29 सितंबर 1939 को जर्मनी और सोवियत रूस ने पोलैंड को आपस में बांट लिया था. दोनों देशों ने पोलैंड की सीमाएं तय कीं और उसके बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया. यह सब उस वक्त हुआ, जब दुनिया दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत देख रही थी.इस बंटवारे के पीछे जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर और सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन के बीच हुआ एक समझौता था. हैरानी की बात यह थी कि दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध से बचने का वादा कर चुके थे, लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने पोलैंड और पूर्वी यूरोप के दूसरे देशों के भविष्य का फैसला भी कर लिया था.
29 सितंबर को जर्मनी और सोवियत संघ ने पोलैंड के बंटवारे की सीमा तय करने वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके साथ ही पोलैंड का बड़ा हिस्सा दो ताकतवर देशों के कब्जे में चला गया. जर्मनी और सोवियत संघ के बीच सीमा और मैत्री संधि पर हस्ताक्षर मॉस्को में हुए थे. इसमें जर्मनी की ओर से विदेश मंत्री योआखिम फॉन रिबेंट्रॉप और सोवियत संघ की ओर से व्याचेस्लाव मोलोटोव ने हस्ताक्षर किए थे.
हिटलर और स्टालिन के बीच क्या हुआ था समझौता?
इस कहानी की शुरुआत अगस्त 1939 में हुए मोलोटोव-रिबेंट्रॉप समझौते से होती है. इसे हिटलर-स्टालिन समझौता भी कहा जाता है. इसके तहत जर्मनी और सोवियत संघ ने एक-दूसरे पर हमला न करने का वादा किया था.
उस समय जर्मनी के विदेश मंत्री योआखिम फॉन रिबेंट्रॉप और सोवियत संघ के विदेश मंत्री व्याचेस्लाव मोलोटोव ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन इस समझौते की एक गोपनीय शर्त भी थी. इसके तहत पूर्वी यूरोप के कुछ इलाकों को जर्मनी और सोवियत संघ के प्रभाव क्षेत्र में बांटने की योजना बनाई गई थी.
पोलैंड भी इसी योजना का हिस्सा था. जर्मनी पश्चिमी हिस्से पर और सोवियत संघ पूर्वी हिस्से पर नियंत्रण चाहता था. सितंबर 1939 में जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया और सोवियत सेना भी पूर्व से दाखिल हुई, तो इस बंटवारे की योजना जमीन पर उतरने लगी.
स्टालिन ने खुद तय की पोलैंड की सीमा
29 सितंबर 1939 को जर्मनी और सोवियत संघ के बीच सीमा और मैत्री संधि पर हस्ताक्षर हुए. इस समझौते के तहत दोनों देशों ने तय किया कि पोलैंड के किन इलाकों पर किसका नियंत्रण रहेगा.
शुरुआत में सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन ने सीमा रेखा विस्तुला नदी के पास रखने का प्रस्ताव दिया था. यह नदी पोलैंड की राजधानी वारसॉ के पश्चिम से गुजरती है. लेकिन बाद में उन्होंने सीमा को वारसॉ और ल्यूब्लिन के पूर्व की ओर खिसकाने पर सहमति जताई.
इस बदलाव से पोलैंड के अधिक आबादी वाले और औद्योगिक क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा जर्मनी के नियंत्रण में चला गया. बदले में सोवियत संघ को ल्विव (अब यूक्रेन में ल्वीव) और उसके आसपास के तेल-समृद्ध इलाके मिले. इसके साथ ही लिथुआनिया को लेकर भी दोनों देशों के बीच समझौता हुआ.
जर्मनी के कब्जे में पोलैंड की करीब 2.2 करोड़ आबादी आ गई. वहीं सोवियत संघ को पश्चिम की ओर एक ऐसा क्षेत्र मिला, जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बफर जोन यानी सुरक्षा घेरा मानता था.पोलैंड के बंटवारे के साथ ही सोवियत संघ ने बाल्टिक क्षेत्र में भी अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था. 28 सितंबर 1939 को ही सोवियत संघ ने एस्टोनिया के साथ आपसी सहायता संधि पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के तहत सोवियत संघ को एस्टोनिया में नौसैनिक और हवाई सैन्य अड्डे बनाने का अधिकार मिल गया.
यह समझौता एस्टोनिया की संप्रभुता पर सोवियत दबाव बढ़ने की शुरुआत था. इसके बाद सोवियत संघ ने लातविया के साथ भी इसी तरह की संधि की. आगे चलकर सोवियत सेना ने बाल्टिक देशों में प्रवेश किया और जून 1940 में एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया पर कब्जा कर लिया. ये देश कई दशकों तक सोवियत संघ के नियंत्रण में रहे.
पोलैंड के बंटवारे का क्या हुआ असर?
जर्मनी और सोवियत संघ के बीच हुआ यह समझौता सिर्फ सीमाएं तय करने तक सीमित नहीं था. इसके बाद पोलैंड के अलग-अलग हिस्सों में दोनों देशों का कब्जा और शासन स्थापित हो गया. जर्मनी ने पश्चिमी इलाकों को अपने नियंत्रण में लिया, जबकि पूर्वी हिस्से सोवियत संघ के कब्जे में चले गए.
दोनों देशों ने इस समझौते को पूर्वी यूरोप में शांति और व्यवस्था कायम करने के रूप में पेश किया, लेकिन असल में पोलैंड की जनता की इच्छा के बिना उसके देश का बंटवारा कर दिया गया था. जर्मनी और सोवियत संघ ने अपने हितों के मुताबिक सीमाएं तय कीं और पोलैंड की स्वतंत्रता खत्म हो गई.
इस समझौते ने यह भी दिखाया कि उस समय यूरोप की बड़ी सैन्य ताकतें अपने राजनीतिक और सामरिक हितों के लिए छोटे देशों की सीमाओं और भविष्य का फैसला कर रही थीं.
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