सड़कें बह गईं, अपनों का इंतजार कर रहे डरे-सहमे लोग... कुदरत के कहर से जूझते धराली से ग्राउंड रिपोर्ट

गंगोत्री नेशनल हाईवे के दर्जनों स्थानों पर टूटने, सड़कों के धंसने और पुलों के बह जाने से जिला मुख्यालय से धराली तक पहुंचना नामुमकिन हो गया है. गंगनानी के पास बीआरओ का कंक्रीट पुल बह चुका है, नेताला और भटवारी के बीच सड़क दलदल बन चुकी है और गंगा भागीरथी के तीव्र कटाव ने राजमार्ग को पूरी तरह तबाह कर दिया है. ऐसे में न सिर्फ रेस्क्यू टीमें, बल्कि मीडिया और प्रशासनिक अमला भी भटवारी में फंसा हुआ है.

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उत्तरकाशी: बादल फटने के बाद धराली में आई बाढ़ से मची तबाही के बीच जारी है खोज और बचाव अभियान। (PTI Photo) उत्तरकाशी: बादल फटने के बाद धराली में आई बाढ़ से मची तबाही के बीच जारी है खोज और बचाव अभियान। (PTI Photo)

आशुतोष मिश्रा

  • धराली (उत्तरकाशी),
  • 06 अगस्त 2025,
  • अपडेटेड 5:41 PM IST

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की धराली गांव में मंगलवार को कुदरत का कहर देखने को मिला. इस आपदा ने इलाके का नक्शा ही बदल दिया है. पूरा क्षेत्र मलबे में तब्दील हो चुका है. सीएम पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को हर्षिल पहुंचकर हालात का जायजा लिया. लेकिन धराली तक का जमीनी रास्ता अब भी बंद है. 24 घंटे से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन अब भी राहत और बचाव की सभी टीमें आपदा स्थल तक नहीं पहुंच सकी हैं.

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गंगोत्री नेशनल हाईवे के दर्जनों स्थानों पर टूटने, सड़कों के धंसने और पुलों के बह जाने से जिला मुख्यालय से धराली तक पहुंचना नामुमकिन हो गया है. गंगनानी के पास बीआरओ का कंक्रीट पुल बह चुका है, नेताला और भटवारी के बीच सड़क दलदल बन चुकी है और गंगा भागीरथी के तीव्र कटाव ने राजमार्ग को पूरी तरह तबाह कर दिया है. ऐसे में न सिर्फ रेस्क्यू टीमें, बल्कि मीडिया और प्रशासनिक अमला भी भटवारी में फंसा हुआ है.

50 मीटर लंबा और बेहद मजबूत कंक्रीट का वैली ब्रिज, जो वर्षों से इस क्षेत्र के हजारों लोगों की आवाजाही का जरिया था, नदी की प्रलयंकारी धारा में ऐसे समा गया जैसे कोई कागज की नाव बह गई हो. वो पुल अब इतिहास बन गया है. उसका कोई नामोनिशान तक नहीं बचा. और इसी पुल के साथ टूट गया है धराली और हर्षिल का सड़क संपर्क.

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धराली में इस वक्त हालात बेहद गंभीर हैं. राहत कार्यों में जुटी आईटीबीपी और सेना की टीमों को भी हर्षिल कैंप में नुकसान उठाना पड़ा है. जिला अधिकारी और एसपी को हेली से रवाना किया गया, जबकि हेली ऑपरेशन के जरिये खाद्य सामग्री और ज़रूरतमंदों को सुरक्षित स्थानों तक लाने का काम शुरू हुआ है.

धराली से टूट गया संपर्क

गंगवानी पास अब धराली और हर्षिल तक जाने वाली एकमात्र मुख्य सड़क मार्ग को जोड़ता था. लेकिन अब वह मार्ग पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है. सड़कें कट चुकी हैं, जमीन दरक गई है, और हर तरफ सिर्फ मलबा, धूल और बेचैनी है. राहत और बचाव कार्य में लगी मशीनें वहीं अटकी हुई हैं, क्योंकि न आगे जा सकती हैं, न पीछे लौट सकती हैं. इस वक्त गंगवानी से आगे का सफर सिर्फ संघर्ष और जोखिम का नाम है.

बेजार भीड़, जिनके अपने खो गए हैं

स्थानीय लोग बड़ी संख्या में गंगवानी पास के पास जुटे हुए हैं. इनमें से कई अपने परिजनों की खोज में धराली तक पैदल पार जाने को तैयार हैं. उनकी आंखों में आंसू हैं, चेहरे पर गुस्सा है और दिल में डर. वे कह रहे हैं कि अगर प्रशासन नहीं जा सकता, तो हमें जाने दो. हमारे परिवार धराली में फंसे हैं, हम उन्हें ढूंढेंगे. लेकिन प्रशासन के पास कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि जानें का कोई मार्ग ही नहीं बचा है.

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मौसम ने कुछ वक्त का साथ दिया, और उसी का लाभ उठाकर हेली ऑपरेशन शुरू किया गया. देहरादून से राहत सामग्री, रसद, मेडिकल सप्लाई, सैटेलाइट फोन, कंबल, पानी, सूखा राशन – सब कुछ भेजा जा रहा है. लेकिन ये एक लंबी और कठिन लड़ाई है.

धराली और हर्षिल में जो लोग फंसे हैं, उन्हें अभी भी पानी, बिजली, दवाओं की भारी किल्लत झेलनी पड़ रही है. और जब तक सड़क मार्ग दोबारा बहाल नहीं होता, तब तक यह आपदा अविराम बनी रहेगी. प्रशासन की तरफ से जरूरत का सामान हवाई मार्ग से मुहैया कराया जा रहा है.

जिंदगी बचाने की जद्दोजहद: रस्सियों पर लटकी उम्मीदें

गंगवानी में एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें एक वैकल्पिक रास्ता तैयार कर रही हैं. बह चुके ब्रिज के स्थान पर इमरजेंसी रोपवे बनाया जा रहा है. नदी के दोनों किनारों पर रस्सियां फेंकी जा चुकी हैं. एक-एक करके जवान जिपलाइन से दूसरी तरफ स्लाइड कर रहे हैं. पहले जवान, फिर रसद, फिर तकनीकी संसाधन, इसी क्रम में मदद पहुंचेगी.

राजमार्ग मलबे का मैदान बना

गंगवानी से करीब 200 से 300 मीटर तक का हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्ग का अब सिर्फ मलबे का मैदान बन चुका है. उस हिस्से में कभी ट्रक चलते थे, अब पैर भी कांपते हैं. जब तक यह मार्ग रीस्टोर नहीं होता, कोई भारी मशीनरी नहीं पहुंच सकती. आगे का रास्ता भी बंद क्योंकि जो दूसरा लोहे और कंक्रीट का पुल था, वह भी बह चुका है. वैकल्पिक वैली ब्रिज बनाने की तैयारी चल रही है, लेकिन उसके लिए जरूरी लोहे की प्लेट, पिलर्स, वेल्डिंग मशीन और मटेरियल यहां तक लाना अपने आप में एक युद्ध जैसा काम है.

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बिजली पहुंची, लेकिन ऑपरेशन अभी भी दूर

गंगवानी और आसपास के इलाके में बिजली की सप्लाई बहाल हो चुकी है, जो एक बड़ी राहत की बात है. इससे वेल्डिंग का काम, मशीन संचालन और अन्य तकनीकी सुविधाएं शुरू हो सकती हैं. लेकिन फुल स्केल राहत ऑपरेशन शायद आज नहीं, कल तक ही पूरी ताकत के साथ शुरू हो पाएगा.

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