पहली बार ऐसे हुआ बार कोड का इस्तेमाल, च्युइंगम का पैकेट किया गया था स्कैन

आज के दिन ही पहली बार बार कोड का इस्तेमाल किया गया था. जब एक ग्रोसरी शॉप में च्युइंगम को पैकेट को स्कैन कर यह साबित किया गया है कि बार कोड को छोटे से छोटे प्रोडक्ट पर आसानी से इस्तेमाल किया जाता सकता है.

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पहली बार एक च्युइंगम के पैकेट को बार कोड से स्कैन किया गया था. (Photo - Pexels) पहली बार एक च्युइंगम के पैकेट को बार कोड से स्कैन किया गया था. (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:28 PM IST

26 जून 1974 की सुबह ओहियो के ट्रॉय स्थित एक सुपरमार्केट में, रैगलीज जूसी फ्रूट च्युइंग गम का एक पैकेट यूनिवर्सल प्रोडक्ट कोड (यूपीसी) यानी बारकोड से स्कैन किया जाने वाला पहला किराने का सामान बन गया. वर्षों के वैज्ञानिक प्रयोगों और उद्योग के सहयोग का परिणाम, यूपीसी बारकोड किराने की दुकानों के चेकआउट काउंटर से कहीं आगे बढ़कर आधुनिक वाणिज्य का प्रमुख हिस्सा बन गया, जिसके तहत प्रतिदिन अरबों बारकोड स्कैन किए जाते हैं. 

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 आविष्कारक जो वुडलैंड ने बारकोड का पहला डिजाइन 1949 में मियामी बीच की रेत पर बनाया था. उन्होंने कन्संट्रिक सर्कल में व्यवस्थित मोटी और पतली रेखाओं का एक पैटर्न तैयार किया, जिसे स्कैनर किसी भी कोण से पढ़ सकता था. वुडलैंड ने अपने डिजाइन की प्रेरणा मोर्स कोड से ली थी, लेकिन बिंदुओं और डैश के बजाय, बारकोड मोटी और पतली रेखाओं के माध्यम से जानकारी देता था. उन्होंने 1949 में अपने आविष्कार के लिए पेटेंट के लिए आवेदन किया और 1952 में इसे प्राप्त किया.

वुडलैंड के विचार को एक फंक्शनल बारकोड स्कैनिंग सिस्टम में बदलने में दो दशक लग गए. 1949 में, बारकोड की छवि को पढ़ने का कोई व्यावहारिक तरीका नहीं था. 1960 में लेजर के आविष्कार ने स्कैनिंग तकनीक के लिए नई संभावनाएं पैदा कीं. उसी समय, कंप्यूटर छोटे और अधिक किफायती हो गए. बारकोड स्कैनर ने इन दोनों इनोवेशन का लाभ उठाया. नए स्कैनर लेज़र की अत्यधिक चमकीली रोशनी का उपयोग करके बारकोड की काले-सफेद छवि पर स्कैन करते थे, जिससे उत्पाद और कीमत के बारे में जानकारी कंप्यूटरीकृत कैश रजिस्टर को भेजी जाती थी.

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ग्रोसरी इंडस्ट्री  के अधिकारियों ने अपने स्टोरों में दक्षता बढ़ाने और लागत कम करने के लिए इन नई तकनीकों की क्षमता को पहचाना. उन्होंने यह भी महसूस किया कि पूरे उद्योग में बारकोड को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उन्हें एक मानकीकृत प्रणाली की आवश्यकता है.

अमेरिका में 1970 में ग्रोसरी इंडस्ट्री कमेटी का गठन किया गया ताकि देश भर के किराना स्टोरों के चेकआउट काउंटरों पर बारकोड और स्कैनर लागू करने की योजना बनाई जा सके. क्रोगर, स्वतंत्र रूप से, 1972 में अपने स्टोरों में बारकोड स्कैनर का एक पायलट कार्यक्रम स्थापित करने वाला पहला स्टोर बन गया.

 क्रोगर और आरसीए ने ऑटोमेटेड सुपरमार्केट चेकस्टैंड पर कोलाबरेट किया , जिसमें वुडलैंड के "बुल्स-आई" बारकोड डिज़ाइन का इस्तेमाल किया गया था. गोल डिजाइन कुछ हद तक अविश्वसनीय साबित हुआ, क्योंकि प्रिंटर से निकलते समय उस पर धब्बे पड़ जाते थे. फिर कमेटी ने आईबीएम इंजीनियर जॉर्ज लॉरर द्वारा अंतिम समय में दिए गए एक सुझाव के आधार पर एक अलग डिज़ाइन का चयन किया.

 उन्होंने बारकोड को गोल आकार के बजाय आयताकार रूप में फिर से डिजाइन किया, जिससे छवि को सटीक रूप से प्रिंट करना आसान हो गया. लॉरर के डिज़ाइन, जिसे यूनिवर्सल प्रोडक्ट कोड (यूपीसी) नाम दिया गया, में वर्टिकल स्ट्रीप्स के साथ 12 अंकों की एक पंक्ति थी. मार्श सुपरमार्केट के आर एंड डी प्रमुख क्लाइड डॉसन ने 26 जून, 1974 को सुबह 8:01 बजे यूपीसी वाले पहले ग्रोसरी आयटम को स्कैन किया. यह रैगले की च्युइंग गम का एक पैकेट था, जिससे यह साबित हुआ कि बारकोड छोटी से छोटी वस्तुओं पर भी काम कर सकते हैं.

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