8 सितंबर 1943 को इटली ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों के सामने सरेंडर कर दिया था. अमेरिकी जनरल ड्वाइट डी. आइजनहावर ने इसका ऐलान किया था. तब तक देश के तानाशाह बेनीटो मुसोलिनी को सत्ता से हटाया जा चुका था. मुसोलिनी के पतन के बाद जनरल पिएत्रो बादोलियो ने सत्ता संभाली और गुप्त रूप से मित्र देशों के साथ बातचीत शुरू की. लेकिन इटली के सरेंडर की खबर सामने आते ही जर्मनी ने भी बड़ा कदम उठाया. हिटलर ने 'ऑपरेशन एक्सिस' शुरू कर इटली पर कब्जा करना शुरू कर दिया.
यानी इटली का सरेंडर युद्ध का अंत नहीं था. बल्कि इसके बाद देश खुद एक बड़े युद्धक्षेत्र में बदल गया. इस कहानी की शुरुआत 8 सितंबर से कुछ हफ्ते पहले होती है. जुलाई 1943 में इटली की फासीवादी सरकार बुरी तरह कमजोर हो चुकी थी. मित्र देशों की सेनाएं इटली की ओर बढ़ रही थीं और युद्ध में मुसोलिनी की स्थिति लगातार खराब होती जा रही थी.
आखिरकार मुसोलिनी को सत्ता से हटा दिया गया. इसके बाद इटली के राजा विक्टर इमैनुएल के कहने पर जनरल पिएत्रो बादोलियो ने देश की कमान संभाली. बादोलियो के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि युद्ध से इटली को कैसे बाहर निकाला जाए. उन्होंने मित्र देशों के कमांडर जनरल ड्वाइट आइजनहावर के साथ बातचीत शुरू की. यह बातचीत कई हफ्तों तक चली.
इटली ने किया मित्र देशों के सामने सरेंडर
कई दौर की बातचीत के बाद बादोलियो ने मित्र देशों के सामने एक शर्त के साथ आत्मसमर्पण को मंजूरी दे दी. 8 सितंबर 1943 को जनरल आइजनहावर ने सार्वजनिक तौर पर इटली के सरेंडर का ऐलान कर दिया.
इसके बाद मित्र देशों की सेना ने दक्षिणी इटली में उतरने की तैयारी शुरू कर दी. इस अभियान को ऑपरेशन एवेलांच नाम दिया गया. अगले ही दिन, यानी 9 सितंबर को मित्र देशों की सेना ने सालेर्नो में उतरना शुरू कर दिया. मित्र देशों की योजना साफ थी. दक्षिणी इटली से आगे बढ़ते हुए जर्मन सेना को पीछे धकेलना और धीरे-धीरे पूरे इतालवी प्रायद्वीप पर कब्जा करना. लेकिन जर्मनी इस घटनाक्रम के लिए पहले से तैयार बैठा था.
मुसोलिनी की सत्ता कमजोर होने के साथ ही जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर को अंदाजा हो गया था कि इटली कभी भी मित्र देशों के साथ समझौता कर सकता है. हिटलर नहीं चाहता था कि मित्र देशों की सेना इटली में अपना मजबूत ठिकाना बना ले. ऐसा होने पर वे जर्मनी के कब्जे वाले बाल्कन इलाके के और करीब पहुंच सकते थे.
इसी वजह से जर्मनी ने इटली पर कब्जे की योजना पहले से तैयार कर रखी थी. 8 सितंबर को जैसे ही इटली के सरेंडर की खबर सामने आई, हिटलर ने ऑपरेशन एक्सिस शुरू कर दिया. जर्मन सैनिकों ने इटली के अलग-अलग हिस्सों में प्रवेश करना शुरू कर दिया.
इटली का पुराना सहयोगी ही बन गया दुश्मन
इटली के सरेंडर के बाद हालात बेहद तेजी से बदले. जिन जर्मन सैनिकों के साथ इतालवी सेना कुछ समय पहले तक मिलकर लड़ रही थी, अब वही उनके सामने खड़ी थी. कई इतालवी सैनिकों ने जर्मन सेना के सामने हथियार डाल दिए. लेकिन जहां इतालवी सैनिकों ने जर्मनों का विरोध किया, वहां हालात बेहद हिंसक हो गए.
ग्रीस के केफालोनिया द्वीप पर इतालवी सैनिकों ने जर्मनों का विरोध किया था. इसके जवाब में जर्मन सैनिकों ने बड़े पैमाने पर इतालवी सैनिकों की हत्या की. करीब 1,646 इतालवी सैनिकों को मार दिया गया, जबकि बाद में आत्मसमर्पण करने वाले करीब 5,000 सैनिकों को भी अंततः गोली मार दी गई. यह घटना दिखाती है कि इटली का सरेंडर उसके सैनिकों के लिए युद्ध से बाहर निकलने की गारंटी नहीं था.
राजा और बादोलियो को रोम छोड़ना पड़ा
जर्मन सेना के इटली में तेजी से आगे बढ़ने के बीच जनरल बादोलियो और राजा विक्टर इमैनुएल के सामने भी बड़ा संकट खड़ा हो गया. आखिरकार दोनों ने रोम छोड़ दिया और दक्षिण-पूर्वी इटली चले गए. वहां उन्होंने एक नई फासीवाद-विरोधी सरकार बनाने की कोशिश शुरू की.
इस बीच देश का एक बड़ा हिस्सा जर्मन नियंत्रण में चला गया. इटली अब दोहरी स्थिति में था. दक्षिण में मित्र देशों की सेना आगे बढ़ रही थी, जबकि उत्तर और मध्य के बड़े हिस्सों में जर्मन सेना का प्रभाव बढ़ता जा रहा था.
ऑपरेशन एक्सिस का एक अहम मकसद इटली की नौसेना के जहाजों को मित्र देशों के हाथों में जाने से रोकना भी था. इसी दौरान इटली का युद्धपोत 'रोमा'मित्र देशों के नियंत्रण वाले उत्तरी अफ्रीका के एक बंदरगाह की ओर जा रहा था. जर्मन विमानों ने उस पर हमला कर दिया और जहाज डूब गया.
इस हमले की खास बात यह थी कि रोमा दुनिया का पहला ऐसा जहाज माना जाता है जिसे रेडियो-कंट्रोल्ड गाइडेड मिसाइल से डुबोया गया था. इस घटना में 1,500 से ज्यादा चालक दल के सदस्यों की मौत हो गई. जर्मनी को डर था कि इटली के सरेंडर के बाद मित्र देशों के युद्धबंदी आजाद हो सकते हैं.
इसलिए जर्मन सैनिकों ने मित्र देशों के युद्धबंदियों को इटली से निकालकर जर्मनी के श्रम शिविरों में भेजने की कोशिश शुरू कर दी. हालांकि, बड़ी संख्या में युद्धबंदी जर्मन कब्जे से बच निकलने में कामयाब रहे. इतना ही नहीं, कुछ सैकड़ों युद्धबंदी इटली में ही रुक गए और उत्तर में जर्मन सेना के खिलाफ लड़ रहे इतालवी गुरिल्लाओं के साथ शामिल हो गए.
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