इंडोनेशिया के एक ज्वालामुखी में रात होते ही नीली आग की लपटें दिखाई देने लगती हैं. इस नजारे को देखने के लिए दुनियाभर से पर्यटक पहुंचते हैं. लेकिन, इस खूबसूरत नजारे के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.
इसी ज्वालामुखी के अंदर से मजदूर एक चमकीले पीले रंग का पदार्थ निकालते हैं, जिसे 'डेविल्स गोल्ड' यानी 'शैतान का सोना' कहा जाता है. इसे निकालने के लिए उन्हें जहरीली गैसों के बीच काम करना पड़ता है और भारी बोझ उठाकर खतरनाक रास्तों से वापस लौटना पड़ता है.
यहां बात हो रही है इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित कावाह इजेन ज्वालामुखी की. यहां से निकलने वाला डेविल्स गोल्ड असल में सल्फर यानी गंधक है. इसका इस्तेमाल माचिस बनाने से लेकर कई औद्योगिक कामों में किया जाता है. लेकिन, इस पीले खजाने को निकालने की कीमत मजदूरों को अपनी सेहत और जिंदगी को जोखिम में डालकर चुकानी पड़ती है.
क्या है डेविल्स गोल्ड, जो सोने की तरह दिखता है?
डेविल्स गोल्ड कोई असली सोना नहीं है. यह सल्फर है, जिसका रंग चमकीला पीला होता है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कावाह इजेन ज्वालामुखी में सल्फर वाली गैसें धरती के अंदर से बाहर निकलती हैं. इन पिघलते सल्फर को धातु की पाइपों के जरिए बाहर लाया जाता है. ठंडा होने पर सल्फर जमकर ठोस रूप ले लेता है. इसके बाद मजदूर इसे तोड़कर बड़े-बड़े टुकड़ों में इकट्ठा करते हैं.
सल्फर का इस्तेमाल कई चीजें बनाने में होता है. माचिस के अलावा कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में चीनी को सफेद करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. इसी वजह से इसकी व्यावसायिक कीमत है और यह स्थानीय लोगों के लिए कमाई का जरिया बना हुआ है.
इसके चमकीले पीले रंग और इससे होने वाली कमाई के कारण मजदूर इसे 'डेविल्स गोल्ड' कहते हैं. लेकिन, इस नाम के पीछे एक दूसरी वजह भी है. इसे निकालने का काम इतना खतरनाक है कि मजदूरों को अपनी कमाई के लिए सेहत से समझौता करना पड़ता है.
आधी रात से शुरू होता है मजदूरों का सफर
कावाह इजेन में सल्फर निकालने वाले मजदूरों का दिन आम लोगों की तरह सुबह नहीं, बल्कि आधी रात के आसपास शुरू हो जाता है. वे मोटरसाइकिल से ज्वालामुखी के तल तक पहुंचते हैं. इसके बाद शुरू होती है पैदल चढ़ाई. ऊपर पहुंचने के बाद उन्हें खतरनाक रास्तों से ज्वालामुखी के क्रेटर यानी उसके मुहाने के अंदर उतरना पड़ता है.
यहां जमीन पर बिखरे सल्फर के ठोस टुकड़ों को औजारों से तोड़ा जाता है. फिर इन टुकड़ों को टोकरियों में भरा जाता है. इन टोकरियों को एक डंडे के सहारे कंधों पर लटकाकर मजदूर वापस ऊपर चढ़ते हैं.
इस काम का सबसे मुश्किल हिस्सा सल्फर को बाहर लेकर आना है. मजदूरों को ऊबड़-खाबड़ रास्तों से भारी वजन उठाकर चढ़ाई करनी पड़ती है. कई बार वे अपने शरीर के वजन से भी ज्यादा भार लेकर चलते हैं. जरा-सी चूक होने पर चोट लग सकती है या गंभीर हादसा हो सकता है.
जहरीली गैसों के बीच काम करने की मजबूरी
सल्फर निकालने का काम सिर्फ शारीरिक मेहनत तक सीमित नहीं है. यहां हवा में जहरीली गैसें भी मौजूद हो सकती हैं. सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसों के संपर्क में आने से आंखों में जलन, गले में परेशानी और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है.
इस काम को करीब से देखने वाले फोटो जर्नलिस्ट ऑरेली मैरियर डी'यूनिविल के मुताबिक, ज्वालामुखी के क्रेटर के अंदर का माहौल बेहद कठोर है. वहां लगातार खांसी की आवाज सुनाई देती है और जहरीली हवा में सांस लेना मुश्किल हो सकता है.
हैरानी की बात यह है कि जहां पर्यटक अपनी सुरक्षा के लिए गैस मास्क पहनते हैं, वहीं कई मजदूरों के पास ऐसे मास्क खरीदने तक के पैसे नहीं होते. वे नाक और मुंह पर कपड़ा या गीला कपड़ा बांधकर काम करते हैं.
लगातार जहरीली गैसों के संपर्क में रहने और भारी बोझ उठाने से उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है. रिपोर्ट के मुताबिक, आधे से ज्यादा मजदूरों को फैरिंजाइटिस यानी गले के पिछले हिस्से में सूजन की समस्या होती है. वहीं, करीब एक-तिहाई मजदूरों को हर महीने सांस से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ता है. भारी टोकरियां उठाने से उनकी पीठ पर निशान पड़ जाते हैं. लंबे समय तक ऐसा काम करने से रीढ़ और पैरों में विकृति आने की समस्या भी हो सकती है.
बीमार पड़ने पर इलाज कराना भी आसान नहीं
इस काम का असर सिर्फ मजदूरों की सेहत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है. ज्वालामुखी के आसपास का इलाका दूर-दराज में है. ऐसे में अस्पताल तक पहुंचना आसान नहीं होता. इलाज में लगने वाला समय और खर्च भी बड़ी परेशानी बन जाता है.
जब मजदूरों की सेहत जवाब देने लगती है, तो कई लोगों को समय से पहले काम छोड़ना पड़ता है. इसके बाद परिवार चलाने की जिम्मेदारी घर के युवा सदस्यों पर आ जाती है. उन्हें अपने माता-पिता के साथ-साथ परिवार के दूसरे लोगों का खर्च भी उठाना पड़ता है.
कितनी कमाई के लिए उठाते हैं इतना जोखिम?
रिपोर्ट के मुताबिक, कावाह इजेन में सल्फर निकालने वाले मजदूरों को अच्छे दिन में करीब 1,45,000 से 2,20,000 इंडोनेशियाई रुपिया यानी लगभग 10 से 15 डॉलर तक मिलते हैं. इस दूरदराज के इलाके में रोजगार के दूसरे विकल्प सीमित हैं. इसलिए कई मजदूरों के लिए यह खतरनाक काम परिवार का पेट पालने का जरूरी साधन बना हुआ है.
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कावाह इजेन में पर्यटकों को रात के अंधेरे में नीली आग की लपटें दिखाई देती हैं. वहीं, मजदूरों के लिए यही ज्वालामुखी रोजी-रोटी का जरिया है. यहां मिलने वाला 'डेविल गोल्ड' अपनी चमक और कीमत के कारण भले ही कीमती लगता हो, लेकिन इसे निकालने वाले मजदूरों के लिए इसकी असली कीमत उनकी मेहनत, सेहत और जिंदगी के जोखिम से चुकाई जाती है.
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