जब नेपच्यून की खोज हुई, ऐसे मिला था आठवां ग्रह

आज के दिन ही सौरमंडल के आठवें ग्रह नेपच्यून की खोज हुई थी. वैज्ञानिकों ने पहले अंदाजा लगाया कि एक और ग्रह है जो सूरज का चक्कर लगा रहा है. उसके बाद उसे दूरबीन से खोजा गया.

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सोलर सिस्टम के आठवें ग्रह नेप्च्यून की ऐसे हुई थी खोज (Photo - Pexels) सोलर सिस्टम के आठवें ग्रह नेप्च्यून की ऐसे हुई थी खोज (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:39 PM IST

23 सितंबर 1846 की तारीख खगोल विज्ञान के इतिहास में बेहद खास है. इसी दिन जर्मन एस्ट्रोनॉमर जोहान गॉटफ्राइड गाले ने बर्लिन ऑब्जर्वेटरी से नेपच्यून को खोजा था. खास बात यह थी कि इस ग्रह की जगह के बारे में पहले ही गणना कर ली गई थी. सौर मंडल में कुल आठ ग्रह हैं और इनमें नेपच्यून सूर्य से सबसे दूर मौजूद ग्रह है.

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 क्या आप जानते हैं कि नेपच्यून की खोज सिर्फ दूरबीन से आसमान में देखकर नहीं की गई थी? वैज्ञानिकों ने पहले गणित के जरिए इसकी मौजूदगी का अंदाजा लगाया और फिर आसमान में उसे खोज निकाला.

पहले गणित ने बताया कि कोई ग्रह मौजूद है
नेपच्यून की खोज की कहानी यूरेनस से शुरू होती है. वैज्ञानिकों ने देखा कि यूरेनस की कक्षा में कुछ ऐसी हलचल हो रही है, जिसे सिर्फ उसके आसपास मौजूद ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण से पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता.

फ्रांसीसी खगोलशास्त्री अर्बेन-जीन-जोसफ ले वेरियर ने यूरेनस की गति में हो रहे इन बदलावों का अध्ययन किया. उन्होंने अनुमान लगाया कि शायद यूरेनस के आगे कोई ऐसा ग्रह मौजूद है, जिसका गुरुत्वाकर्षण यूरेनस की कक्षा को प्रभावित कर रहा है.इसके बाद उन्होंने गणना के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की कि वह अज्ञात ग्रह आसमान के किस हिस्से में मौजूद हो सकता है.

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ले वेरियर ने अपनी गणना के नतीजे जर्मन खगोलशास्त्री जोहान गॉटफ्राइड गाले को भेजे. 23 सितंबर 1846 को गाले ने बर्लिन ऑब्जर्वेटरी में अपने सहायक हेनरिक लुइस डी'आरेस्ट के साथ आसमान में उस जगह की तलाश शुरू की. उसी रात उन्हें एक ऐसी वस्तु दिखाई दी, जो वहां मौजूद बाकी तारों से अलग थी.

लेकिन सिर्फ एक रात उसे देखकर यह तय नहीं किया जा सकता था कि वह ग्रह है या कोई दूसरा खगोलीय पिंड. इसलिए वैज्ञानिकों ने करीब 24 घंटे बाद फिर से उस जगह को देखा. तब पता चला कि वह वस्तु पृष्ठभूमि के तारों के मुकाबले अपनी जगह बदल चुकी थी.

यही हलचल इस बात का सबूत थी कि वह कोई स्थिर तारा नहीं बल्कि एक ग्रह है. इस तरह नेपच्यून की खोज की पुष्टि हुई. नेपच्यून एक नीला गैस दानव यानी गैस जाइंट है. इसका व्यास पृथ्वी के व्यास का करीब चार गुना है. 

इसे 'नेपच्यून' नाम रोमन समुद्र देवता के नाम पर दिया गया. यह सूर्य से औसतन सबसे दूर स्थित ग्रह है और इसे सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में करीब 165 साल लगते हैं. यानी अगर कोई व्यक्ति नेपच्यून पर पैदा हो, तो वहां उसका एक साल पृथ्वी के 165 साल के बराबर होगा.

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नेपच्यून के कितने चंद्रमा हैं?
नेपच्यून के अब तक 14 ज्ञात चंद्रमा हैं. इनमें सबसे बड़ा चंद्रमा ट्राइटन है. नेपच्यून के चारों ओर छल्लों का एक सिस्टम भी मौजूद है. इसमें तीन चमकीले और दो अपेक्षाकृत धुंधले छल्ले शामिल हैं.

हालांकि शनि के छल्लों की तरह नेपच्यून के छल्ले इतने आसानी से दिखाई नहीं देते. नेपच्यून की खोज के करीब 143 साल बाद मानव निर्मित अंतरिक्ष यान पहली बार इस ग्रह के पास पहुंचा.1989 में अमेरिका का अंतरिक्ष यान वॉयजर 2 ने नेपच्यून के पास से उड़ान भरी.

यह पहला और अब तक इकलौता मानव अंतरिक्ष यान है, जिसने नेपच्यून को करीब से देखा.इस मिशन से वैज्ञानिकों को नेपच्यून के वातावरण, उसके छल्लों और उसके चंद्रमाओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली.

इस तरह 23 सितंबर 1846 को शुरू हुई नेपच्यून की कहानी सिर्फ एक नए ग्रह की खोज की कहानी नहीं थी. यह इस बात का भी उदाहरण थी कि कैसे गणित और वैज्ञानिक गणनाओं की मदद से आसमान में मौजूद किसी अनदेखी दुनिया को खोजा जा सकता है.

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