बस तीन छोटी नावें थीं और एक दीवाना सपना!

इस कहानी को आज कहने का सबब वो इतिहास है. जो आज के दिन ही शुरू हुआ था. बात आधा हजार साल पहले की है. जब एक जुनूनी अपने ख्वाबों की ताबीर के लिए समंदर की लहरों पर निकल चुका था.

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एक दीवाने सपने की कहानी.  (Photo: Social Media) एक दीवाने सपने की कहानी. (Photo: Social Media)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 03 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:44 PM IST

कोई बड़ा शाही बेड़ा नहीं था, बस तीन छोटी नावें थी और एक दीवाना सपना. ये सपना किसी जिन्न की तरह उस पर हावी रहा. न जीने देता, न मरने. सपनों के इस सौदागर को एक मालदार आसामी की तलाश थी. दरअसल उसे पैसा चाहिए था. बहुत सारा पैसा. ताकि वो अपने ख्वाबों को जमीं पर उतार सके. 

वो सपना अब समंदर की लहरों पर तैर रहा था. नीला समंदर शांत था. सब खुश. बड़ी दौलत की उम्मीद थी. लगता अब भाग्य पलटने वाला है. पहले कुछ हफ्ते मजे में कटे.

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बता चुके हैं, बस तीन छोटी नावें थीं और एक दीवाना सपना था. साथ था एक कप्तान और नब्बे नाविक. कप्तान यानी कि वही सपनों का सौदागर.

लकड़ी के तीन जहाज लहरों से लड़ रहे थे. जमीन से समंदर पर आए एक महीना बीत चुका था. कितनी दूरी नाप गए सिर्फ कप्तान को पता था. हवा की ताकत पाकर नावें चलती जा रही थीं, बस चलती जा रही थीं. दिन रात, शाम-सुबह. चौबीसों घंटे. लेकिन मिट्टी थी कि कहीं दिखती ही नहीं. जमीन का कोई ठौर नहीं.

चारों ओर पानी ही पानी. नाविकों का दिल डोलने लगा. चेहरे पर नमक से ज्यादा डर चिपका था. कई बुखार में तप रहे थे, कुछ बड़बड़ा रहे थे कि अब वे कभी अपने घर नहीं लौटेंगे. 
 
कप्तान का भरोसा सुन-सुन कर वे थक चुके थे. उनका धैर्य जवाब देने लगा. वे बागी हो रहे थे. अब तो बात कप्तान को ही निपटा देने की होने लगी. 

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दिन बीतते गए. चारों ओर सिर्फ पानी ही पानी. कभी हवा बंद हो जाती, तो जहाज कई दिनों तक एक ही जगह अटक जाते. पूर्णमासी की रातों को जब समु्द्र में ज्वार आता तो जहाज इतना उफनता कि लगता जहाज अगले ही पल टूट जाएगा. पानी के पीपों में काई जमने लगी, मांस के टुकड़ों में सड़न पड़ने लगी. भूख का जोर और प्यास की तपिश सपनों पर भारी पड़ने लगे.

सबसे बड़ी परेशानी थी मनोबल. नाविकों को लगने लगा कि उनका कप्तान उन्हें मौत के मुंह में ले आया है. कई लोग विद्रोह की बात करने लगे और मांग करने लगे कि जहाज वापस मोड़ दिए जाएं.

इस कहानी को आज कहने का सबब आज की तारीख है. 3 अगस्त. 534 साल पहले आज के दिन ही 3 अगस्त 1492 को क्रिस्टोफर कोलंबस नाम का यूरोपियन नाविक 'इंडिया' का समुद्री रास्ता पता लगाने निकला था. 

उसने अपनी यात्रा की शुरुआत की स्पेन के समुद्री तट पालोस दे ला फ्रोंतेरा से. स्पेन का जो स्यूटा शहर आज प्रवासियों की आमद झेल रहा है, वो यहां से दो ढाई सौ किलोमीटर ही दूर है. 

अब भूल जाइए विज्ञान के आविष्कार को, चले जाइए आधा हजार साल पहले और याद करिए इस यात्रा के रोमांच को. 

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उस समय दिल्ली पर गद्दीनशीं था लोदी वंश का शासक सिकंदर लोदी. 

