Psychology Facts: छुट्टी में घर से बाहर निकलने का मन नहीं करता? ऐसे लोगों के बारे में क्या कहती है साइकोलॉजी

छुट्टी के दिन पूरा समय कमरे में बिताने वाले लोगों को सिर्फ आलसी या इंट्रोवर्ट मानना सही नहीं है. साइकोलॉजी की रिसर्च बताती है कि अकेले समय का असर इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति उसे अपनी इच्छा से चुन रहा है या मजबूरी में अकेला है.

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अक्सर माना जाता है कि जो लोग छुट्टी में कमरे से बाहर नहीं निकलते, वे इंट्रोवर्ट होते हैं. ( Photo: ITG) अक्सर माना जाता है कि जो लोग छुट्टी में कमरे से बाहर नहीं निकलते, वे इंट्रोवर्ट होते हैं. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:59 PM IST

पूरे हफ्ते काम, ऑफिस, पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियां और लोगों से बातचीत के बाद जैसे ही छुट्टी आती है, कुछ लोग घूमने-फिरने का प्लान बनाने लगते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें छुट्टी के दिन बस अपने कमरे में रहना पसंद होता है. सुबह देर तक सोना, फोन चलाना, फिल्म या सीरीज देखना, किताब पढ़ना या बस चुपचाप बिस्तर पर पड़े रहना... इनके लिए यही परफेक्ट छुट्टी होती है.

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अगर आप भी छुट्टी का पूरा दिन कमरे में गुजार देते हैं, तो जरूरी नहीं कि आप आलसी हैं या लोगों से नफरत करते हैं. साइकोलॉजी में अकेले समय बिताने को काफी अलग तरीके से देखा जाता है. रिसर्च बताती है कि अकेले रहने का अनुभव इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे अपनी इच्छा से चुन रहे हैं या मजबूरी में अकेले हैं. 

अकेले रहना पसंद है तो जरूरी नहीं इंट्रोवर्ट हों
अक्सर माना जाता है कि जो लोग छुट्टी में कमरे से बाहर नहीं निकलते, वे इंट्रोवर्ट होते हैं. लेकिन साइकोलॉजी की रिसर्च इस बात को नहीं मानती. 2022 में प्रकाशित एक रिसर्च में दो डायरी स्टडी की गईं, जिसमें लोगों के रोजाना अकेले बिताए समय और उनके बिहेवियर को देखा गया. रिसर्च में पाया गया कि अकेले समय को पसंद करना सिर्फ इंट्रोवर्ट होने से तय नहीं होता. किसी व्यक्ति के लिए अकेले रहना इसलिए भी अच्छा हो सकता है क्योंकि वह अपने समय और फैसलों पर खुद का कंट्रोल पसंद करता है.

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यानी अगर कोई व्यक्ति छुट्टी के दिन कमरे में रहकर खुश है, खुद को रिलैक्स महसूस कर रहा है और अगले दिन के लिए बेहतर महसूस करता है, तो इसमें कोई असामान्य बात नहीं है.

ऐसे लोगों को 'मी-टाइम' पसंद हो सकता है
पूरे हफ्ते लोगों के साथ काम करने और लगातार बातचीत करने के बाद कुछ लोगों को खुद के साथ समय बिताना अच्छा लगता है. छुट्टी का दिन उनके लिए सामाजिक मेलजोल से ब्रेक लेने का मौका बन जाता है. 2024 की एक बड़ी रिसर्च समीक्षा में पाया गया कि अकेले रहने का फायदा सिर्फ किसी एक पर्सनैलिटी तक सीमित नहीं है. अलग-अलग लोग अलग कारणों से अकेले समय को चुन सकते हैं. किसी के लिए यह शांति पाने का तरीका हो सकता है, तो कोई व्यक्ति खुद के विचारों के साथ समय बिताने के लिए ऐसा करता है. 

कमरे में रहकर दिमाग को क्या मिलता है?
छुट्टी में कमरे में रहना कई लोगों के लिए मानसिक तौर पर 'ब्रेक' जैसा हो सकता है. पूरे हफ्ते दूसरे लोगों की जरूरतों, काम और जिम्मेदारियों के हिसाब से चलने के बाद जब इंसान अपनी पसंद का समय बिताता है तो उसे अपने ऊपर नियंत्रण होने का एहसास होता है.

