयारी की इजाजत नहीं देती और कोई अपने बिछड़े हुए अपनों को याद कर रहा होता है. ऐसे में हर किसी से एक जैसा उत्साह दिखाने की उम्मीद करना सही नहीं है.
इसलिए अगर आपके आसपास कोई व्यक्ति त्योहार के दिनों में चुप है, ज्यादा बात नहीं कर रहा या तैयारियों में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा, तो उसे जबरदस्ती खुश करने की कोशिश करने के बजाय उसकी बात सुनें. हो सकता है उसे किसी सलाह की नहीं, सिर्फ थोड़े समय, अपनापन और समझ की जरूरत हो. आखिरकार, त्योहार सिर्फ घरों को रोशनी से सजाने का नाम नहीं हैं. इनका असली मतलब अपनों के साथ होना, एक-दूसरे की भावनाओं को समझना और खुशियां बांटना है. और कभी-कभी किसी उदास इंसान के पास बैठकर उसका हाल पूछ लेना भी त्योहार की सबसे खूबसूरत शुरुआत हो सकती है.
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