ट्रेन में अगर हम किसी एसी कोच में सफर करते हैं, तो हमें घर की तरह एयर कंडीशनिंग की सुविधा मिलती है. बर्थ के बगल में चार्जिंग पॉइंट रहता है. पूरे सफर के दौरान लाइट जली रहती है. ट्रेन रुक भी जाए, फिर इसमें कोई रुकावट नहीं होती है. अगर नॉर्मल कोच यानी जेनरल या स्लीपर डिब्बे में सफर करें, तो वहां भी पंखा, लाइट और मोबाइल चार्जिंग का सिस्टम मिल जाएगा.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रेन के हर डिब्बे में कहीं बड़ी- बड़ी बैट्रियां लगी होती हैं. जिनसे लगातार बिजली सप्लाई होती रहती है. या फिर आज के जमाने में इलेक्ट्रिक इंजन वाले ट्रेनों में सीधे ग्रिड से ही बिजली सप्लाई होती रहती है. एक आम इंसान के लिए ट्रेन के इस पूरे सिस्टम को समझना मुश्किल है. चलिए आज जानते हैं ट्रेन में बिजली सप्लाई का सिस्टम क्या होता है?
बड़े- बड़े ट्रेन चलाने वाले एक लोको पायलट ने इन सवालों का जवाब बहुत ही सरल तरीके से समझाया. उन्होंने बताया कि ट्रेन में लाइट, पंखे और मोबाइल चार्जिंग के लिए बिजली की सप्लाई ओवरहेड वायर, जनरेटर कार और कोच के नीचे लगी बैटरियों से ही आती हैं. लेकिन, यहां ये सारी चीजें ट्रेन के टाइप पर निर्भर करती हैं. डीजल इंजन और इलेक्ट्रिक इंजन या फिर अलग- अलग तरह के कोच में इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई का सिस्टम भी अलग- अलग होता है.
इलेक्ट्रिक ट्रेनें - आजकल अधिकतर ट्रेन इलेक्ट्रिक इंजन से चलती है. इसमें इंजन में लगे ओवरहेड वायर यानी ओएचई सिस्टम के जरिए पूरे ट्रेन में बिजली की सप्लाई होती है. पावर ग्रिड के जरिए रेलवे के सब-स्टेशन तक एसी करंट आता है. यहां से ये बिजली पटरियों के ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन वायर में दौड़ती रहती है.
ट्रेन की इंजन की छत पर लगा एक मेटल का डिवाइस होताहै , जिसे पेंटोग्राफ कहा जाता है. ऊपर लगे बिजली के तारों को छूकर करंट खींचता है और फिर सीधे ट्रेन के इंजन तक पहुंचा देता है. इंजन होटल लोड सिस्टम होता है. आसान शब्दों में कहें तो आधुनिक ट्रेनों में इंजन के जरिए इस हाई-वोल्टेज बिजली को कम करके सीधे डिब्बों तक भेजा जाता है, जिससे लाइट, एसी और चार्जिंग पॉइंट्स काम करते हैं.
डीजल ट्रेन - डीजल इंजन से चलने वाली ट्रेनों में इंजन बंद होने पर भी ईओजी यानी एंड ऑन जेनरेशन सिस्टम से बिजली की सप्लाई होती है. इसे आसान शब्दों में ऐसे समझें- जिन रूटों पर बिजली के तार नहीं होते, वहां डीजल इंजन से ट्रेन चलती है. ऐसे ट्रेनों के दोनों सिरों पर विशेष डीजल जनरेटर कार यानी पावर भान लगी होती हैं. यह जनरेटर पूरे ट्रेन के डिब्बों को लाइट, पंखे और एसी चलाने के लिए बिजली सप्लाई करता है.
पुराने ट्रेनों का एक्सेल और बैटरी सिस्टम - पुराने या पारंपरिक कोचों में पहियों के घूमने से एक अल्टरनेटर जुड़ा होता है जो मैकेनिकल एनर्जी को बिजली में बदलता है. इससे जब ट्रेन चलती रहती है तो बिजली सप्लाई होती रहती है. यह बिजली कोच के नीचे लगे बैटरी बैंक में स्टोर होती है. जब ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी होती है या इंजन बंद होता है, तब यही बैटरियां लाइट और पंखों को चालू रखती हैं. इन बैटरियों से ही ट्रेन के इंजन को भी स्टार्ट किया जाता है.
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अब समझ में आ गया होगा कि वंदे भारत और राजधानी एक्सप्रेस से लेकर लोकल ट्रेन तक में बिजली की सप्लाई कैसे होती है. चाहे ट्रेन रुकी रहे या चलती रहे, सारे पंखे, एसी और चार्जिंग पॉइंट कैसे काम करते रहते हैं.
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