एक 21 दिन की डायरी स्टडी में 178 लोगों के रोजाना अकेले और सामाजिक समय को देखा गया. इसमें पाया गया कि जिन दिनों लोगों ने अपनी इच्छा से अकेले समय बिताया, उन दिनों उन्हें कम तनाव और ज्यादा क्रिएटिव यानी अपने फैसलों पर कंट्रोल का अनुभव हुआ. इसका मतलब यह नहीं कि जितना ज्यादा अकेले रहेंगे, उतना ही अच्छा होगा. बल्कि अपनी इच्छा से लिया गया थोड़ा अकेला समय कई लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है.

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लेकिन कब चिंता की बात हो सकती है?
यहां एक फर्क समझना बहुत जरूरी है. अगर कोई व्यक्ति छुट्टी के दिन कमरे में इसलिए रहना चाहता है क्योंकि उसे शांति पसंद है और वह इस दौरान खुश रहता है, तो यह सामान्य व्यवहार हो सकता है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति लगातार लोगों से बचने लगे, कमरे से बाहर निकलने का मन ही न करे, पहले पसंद आने वाली चीजों में भी रुचि न रहे या अकेले रहते हुए लगातार नकारात्मक विचार आते रहें, तो इसे सिर्फ 'इंट्रोवर्ट पर्सनेलिटी' कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कुछ रिसर्च में यह भी पाया गया है कि अकेले रहने के दौरान अगर व्यक्ति लगातार नकारात्मक सोचने लगता है तो इसका असर उसकी जिंदगी पर पड़ सकता है. 

साइकोलॉजी के हिसाब से सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कोई व्यक्ति कितने घंटे अकेले कमरे में रहता है. ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह अकेला क्यों रह रहा है और उस दौरान कैसा महसूस कर रहा है. अगर कमरे में पूरा दिन बिताने के बाद आप खुद को शांत, तरोताजा और खुश महसूस करते हैं, तो हो सकता है कि यह आपका जरूरी 'मी टाइम' हो.

लेकिन अगर कमरे में रहना लोगों से डरने, किसी से मिलने की इच्छा खत्म होने या लगातार उदासी और नकारात्मक सोच से जुड़ा है, तो मामला अलग हो सकता है. इसलिए अगली बार जब कोई छुट्टी के दिन पूरा समय कमरे में बिताए, तो उसे तुरंत आलसी या 'अजीब' कहने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह अकेलेपन से भाग रहा है या अपनी शांति के लिए अकेले समय को चुन रहा है.

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पूरे हफ्ते काम, ऑफिस, पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियां और लोगों से बातचीत के बाद जैसे ही छुट्टी आती है, कुछ लोग घूमने-फिरने का प्लान बनाने लगते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें छुट्टी के दिन बस अपने कमरे में रहना पसंद होता है. सुबह देर तक सोना, फोन चलाना, फिल्म या सीरीज देखना, किताब पढ़ना या बस चुपचाप बिस्तर पर पड़े रहना... इनके लिए यही परफेक्ट छुट्टी होती है.

अगर आप भी छुट्टी का पूरा दिन कमरे में गुजार देते हैं, तो जरूरी नहीं कि आप आलसी हैं या लोगों से नफरत करते हैं. साइकोलॉजी में अकेले समय बिताने को काफी अलग तरीके से देखा जाता है. रिसर्च बताती है कि अकेले रहने का अनुभव इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे अपनी इच्छा से चुन रहे हैं या मजबूरी में अकेले हैं. 

अकेले रहना पसंद है तो जरूरी नहीं इंट्रोवर्ट हों
अक्सर माना जाता है कि जो लोग छुट्टी में कमरे से बाहर नहीं निकलते, वे इंट्रोवर्ट होते हैं. लेकिन साइकोलॉजी की रिसर्च इस बात को नहीं मानती. 2022 में प्रकाशित एक रिसर्च में दो डायरी स्टडी की गईं, जिसमें लोगों के रोजाना अकेले बिताए समय और उनके बिहेवियर को देखा गया. रिसर्च में पाया गया कि अकेले समय को पसंद करना सिर्फ इंट्रोवर्ट होने से तय नहीं होता. किसी व्यक्ति के लिए अकेले रहना इसलिए भी अच्छा हो सकता है क्योंकि वह अपने समय और फैसलों पर खुद का कंट्रोल पसंद करता है.