अगर तब कोलंबस इंडिया पहुंच जाता तो शायद दुनिया का इतिहास दूसरे अंदाज में होता. मुगल कुछ और होते. 

खैर वर्तमान ने इतिहास की कब परवाह की है.  

कोलंबस के सपने को परवान देने वाले उन तीन जहाजों के नाम थे  नीना, पिंटा और सांता मारिया. 

तो कप्तान कोलंबस अधीर था. बेचैन था. नावों में चल रहे बगावत की बू उस तक भी पहुंचने लगी. 

उसने अपने साथियों का हौसला बनाए रखा. कभी उन्हें झूठी उम्मीद देता कि जमीन बस थोड़ी दूर है, तो कभी यात्रा की दूरी कम बताता ताकि डर न बढ़े. 

उसने आखिरकार एक चाल चली. उसने नावों की दूरी रिकॉर्ड करने के लिए दो लॉगबुक रखीं. एक में असली दूरी लिखी, दूसरे में कम. वह नाविकों को कम दूरी वाला लॉगबुक दिखाता. ताकि चालक दल को यह विश्वास दिलाया जा सके कि वे स्पेन से ज्यादा दूर नहीं गए हैं. इससे बगावत का खतरा कम हुआ. लोगों को अगर असली दूरी पता चल जाती तो शायद वे उसी दिन लौटने की जिद कर बैठते.

दरअसल इटली के नाविक कोलंबस को लगा कि अगर धरती गोल है, तो पूर्व की ओर जाने के बजाय पश्चिम की तरफ समुद्र पार करके भी भारत पहुंचा जा सकता है.

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सुनने में यह आसान लगता था, लेकिन उस दौर में इसे पागलपन माना गया.  पुर्तगाल, फ्रांस और ब्रिटिश राजाओं ने कोलंबस के खोजी टूर के प्रस्ताव को फाइनेंस करने प्रस्ताव को ठुकरा दिया. 

पर वो कहते हैं न जब आप कुछ करने को ठान लेते हैं तो पूरी कायनात आपका साथ देती है. स्पेन की रानी इसाबेला और राजा फर्डिनेंड को इस दीवाने के दांव में दम नजर आया. रानी ने अपने गहने बेच दिए और इस यात्रा का खर्च उठाया. 

लेकिन सयाने कोलंबस से पृथ्वी की दूरी मापने में गलती हो गई थी. 

उसने पृथ्वी को बहुत छोटा समझ रखा था. उसके मुताबिक एशिया कुछ हफ्तों में मिल जाना चाहिए था. अगर बीच में अमेरिका न होता तो शायद सब भूखे-प्यासे मर जाते. लेकिन किस्मत ने साथ दिया. वे सीधे पश्चिम नहीं गए. पहले कैनरी द्वीप पहुंचे, वहां एक महीने रुके, पिंटा की मरम्मत की और फिर 6 सितंबर को असली समुद्री यात्रा शुरू की. कोलंबस समझदार था. उसने ट्रेड विंड्स का फायदा उठाया. हवाएं पीछे से धकेल रही थीं और जहाज तेजी से भाग रहे थे. 

लेकिन क्या अटलांटिक महासागर कोई छोटा सा दरिया था. जो कोलंबस तुरंत पार कर जाता. 

ये यात्रा लगभग 5700 किलोमीटर की थी. सोचिए आज से 534 साल पहले, बिना इंजन वाला वाला जहाज और 5700 KM  की यात्रा. आंकड़े ही रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है. 

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स्पेन से निकले 65-67 दिन गुजर चुक थे. बगावत होनी थी एक दिन हो ही गई. 9 अक्तूबर 1492. नाविक जहाज वापस स्पेन की ओर मोड़ने लगे. कोलंबस का सपना भरभराकर टूटने लगा. उसने आखिरी कोशिश की. 

उसने तीन दिन की मोहलत मांगी. बगावत पर डटे पिन्जोन भाइयों से कोलंबस ने वादा किया- अगर तीन दिन में जमीन नहीं मिली तो वापस लौटेंगे. 

माना जाता है ये वादा 10 अक्तूबर 1492 को किया गया. 

