2 अक्टूबर 1941 ऑपरेशन टाइफून शुरू हुआ था. यह हिटलर का एक महत्वाकांक्षी मिलिट्री अभियान था. जर्मन सेना ने इस दिन हिटलर के आदेश पर मॉस्को पर हमला किया था. हिटलर हर हाल में पूरे रूस पर कब्जा करना चाहता था. लेकिन, उन्हें सिर्फ जली हुई जमीन मिली. रूसी किसानों ने 'जली हुई धरती' की नीति अपनाई और दो महीने तक युद्ध लड़ने के बाद हिटलर की सेना को पीछे हटना पड़ा. इस तरह हिटलर की रूस पर कब्जे की मंशा अधूरी रह गई.
मॉस्को पर कब्जे की लड़ाई ऑपरेशन टाइफून के नाम से एक सैन्य अभियान के रूप में शरू हुआ था. इससे पहले भी मॉस्को तक पहुंचने के लिए हिटलर ने ऑपरेशन बारबारोसा शुरू किया था. पूरी सोवियत सेनाओं को नष्ट करने के लिए ब्लिट्जक्रेग रणनीति का इस्तेमाल किया गया. यानी एक साथ हवाई हमला, टैंक से आक्रमण और पैदल सेना का आगे बढ़ना. ऐसा करके हिटलर के सैनिक रूस में अंदर घुस गए थे.
जर्मन आर्मी का ग्रुप नॉर्थ लेनिनग्राद की ओर बढ़ा. आर्मी ग्रुप साउथ ने यूक्रेन पर नियंत्रण कर लिया. वहीं आर्मी ग्रुप सेंटर मॉस्को की ओर बढ़ा. जुलाई 1941 तक आर्मी ग्रुप सेंटर ने मॉस्को के रास्ते पर नीपर नदी को पार कर लिया था. 16 जुलाई 1941 को जर्मन सेना ने मॉस्को के रास्ते में एक महत्वपूर्ण गढ़ स्मोलेंस्क पर कब्जा कर लिया.
यहां तक पहुंचने के बाद हिटलर ने मॉस्को को कमजोर आंका और उस पर आक्रमण से पहले ऐसे शहरों पर हमले किये जहां से उन्हें लगा कि रूस अपने खनिज और खाद्य संसाधन को सुरक्षित कर सकता है.
हिटलर ने लेनिनग्राद और कीव में सोवियत सेना को खत्म करने के लिए उत्तर और दक्षिण की ओर हमले का आदेश दिया. इस कारण मॉस्को पर जर्मन सेना के आगे बढ़ने में देरी हो गई. गर्मियों के अंत में हिटलर ने अपना ध्यान मॉस्को की ओर लगाया और आर्मी ग्रुप सेंटर को यह कार्य सौंपा.
30 सितंबर 1941 को फिर से मॉस्को पर चढ़ाई की तैयारी शुरू हुई और ऑपरेशन टाइफून की रणनीति बनी. इसके बाद 2 अक्टूबर 1941 को ऑपरेशन टाइफून शुरू किया गया. यह लड़ाई जनवरी 1942 तक लड़ी गई. इस दौरान सोवियत सेना ने हिटलर के मॉस्को पर हमले को विफल कर दिया. क्योंकि, तबतक ठंड शुरू हो चुकी थी.
कहा जाता है कि कुछ जर्मन जनरलों ने हिटलर को ऑपरेशन टाइफून शुरू करने को लेकर चेतावनी दी थी. क्योंकि रूस में कठोर सर्दी शुरू हो गई थी. लेकिन जनरल बॉक ने आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. चूंकि जर्मन सेना ने सितंबर के अंत में कीव शहर पर कब्जा कर लिया था. इसलिए हिटलर ने घोषणा कि- दुश्मन टूट चुका है और फिर कभी उठने की स्थिति में नहीं होगा. इसलिए 2 अक्टूबर को 10 दिनों के लिए ऑपरेशन टाइफून शुरू किया गया, जिसका मकसद मॉस्को पर कब्जा करना था, जो हर दिन सोवियत राजधानी के करीब पहुंच रहा था.
जर्मन सैनिक बिना सर्दियों के कपड़ों के ऐसे उपकरणों का उपयोग करके ठंड से कांप रहे थे जो ऐसे कम तापमान के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए थे. 130,000 से अधिक जर्मन सैनिकों की ठंड से मौत हो गई.जमे हुए ग्रीस को हर लोड किए गए शेल से निकालना पड़ता था. वाहनों को इस्तेमाल से पहले घंटों तक गर्म करना पड़ता था. वहीं ठंडा मौसम सोवियत सैनिकों को भी झेलना पड़ा, लेकिन वे बेहतर तरीके से तैयार थे. सोवियत सैनिकों के बाद ठंड के लिए सटीक कपड़े और जूते थे, जो जर्मन कपड़ों की तुलना में बेहतर स्थिति में होते थे.
एक जर्मन सैन्य अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि मॉस्को पर आक्रमण विफल हो गया .हमने दुश्मन की ताकत, साथ ही उसके आकार और जलवायु को कम करके आंका. सौभाग्य से, मैंने 5 दिसंबर को अपने सैनिकों को रोक दिया, अन्यथा तबाही अपरिहार्य थी. जर्मन खुफिया ने अनुमान लगाया कि सोवियत सेना के पास और कोई भंडार नहीं बचा था और इस तरह वह जवाबी हमला करने में असमर्थ होगी. यह अनुमान गलत साबित हुआ.
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