10 अक्टूबर 1957 को अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर को घाना के वित्त मंत्री कोमा एग्बेली गबेदेमा से माफी मांगनी पड़ी थी. इसकी वजह थी अमेरिका के एक रेस्टोरेंट में उनके साथ हुआ नस्लीय भेदभाव. यह घटना उस समय अमेरिका के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण बन गई थी. खुद को आजादी और समानता का सबसे बड़ा हिमायती बताने वाले अमेरिका के लिए यह शर्मसार कर देने वाली घटना थी.
अमेरिका खुद को दुनिया में लोकतंत्र और आजादी का सबसे बड़ा समर्थक बताता रहा है. लेकिन, एक दौर ऐसा भी था जब उसी अमेरिका में नस्ल के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव किया जाता था. इस भेदभाव से दूसरे देशों के राजनयिक भी नहीं बच पाए.
यह घटना 1957 की है. उस समय घाना अफ्रीका के नए स्वतंत्र देशों में शामिल था और कोमा एग्बेली गबेदेमा देश के वित्त मंत्री थे. वह अमेरिका के दौरे पर थे. इसी दौरान डेलावेयर राज्य के डोवर शहर में एक रेस्टोरेंट में उनके साथ भेदभाव हुआ. उन्हें वहां खाना परोसने से मना कर दिया गया.
गबेदेमा किसी आम यात्री की तरह अमेरिका नहीं पहुंचे थे. वह एक स्वतंत्र देश की सरकार में मंत्री थे और अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. इसके बावजूद उनके साथ सिर्फ नस्ल के आधार पर ऐसा व्यवहार किया गया. यह घटना अमेरिका की उस सामाजिक व्यवस्था को उजागर करती थी, जहां अश्वेत लोगों को कई जगहों पर बराबरी का दर्जा नहीं मिलता था.
मामला सामने आने के बाद अमेरिकी प्रशासन के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई. आखिरकार, 10 अक्टूबर 1957 को राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने घाना के वित्त मंत्री से माफी मांगी. यह सिर्फ एक मंत्री के साथ हुए बुरे व्यवहार का मामला नहीं था, बल्कि इससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी सवाल खड़े हो रहे थे.
1950 और 1960 के दशक में दुनिया दो बड़ी ताकतों के बीच बंटी हुई थी. एक तरफ अमेरिका था, तो दूसरी तरफ सोवियत संघ. दोनों देश एशिया और अफ्रीका के नए स्वतंत्र देशों का समर्थन हासिल करना चाहते थे. इसके लिए वे अपने राजनीतिक और आर्थिक मॉडल को बेहतर साबित करने की कोशिश कर रहे थे.
ऐसे समय में अमेरिका में नस्लीय भेदभाव की घटनाएं उसकी छवि को नुकसान पहुंचा रही थीं. अमेरिका दुनिया को लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संदेश दे रहा था, लेकिन उसके यहां अश्वेत लोगों और दूसरे देशों के राजनयिकों के साथ भेदभाव हो रहा था.
अमेरिकी अधिकारियों को चिंता थी कि ऐसी घटनाओं से अफ्रीकी और एशियाई देशों के लोग अमेरिका की नीतियों पर सवाल उठाएंगे. सोवियत संघ को भी अमेरिका की इस कमजोरी को सामने रखने का मौका मिल सकता था. यही वजह थी कि अश्वेत राजनयिकों के साथ होने वाला भेदभाव अमेरिकी सरकार के लिए एक बड़ा कूटनीतिक मुद्दा बन गया.
गबेदेमा के साथ हुई घटना कोई अकेला मामला नहीं थी. 1950 और 1960 के दशक में अफ्रीका और एशिया के कई देशों के राजनयिकों को अमेरिका में नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा.
वॉशिंगटन डीसी में कुछ राजनयिकों को घर किराए पर लेने में परेशानी हुई. वहीं, रेस्टोरेंट, नाई की दुकानों और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में भी उनके साथ भेदभाव की घटनाएं सामने आईं. कई बार विदेशी राजनयिकों को भी उन जगहों पर सेवाएं नहीं दी जाती थीं, जहां नस्लीय भेदभाव की प्रथा चल रही थी.
इससे साफ होने लगा था कि अमेरिका में नागरिक अधिकारों का सवाल केवल देश का अंदरूनी मामला नहीं रह गया है. इसका असर दूसरे देशों के साथ उसके रिश्तों पर भी पड़ रहा था.1957 में घाना के वित्त मंत्री के साथ हुई घटना ने अमेरिका के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया था. अगर अमेरिका दूसरे देशों को समानता और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता है, तो उसके अपने यहां नस्ल के आधार पर भेदभाव क्यों हो रहा है?
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