Personality Test: हम सभी से कभी न कभी गलती होती है. कोई गलती छोटी होती है तो कोई बड़ी. समझदार इंसान आमतौर पर गलती का एहसास होने पर उसे मान लेता है और उसे सुधारने की कोशिश करता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो गलती सामने होने के बाद भी उसे मानने के लिए तैयार नहीं होते. आपने भी ऐसे लोगों को देखा होगा. उनसे कोई गलती हो जाए तो वे माफी मांगने के बजाय बहस करने लगते हैं. कई बार अपनी गलती का ठीकरा किसी और के सिर फोड़ देते हैं. कुछ लोग तो बात ही बदल देते हैं, ताकि उनकी गलती पर चर्चा न हो.
आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या इन लोगों को अपनी गलती दिखाई नहीं देती या फिर वे जानबूझकर उसे मानने से बचते हैं? मनोविज्ञान के हिसाब से इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं.
अपनी गलती मानने से इज्जत कम होने का डर
साइकोलॉजिस्ट आन्या शर्मा कहती हैं कि कुछ लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने अपनी गलती मान ली तो सामने वाला उन्हें कम समझेगा. उन्हें डर रहता है कि लोग उन्हें कमजोर या कम समझदार समझ सकते हैं. इसी वजह से वे गलती स्वीकार करने के बजाय खुद को सही साबित करने में लग जाते हैं. लेकिन असल में अपनी गलती मान लेना कमजोरी नहीं है. अपनी गलती समझना और उसे सुधारना अच्छी बात मानी जाती है.
अहंकार भी बड़ी वजह हो सकता है
कुछ लोगों को अपनी बात गलत मानना बहुत मुश्किल लगता है. उन्हें लगता है कि जो वे कह रहे हैं, वही सही है. ऐसे में अगर कोई उनकी गलती बता दे तो वे अपनी बात पर अड़ जाते हैं. छोटी-सी बात भी बहस में बदल सकती है. उनका ध्यान गलती सुधारने पर कम और इस बात पर ज्यादा होता है कि "मैं गलत कैसे हो सकता हूं?"
अपनी आलोचना सुनना पसंद नहीं करते
कुछ लोग अपनी कमी या गलती के बारे में सुनते ही नाराज हो जाते हैं. अगर कोई उनसे कह दे कि आपसे यहां गलती हुई है, तो वे तुरंत जवाब दे सकते हैं, "तुमने भी तो गलती की थी." यानी अपनी गलती पर बात करने के बजाय वे सामने वाले की गलती निकालने लगते हैं. कुछ लोग गलती मानने से इसलिए बचते हैं क्योंकि उन्हें उसके नतीजे की चिंता होती है.
उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने कह दिया कि गलती उनकी थी, तो उन्हें जवाब देना पड़ेगा या नुकसान की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ेगी. इसलिए वे कह सकते हैं, "मुझे पता नहीं था", "मुझे बताया नहीं गया था" या "इसमें मेरी गलती नहीं है." अगर कोई व्यक्ति बार-बार ऐसा करता है तो धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन सकती है.
पुराने अनुभवों का भी असर हो सकता है
हर बार गलती न मानने के पीछे अहंकार ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है. कुछ लोगों को बचपन में गलती करने पर बहुत डांट पड़ती थी या उन्हें सबके सामने शर्मिंदा किया जाता था. ऐसे अनुभवों के कारण बड़े होने पर भी उन्हें अपनी गलती मानने में डर लग सकता है. उन्हें लगता है कि गलती स्वीकार करते ही सामने वाला उन्हें दोष देने लगेगा.
खुद को हमेशा सही समझना
कुछ लोगों को अपनी सोच पर इतना भरोसा होता है कि वे दूसरे की बात सुनना ही नहीं चाहते. उन्हें लगता है कि उनका अनुभव सही है और सामने वाला गलत है. ऐसे लोगों के साथ बातचीत में अक्सर यही होता है कि वे आपकी बात समझने के बजाय आपको गलत साबित करने की कोशिश करते रहते हैं. कई बार गलती किसी काम में नहीं, बल्कि व्यवहार में होती है. जैसे किसी को गुस्से में कुछ बुरा बोल देना या किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचा देना. लेकिन कुछ लोग बाद में यह कहकर बात खत्म करने की कोशिश करते हैं, "अरे, मैं तो मजाक कर रहा था."
इस तरह वे यह मानने से बचते हैं कि उनकी बात से सामने वाले को दुख पहुंचा.
कुछ लोग अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय उसके लिए किसी दूसरे को जिम्मेदार ठहरा देते हैं. जैसे किसी से गुस्से में गलत बात कहने के बाद कहना, "तुमने मुझे गुस्सा दिलाया, इसलिए मैंने ऐसा कहा." इसमें व्यक्ति अपने व्यवहार की जिम्मेदारी खुद लेने के बजाय उसकी वजह सामने वाले को बता रहा है.
क्या ऐसे लोग बुरे ही होते हैं?
हर बार अपनी गलती न मानने वाला व्यक्ति बुरा इंसान हो, ऐसा कहना सही नहीं होगा. कई बार डर, शर्मिंदगी, गुस्सा या अपनी इज्जत बचाने की कोशिश भी इसकी वजह हो सकती है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति हर बार गलती करता है, उसे मानता नहीं, सामने वाले को दोष देता है और अपनी गलती सुधारने की कोशिश भी नहीं करता, तो यह उसके व्यवहार का हिस्सा बन सकता है.
ऐसे लोगों की पहचान कैसे करें?
ऐसे व्यक्ति की पहचान उसके बार-बार होने वाले व्यवहार से की जा सकती है. अगर वह अपनी गलती होने पर बहाने बनाता है, बात बदल देता है, सामने वाले की गलतियां गिनाने लगता है या हर बार खुद को सही साबित करने की कोशिश करता है, तो समझा जा सकता है कि वह अपनी गलती की जिम्मेदारी लेने से बच रहा है. ऐसे व्यक्ति से हर छोटी बात पर बहस करना जरूरी नहीं है. कई बार शांत रहना और अपनी बात साफ तरीके से कहना ज्यादा बेहतर होता है.
गलती मान लेना कमजोरी नहीं
आखिर में सबसे जरूरी बात यही है कि गलती हर इंसान से होती है.लेकिन गलती होने के बाद उसे मान लेना और उसे दोबारा न दोहराने की कोशिश करना इंसान को बेहतर बनाता है.जो व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार कर लेता है, वह उससे सीख सकता है. वहीं, जो हर बार अपनी गलती छिपाने या खुद को सही साबित करने में लगा रहता है, उसके लिए अपनी गलतियों से सीखना मुश्किल हो सकता है. इसलिए अगली बार किसी से गलती हो और वह उसे मान ले, तो उसे कमजोर समझने के बजाय यह भी देखा जा सकता है कि उसमें अपनी गलती स्वीकार करने और खुद को सुधारने की हिम्मत है.
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