कोलंबस की अपनी डायरी, 'जो बार्टोलोमे दे लास कासास ने सारांश में लिखी है' में 10 अक्टूबर 1492 को साफ लिखा है. नाविक बहुत परेशान हो गए थे.वे लंबी यात्रा की शिकायत कर रहे थे. कोलंबस ने उन्हें हिम्मत दी और कहा कि वह 'गॉड की मदद से इंडिज मिलने तक” आगे बढ़ते रहेंगे. 

अगले 72 घंटे कोलंबस के भाग्य को ही नहीं विश्व इतिहास की धारा को बदलने वाले थे. आखिर भाग्य भी कमाल की चीज है. 

अगले ही दिन समंदर में एक उम्मीद तैरती दिखी. नाविकों की आंखें चमक उठी. क्या था ये. ये थी पानी में तैरती हरी टहनी. जिस पर हरे पत्ते थे. हरी टहनी मतलब कहीं न कहीं कोई पेड़ है. पेड़ है तो जमीन है. जमीन है तो जिंदगी है. हो न हो ये इंडिया ही है.

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लंबे समय बाद नाविकों का जोश हाई था. उसी शाम कुछ पक्षी भी जहाजों के ऊपर उड़ते दिखाई दिए. अब तो बस खुशियों का ठिकाना नहीं था. आखिर समंदर में इतने पक्षी कहीं न कहीं नजदीकी जमीन से ही उड़कर आए होंगे. उन्हें लगता इंडिया सामने ही है. 

 11 अक्तूबर 1492 की रात. दूर कहीं एक रोशनी टिमटिमा रही थी. किस्मत की कई ठोकरें खा चुका कोलंबस यकीन नहीं कर पा रहा था कि ये सचमुच कोई रोशनी है या उसकी थकी हुई आंखें और डूबे हुए दिल का भ्रम. 

लेकिन ये सच था. रोशनी वैसी ही थी जैसे मोमबत्ती से लौ उठती-गिरती हो. उन्होंने नाविक पेरो गुतिएरेज़ को बुलाया, जिसने भी उसे देखा. कोलंबस को यकीन हो गया कि जमीन करीब है. रात भर चालक दल सतर्क रहा. ठीक दो बजे सुबह, पिंटा जहाज पर नाविक रोड्रिगो दे त्रियाना ने जोर से चिल्लाया- “टीएरा! टीएरा!” यानी की धरती-धरती. जहाजों ने पाल समेट लिए और सुबह का इंतजार किया. 12 अक्टूबर की सुबह, वे बहामास के छोटे द्वीप गुआनाहानी (जिसे कोलंबस ने सैन साल्वाडोर नाम दिया) पर उतरे. कोलंबस शाही झंडा लेकर किनारे पहुंचे, उन्होंने जमीन पर कदम रखा. इतिहास रचा जा रहा था. उन्होंने उस जमीन पर कोलंबस का कब्जा घोषित किया. 

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कुछ ही देर में स्थानीय लोग उनसे मिलने आए. ये क्या, उनकी जमीन पर कपड़े नहीं थे. यह वह ऐतिहासिक पल था जब यूरोपीय आंखों ने नई दुनिया देखी.
कोलंबस जिस जगह उतरा, वह आज के बहामास द्वीप समूह का हिस्सा था. वहां रहने वाले लोगों को उसने "इंडियन" कह दिया, क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि वह भारत के आसपास के द्वीपों में पहुंच चुका है. यही गलती इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई. अमेरिका के मूल निवासियों को लंबे समय तक "इंडियन" कहा जाता रहा.

कोलंबस अपनी जिंदगी के आखिर तक यही मानता रहा कि उसने भारत का समुद्री रास्ता खोज लिया है. उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ कि उसने एक बिल्कुल नए महाद्वीप तक यूरोप का रास्ता खोल दिया है. ये महाद्वीप था संयुक्त राज्य अमेरिका. 

विडंबना देखिए. जिस इंसान ने भारत खोजने के लिए समुद्र में जान दांव पर लगाई, वह भारत तक कभी नहीं पहुंच पाया. लेकिन उसकी "गलती" ने इतिहास की सबसे बड़ी खोजों में से एक को जन्म दिया.

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