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यानी अगर कोई व्यक्ति छुट्टी के दिन कमरे में रहकर खुश है, खुद को रिलैक्स महसूस कर रहा है और अगले दिन के लिए बेहतर महसूस करता है, तो इसमें कोई असामान्य बात नहीं है.

ऐसे लोगों को 'मी-टाइम' पसंद हो सकता है
पूरे हफ्ते लोगों के साथ काम करने और लगातार बातचीत करने के बाद कुछ लोगों को खुद के साथ समय बिताना अच्छा लगता है. छुट्टी का दिन उनके लिए सामाजिक मेलजोल से ब्रेक लेने का मौका बन जाता है. 2024 की एक बड़ी रिसर्च समीक्षा में पाया गया कि अकेले रहने का फायदा सिर्फ किसी एक पर्सनैलिटी तक सीमित नहीं है. अलग-अलग लोग अलग कारणों से अकेले समय को चुन सकते हैं. किसी के लिए यह शांति पाने का तरीका हो सकता है, तो कोई व्यक्ति खुद के विचारों के साथ समय बिताने के लिए ऐसा करता है. 

कमरे में रहकर दिमाग को क्या मिलता है?
छुट्टी में कमरे में रहना कई लोगों के लिए मानसिक तौर पर 'ब्रेक' जैसा हो सकता है. पूरे हफ्ते दूसरे लोगों की जरूरतों, काम और जिम्मेदारियों के हिसाब से चलने के बाद जब इंसान अपनी पसंद का समय बिताता है तो उसे अपने ऊपर नियंत्रण होने का एहसास होता है.

एक 21 दिन की डायरी स्टडी में 178 लोगों के रोजाना अकेले और सामाजिक समय को देखा गया. इसमें पाया गया कि जिन दिनों लोगों ने अपनी इच्छा से अकेले समय बिताया, उन दिनों उन्हें कम तनाव और ज्यादा क्रिएटिविटी यानी अपने फैसलों पर कंट्रोल का अनुभव हुआ. इसका मतलब यह नहीं कि जितना ज्यादा अकेले रहेंगे, उतना ही अच्छा होगा. बल्कि अपनी इच्छा से लिया गया थोड़ा अकेला समय कई लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है.

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लेकिन कब चिंता की बात हो सकती है?
यहां एक फर्क समझना बहुत जरूरी है. अगर कोई व्यक्ति छुट्टी के दिन कमरे में इसलिए रहना चाहता है क्योंकि उसे शांति पसंद है और वह इस दौरान खुश रहता है, तो यह सामान्य व्यवहार हो सकता है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति लगातार लोगों से बचने लगे, कमरे से बाहर निकलने का मन ही न करे, पहले पसंद आने वाली चीजों में भी रुचि न रहे या अकेले रहते हुए लगातार नकारात्मक विचार आते रहें, तो इसे सिर्फ 'इंट्रोवर्ट पर्सनेलिटी' कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कुछ रिसर्च में यह भी पाया गया है कि अकेले रहने के दौरान अगर व्यक्ति लगातार नकारात्मक सोचने लगता है तो इसका असर उसकी जिंदगी पर पड़ सकता है.  साइकोलॉजी के हिसाब से सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कोई व्यक्ति कितने घंटे अकेले कमरे में रहता है. ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह अकेला क्यों रह रहा है और उस दौरान कैसा महसूस कर रहा है. अगर कमरे में पूरा दिन बिताने के बाद आप खुद को शांत, तरोताजा और खुश महसूस करते हैं, तो हो सकता है कि यह आपका जरूरी 'मी टाइम' हो.

लेकिन अगर कमरे में रहना लोगों से डरने, किसी से मिलने की इच्छा खत्म होने या लगातार उदासी और नकारात्मक सोच से जुड़ा है, तो मामला अलग हो सकता है. इसलिए अगली बार जब कोई छुट्टी के दिन पूरा समय कमरे में बिताए, तो उसे तुरंत आलसी या 'अजीब' कहने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह अकेलेपन से भाग रहा है या अपनी शांति के लिए अकेले समय को चुन रहा है.

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