आजकल जब भी दिल्ली के जंतर-मंतर का नाम सामने आता है, तो लोगों के दिमाग में सबसे पहले धरना-प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियां आती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जंतर-मंतर का असली मकसद प्रदर्शन नहीं, बल्कि विज्ञान था? इसे ग्रह-नक्षत्रों की चाल समझने, समय का पता लगाने और खगोलीय घटनाओं का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था. दिलचस्प बात यह है कि भारत में एक नहीं, बल्कि कुल 5 जंतर-मंतर बनाए गए थे. हालांकि, इनमें से सिर्फ एक को ही यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा मिला है. आखिर वह कौन-सा जंतर-मंतर है और उसमें ऐसी क्या खास बात है? आइए जानते हैं.
अगर आप सोचते हैं कि जंतर-मंतर सिर्फ दिल्ली और जयपुर में ही है, तो यह पूरी जानकारी नहीं है. दरअसल, भारत में दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में कुल 5 जंतर-मंतर बनवाए गए थे. इनका निर्माण 18वीं शताब्दी में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था. उस समय न आधुनिक टेलीस्कोप थे और न ही कंप्यूटर. ऐसे में आसमान में होने वाली गतिविधियों को समझने के लिए पत्थर और संगमरमर से बने बड़े-बड़े वैज्ञानिक यंत्र (मशीन) तैयार किए गए. इन यंत्रों की मदद से सूर्य और चंद्रमा की स्थिति, ग्रह-नक्षत्रों की चाल, समय और ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं का सटीक अध्ययन किया जाता था.
जयपुर का जंतर-मंतर सबसे खास क्यों?
भारत के पांचों जंतर-मंतरों में जयपुर का जंतर-मंतर सबसे बड़ा और सबसे बेहतर स्थिति में मौजूद है. यही वजह है कि साल 2010 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया था. यहां करीब 19 विशाल खगोलीय यंत्र मौजूद हैं. इनमें सबसे प्रसिद्ध सम्राट यंत्र है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्य घड़ी (सनडायल) माना जाता है. इसकी मदद से बेहद सटीक समय का पता लगाया जा सकता है. आज भी देश-विदेश से लाखों पर्यटक इसे देखने पहुंचते हैं.
दिल्ली का जंतर-मंतर
दिल्ली का जंतर-मंतर सबसे पहले बनाया गया था. इसका निर्माण करीब 1721 में हुआ था. शुरुआत में इसका इस्तेमाल खगोलीय अध्ययन के लिए किया जाता था, लेकिन समय के साथ इसकी पहचान बदल गई. आज यह जगह ऐतिहासिक स्मारक होने के साथ-साथ धरना-प्रदर्शन और सामाजिक आंदोलनों के लिए भी जानी जाती है. इसके बावजूद यहां मौजूद वैज्ञानिक यंत्र उस दौर की शानदार वैज्ञानिक सोच की याद दिलाते हैं.
उज्जैन का जंतर-मंतर
मध्य प्रदेश का उज्जैन प्राचीन समय से ही खगोल विज्ञान का बड़ा केंद्र माना जाता रहा है. यहां बना जंतर-मंतर ग्रहों और तारों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. उस समय खगोलीय गणनाओं में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.
वाराणसी का जंतर-मंतर
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में भी एक जंतर-मंतर बनाया गया था. यह आकार में जयपुर और दिल्ली के जंतर-मंतर से छोटा है, लेकिन इसका उद्देश्य बिल्कुल वही था. यहां भी समय की गणना और आकाशीय पिंडों की स्थिति का अध्ययन किया जाता था. आज भी यह इतिहास और विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है.
मथुरा का जंतर-मंतर
भारत का पांचवां जंतर-मंतर मथुरा में बनाया गया था. हालांकि, समय के साथ यह लगभग पूरी तरह नष्ट हो गया. आज इसके बहुत कम अवशेष बचे हैं. इसी वजह से अब भारत में चार प्रमुख जंतर-मंतर ही देखने को मिलते हैं.
क्यों हैं जंतर-मंतर इतने खास?
जंतर-मंतर सिर्फ पुराने स्मारक नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का सुबूत हैं कि सदियों पहले भारत में विज्ञान और खगोल अध्ययन कितना उन्नत था. बिना आधुनिक मशीनों और तकनीक के भी उस समय ऐसे यंत्र बनाए गए, जो समय बताने और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का सटीक अनुमान लगाने में सक्षम थे. यही वजह है कि जंतर-मंतर आज भी भारत की वैज्ञानिक विरासत, इंजीनियरिंग कौशल और शानदार वास्तुकला का अनमोल प्रतीक माने जाते हैं.
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