बचपन में जब कोई काम समझ नहीं आता, तो हम तुरंत किसी से पूछ लेते हैं. होमवर्क नहीं बना तो माता-पिता से मदद मांग ली, साइकिल नहीं चली तो किसी बड़े को बुला लिया और किसी बात का डर लगा तो दोस्तों से कह दिया. लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमारे ऊपर जिम्मेदारियां बढ़ती जाती हैं और धीरे-धीरे एक ऐसी आदत बन जाती है कि हर परेशानी खुद ही संभालनी है. नौकरी, पैसा, परिवार, रिश्ते और भविष्य की चिंता के बीच कई लोग अपनी परेशानियां किसी से शेयर तक नहीं करते. बाहर से वे बिल्कुल सामान्य और मजबूत दिखाई देते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर बहुत कुछ अकेले झेल रहे होते हैं.
कई लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने किसी से मदद मांगी तो सामने वाला उन्हें कमजोर समझेगा. खासकर उन लोगों में यह सोच ज्यादा देखने को मिलती है, जिन्हें लंबे समय से अपने फैसले खुद लेने और जिम्मेदारियां संभालने की आदत रही है. उन्हें लगता है कि दूसरे लोगों को अपनी परेशानी बताने से वे किसी पर बोझ बन जाएंगे. इसलिए चाहे काम कितना भी मुश्किल क्यों न हो, वे कहते हैं, 'मैं संभाल लूंगा'. लेकिन हर बार खुद ही सब कुछ संभालने की कोशिश धीरे-धीरे मानसिक दबाव बढ़ा सकती है. जब इंसान अपनी परेशानी किसी से शेयर नहीं करता, तो छोटी समस्या भी उसके दिमाग में बहुत बड़ी लगने लगती है.
मदद मांगना कमजोरी नहीं है
सबसे जरूरी बात यह समझना है कि मदद मांगना कमजोरी की निशानी नहीं है. बल्कि कई परिस्थितियों में यह समझदारी का संकेत हो सकता है. मान लीजिए किसी व्यक्ति पर ऑफिस का काम, घर की जिम्मेदारी और आर्थिक तनाव एक साथ है. अगर वह सब कुछ अकेले संभालने की कोशिश करेगा, तो उसके लिए तनाव और थकान बढ़ना स्वाभाविक है. वहीं अगर वह परिवार, दोस्त या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी परेशानी शेयर करता है, तो उसे समस्या को दूसरे नजरिए से देखने का मौका मिल सकता है. कई बार हमें समाधान की जरूरत भी नहीं होती. सिर्फ किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो हमारी बात शांति से सुन सके.
बचपन के अनुभव भी डाल सकते हैं असर
कुछ लोगों को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि रोना नहीं है, शिकायत नहीं करनी है और अपनी परेशानी खुद संभालनी है. ऐसे लोग बड़े होकर भी अपनी भावनाओं को दबाने लगते हैं. अगर बचपन में किसी व्यक्ति को मदद मांगने पर डांट मिली हो या उसकी परेशानी को गंभीरता से नहीं लिया गया हो, तो आगे चलकर उसके लिए दूसरों पर भरोसा करना मुश्किल हो सकता है. वह अपनी जरूरत बताने के बजाय सब कुछ खुद करने की कोशिश करता है. यही वजह है कि कई बार बाहर से बहुत आत्मनिर्भर दिखने वाला व्यक्ति अंदर से बेहद थका हुआ हो सकता है.
हर चीज खुद करना जरूरी नहीं
आज की तेज जिंदगी में 'मैं सब कर सकता हूं' वाली सोच को अक्सर सफलता से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन सच यह है कि इंसान हर काम अकेले नहीं कर सकता. कभी दोस्त की मदद चाहिए होती है, कभी परिवार की, कभी किसी सहकर्मी की सलाह और कभी किसी एक्सपर्ट की. सही समय पर मदद मांग लेने से समस्या जल्दी सुलझ सकती है और मानसिक दबाव भी कम हो सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि हर छोटी बात के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाएं. आत्मनिर्भर रहना अच्छी बात है, लेकिन जरूरत पड़ने पर मदद स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी है.
मजबूत होने का मतलब सब कुछ अकेले सहना नहीं
मजबूत इंसान वह नहीं है जो कभी किसी की मदद न ले. असली मजबूती यह समझने में है कि कब खुद कोशिश करनी है और कब किसी का साथ लेना जरूरी है. अगर आप लंबे समय से किसी परेशानी को अकेले लेकर चल रहे हैं, तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करके देखिए. हो सकता है समस्या तुरंत खत्म न हो, लेकिन मन का बोझ जरूर थोड़ा कम हो जाए. क्योंकि जिंदगी में हर जिम्मेदारी अकेले उठाना जरूरी नहीं है. कई बार एक छोटी सी मदद, एक बातचीत या किसी का साथ उस बोझ को काफी हल्का कर सकता है, जिसे हम लंबे समय से अकेले ढो रहे होते हैं.
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