आज अगर घर में खाना बच जाए या कोई चीज लंबे समय तक रखनी हो तो हमारे पास फ्रिज, फ्रीजर और एयरटाइट डिब्बे जैसे कई विकल्प हैं. लेकिन हजारों साल पहले जब फ्रिज तो दूर, बिजली तक नहीं थी, तब लोग खाने को खराब होने से कैसे बचाते थे? दरअसल, खाना लंबे समय तक बचाकर रखना इंसानों के लिए कोई नया चैलेंज नहीं है. पुराने समय में भी लोगों को पता था कि अगर मांस, मछली, दूध या दूसरे फूड प्रोडक्ट को सही तरीके से न रखा जाए तो वे जल्दी खराब हो जाएंगे. इसलिए उन्होंने बिना किसी आधुनिक मशीन के ऐसे तरीके खोज लिए थे, जो खाने को काफी लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करते थे. आर्कियोलॉजिस्ट को इसके सबूत भी मिले हैं.
धूप में सुखाकर बचाते थे खाना
खाने को सुरक्षित रखने का सबसे आसान तरीका था उसे सुखाना. मांस, मछली, फल और दूसरी चीजों से नमी निकाल दी जाती थी. इसकी वजह से खाने में मौजूद माइक्रो ऑर्गेनिस्म के लिए बढ़ना मुश्किल हो जाता था. खाने में पानी कम होगा, तो छोटे-छोटे बैक्टीरिया आसानी से नहीं बढ़ पाएंगे. इसलिए खाना ज्यादा समय तक खराब नहीं होगा. यही वजह है कि सुखाया हुआ खाना लंबे समय तक चल सकता है. आज भी हम कई चीजों को सुखाकर रखते हैं. सूखे फल, पापड़, बड़ी, मछली और कई तरह के मांस को सुरक्षित रखने का तरीका इसी पुराने ज्ञान से जुड़ा है.
नमक लगाकर भी बढ़ाते थे खाने की उम्र
पुराने समय में नमक सिर्फ स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल नहीं होता था. यह खाने को लंबे समय तक बचाने का एक महत्वपूर्ण तरीका भी था. मांस या मछली में नमक लगाने से उसके अंदर मौजूद पानी कम होता है. इससे उन माइक्रो ऑर्गेनिस्म बढ़ना कम हो जाता है, जो खाने को खराब करते हैं. यानी नमक लगाने का काम सिर्फ स्वाद बढ़ाना नहीं था, बल्कि खाने को जल्दी सड़ने से बचाना भी था.
धुएं में रखकर बचाते थे मांस
मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए लोग उसे धुएं में भी रखते थे. इस प्रक्रिया को स्मोकिंग कहा जाता है. आर्कियोलॉजिस्ट को करीब 19 हजार साल पुराने एक स्थल पर जानवरों की बड़ी संख्या में हड्डियां मिली थीं. वहां आग जलाने के निशान और लकड़ी के ढांचे के लिए बनाए गए गड्ढे भी मिले. रिसर्चर ने अनुमान लगाया कि वहां मांस को रखने के लिए एक रैक जैसा ढांचा इस्तेमाल किया जाता था, जहां मांस को धुएं में सुखाया जाता होगा.
अचार और फर्मेंटेशन भी काम आता था
आज हम अचार, दही और कई फर्मेंटेड चीजें खाते हैं. इन तरीकों की जड़ें भी बहुत पुरानी हैं. फर्मेंटेशन में कुछ खास माइक्रो ऑर्गेनिस्म खाने में मौजूद शुगर को बदलते हैं. इससे ऐसा वातावरण बन सकता है जिसमें खराब करने वाले दूसरे माइक्रो ऑर्गेनिस्म आसानी से नहीं बढ़ पाते. स्वीडन में करीब 8,600 से 9,600 साल पुराने एक आर्कियोलॉजिस्ट स्थल पर मछलियों की 9 हजार से ज्यादा हड्डियां मिली थीं. एक गड्ढे में मिली मछलियों की हड्डियों पर एसिड से हुए नुकसान के संकेत भी मिले. रिसर्चर ने इसे फर्मेंटेशन से जोड़ा और इसे प्राचीन फर्मेंटेड भोजन के सबसे पुराने सबूतों में से एक माना.
जमीन के अंदर रखते थे खाना
जब फ्रिज नहीं था तो लोगों ने प्रकृति को ही अपना फ्रिज बना लिया था. गुफाओं और जमीन के अंदर बने गड्ढों जैसी जगहों का इस्तेमाल खाना ठंडा रखने के लिए किया जाता था. जमीन के अंदर तापमान आमतौर पर बाहर की तुलना में ज्यादा स्थिर रहता है. इससे कुछ फूड प्रोडक्ट को लंबे समय तक बचाने में मदद मिल सकती थी.
दलदल में दबा देते थे मक्खन
पुराने लोगों का एक तरीका तो आज के समय में काफी हैरान करने वाला लगता है. आयरलैंड और स्कॉटलैंड के दलदली इलाकों में प्राचीन मक्खन के करीब 500 टुकड़े मिले हैं. इनमें से कुछ मक्खन हजारों साल पुराना था. दलदली जमीन में ऑक्सीजन कम होती है और वातावरण अम्लीय होता है. ऐसे माहौल में माइक्रो ऑर्गेनिस्म की गतिविधि और सड़ने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है. इसी वजह से ये मक्खन लंबे समय तक सुरक्षित रह गए.
2009 में करीब 3 हजार साल पुराना लगभग 77 पाउंड यानी करीब 35 किलो का मक्खन का टुकड़ा मिला था. वहीं 2013 में करीब 5 हजार साल पुराना लगभग 100 पाउंड यानी करीब 45 किलो का टुकड़ा भी मिला. हालांकि आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक इन्हें थ्योरेटिकल रूप से खाने योग्य माना जा सकता है, लेकिन इन्हें खाना सुरक्षित नहीं माना जाता और ऐसा करने की सलाह नहीं दी जाती.
असली कमाल था प्रकृति को समझना
पुराने लोगों के पास आज जैसी तकनीक नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने आसपास के नेचर को अच्छी तरह समझ लिया था. उन्हें पता था कि नमी, गर्मी और हवा खाने को जल्दी खराब कर सकती है. इसलिए उन्होंने खाने को सुखाने, नमक लगाने, धुएं में रखने, फर्मेंट करने और ठंडी या ऑक्सीजन कम वाली जगहों पर रखने जैसे तरीके अपनाए. इनमें से कई तरीके आज भी हमारे घरों में इस्तेमाल होते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आज हमारे पास फ्रिज और फ्रीजर जैसी सुविधाएं हैं, जबकि हजारों साल पहले इंसान प्रकृति के नियमों को समझ कर ही अपना खाना बचाता था.
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