2 नवंबर 2000 को तीन अंतरिक्ष यात्री पहली बार इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पहुंचे थे. इस मिशन को एक्सपीडिशन-1 नाम दिया गया था. इसके साथ ही अंतरिक्ष में इंसानों के लगातार रहने का एक नया दौर शुरू हुआ. यह मिशन सिर्फ तीन लोगों के अंतरिक्ष पहुंचने की कहानी नहीं था, बल्कि दुनिया के कई देशों के मिलकर काम करने की मिसाल भी बना.
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को बनाने और चलाने के लिए अमेरिका, रूस, कनाडा, जापान और यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियों ने 1998 में साथ काम करने पर सहमति जताई थी. उसी साल स्टेशन के शुरुआती हिस्सों को अंतरिक्ष में भेजा गया.
इसके बाद स्पेस शटल की पांच उड़ानों और रूस की दो मानवरहित उड़ानों के जरिए स्टेशन के कई अहम हिस्से अंतरिक्ष में पहुंचाए गए. इन हिस्सों को जोड़कर स्टेशन का शुरुआती ढांचा तैयार किया गया. हालांकि, उस वक्त स्टेशन पूरी तरह तैयार नहीं था और वहां इंसानों के रहने के लिए कई काम किए जाने बाकी थे.
2 नवंबर 2000 को रूस के सोयूज रॉकेट से तीन अंतरिक्ष यात्रियों को ISS भेजा गया. यह रॉकेट कजाकिस्तान से लॉन्च हुआ था. इस दल में अमेरिका के बिल शेफर्ड और रूस के यूरी गिदजेंको और सर्गेई क्रिकालेव शामिल थे.
इन तीनों की जिम्मेदारी स्टेशन पर पहुंचकर सिर्फ रहने की नहीं थी. उन्हें कई उपकरण लगाने, अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने और स्टेशन के सिस्टम चालू करने थे. यानी उन्हें अंतरिक्ष में रहते हुए अपने नए घर को रहने लायक बनाने का काम भी करना था.
यह काम सुनने में आसान लग सकता है, लेकिन अंतरिक्ष में हर छोटी चीज के लिए खास इंतजाम करने पड़ते हैं. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्टेशन पर खाना गर्म करने वाला एक उपकरण चालू करने में ही दल को एक दिन से ज्यादा समय लग गया था.
अंतरिक्ष में रहना धरती पर रहने जैसा नहीं है. वहां गुरुत्वाकर्षण का असर बहुत कम होता है, जिससे शरीर की मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं. इससे बचने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों को रोज कम से कम दो घंटे व्यायाम करना पड़ता है.
ISS पर रहते हुए शेफर्ड, गिदजेंको और क्रिकालेव दिन में करीब 15.5 बार धरती का चक्कर लगाते थे. इस दौरान उन्हें स्टेशन के रखरखाव के साथ-साथ अपनी सेहत का भी ध्यान रखना पड़ता था.
उनके रहने के दौरान दो मानवरहित रूसी रॉकेट और स्पेस शटल के तीन मिशन स्टेशन पर पहुंचे. इनके जरिए जरूरी सामान और उपकरण भेजे गए. इनमें विशाल सोलर पैनल भी शामिल थे, जो सूरज की रोशनी से बिजली बनाकर स्टेशन की ज्यादातर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करते हैं.
aajtak.in