खूबसूरत वादियां, कच्ची-पक्की सड़कें और 16 km का ट्रैक... ऐसे होंगे द्वितीय केदार के अलौकिक दर्शन

पहाड़ों की वादियों में बसे द्वितीय केदार मध्यमहेश्वर के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को करीब 16 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई तय करनी होती है. पैदल यात्रा से पहले आपको कच्ची-पक्की सड़कों का सामना भी करना होता है. बारिश या बदलते मौसम के बीच यह यात्रा थोड़ी कठिन जरूर हो जाती है, लेकिन चारों तरफ बिखरी कुदरत की खूबसूरती मानो हर थकान मिटा देती है.

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उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित मध्यमहेश्वर मंदिर पहाड़ों के बीच बसा है. (Photo: ITG) उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित मध्यमहेश्वर मंदिर पहाड़ों के बीच बसा है. (Photo: ITG)

अमन मैखुरी

  • रुद्रप्रयाग,
  • 25 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:34 PM IST

देवभूमि उत्तराखंड, जहां आस्था और प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. हर साल लाखों श्रद्धालु बाबा केदार, मध्यमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर में महादेव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. आज हम पंच केदारों में से एक द्वितीय केदार 'मध्यमहेश्वर' यात्रा की बात करने वाले हैं. यह यात्रा अपने आप में बेहद अलौकिक और चुनौतीपूर्ण मानी जाती है.

यह सफर इसलिए एक चुनौती बन सकता है क्योंकि कई किलोमीटर पैदल तय करने होते हैं, और अगर बारिश का मौसम हो तो चैलेंज डबल. मगर कहा जाता है कि एक भक्त के मन में सच्ची आस्था हो और जुबां पर 'हर-हर महादेव' का नाम तो हर सफर ईजी बन जाता है.

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इस सफर में सुंदर पहाड़, मनमोहक नजारे और कच्ची-पक्की सड़कें भी आपको मिलेंगी. वहीं बारिश के मौसम में मोरकंडा नदी पार करने के लिए रस्सी के सहारे खींची जाने वाली ट्रॉली की भी व्यवस्था की गई है, जो यात्रा को काफी इंटरेस्टिंग बना देती है.

हालांकि, स्थानीय निवासी (गौंडार) अभिषेक पंवार बताते हैं कि नदी का जलस्तर कम होने की वजह से अस्थायी पुलिया की व्यवस्था कर दी गई है, जिस कारण अब ट्रॉली का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है.

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित मध्यमहेश्वर मंदिर पहाड़ों के बीच बसा है. यहां का मनमोहक और शांत वातावरण हर किसी का मन मोह लेता है. रुद्रप्रयाग से उखीमठ, उखीमठ से रांसी और रांसी से शुरू होती है करीब 16 किलोमीटर की पैदल यात्रा. इस यात्रा में आपको उत्तराखंड के कई सुंदर गांव भी दिखेंगे, जिनमें से एक खूबसूरत गांव है 'गौंडार'.

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यह केवल घूमने का स्थान नहीं है: शिवशंकर लिंग

द्वितीय केदार मध्यमहेश्वर धाम के प्रधान पुजारी शिवशंकर लिंग बताते हैं कि हिमालय भगवान शिव का दिव्य स्थान है. आप यहां आइए, यहां की प्रकृति की सुंदरता को बनाए रखिए. उन्होंने कहा कि यह केवल घूमने का स्थान नहीं है, यह साधना का स्थान है. भगवान के साक्षात्कार का स्थान है. ये शिव से मिलने का स्थान है. यहां का हर कंकर शंकर है. यहां की परंपरा को बनाए रखिए, यहां के धार्मिक महत्व को बनाए रखिए.

यात्रा से पहले ध्यान दें ये बातें

अगर आप इस यात्रा का प्लान बना रहे हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. पहाड़ों पर मौसम का मिजाज मिनटों में बदल जाता है, इसलिए घर से निकलने से पहले वेदर रिपोर्ट जरूर चेक कर लें. बारिश के मौसम में रास्तों पर आगे बढ़ने से पहले स्थानीय लोगों या प्रशासन से रास्ते का हाल कंफर्म करना आपकी मदद कर सकता है. इसके अलावा, ट्रेकिंग शूज, रेनकोट, पावर बैंक और अपनी बेसिक दवाइयां साथ रखना न भूलें. 

स्टे की व्यवस्था भी राह में कई जगहों पर की गई हैं. जरूरी नहीं कि आप एक ही दिन में पूरा सफर तय करें. आप अपने सामर्थ्य के अनुसार डिसाइड कर सकते हैं कि यह सफर कितने दिन में पूरा करना है. इसके अलावा मंदिर पहुंचने पर भी आप नाइट में स्टे कर सकते हैं. लेकिन बेहतर होगा कि आप लेटेस्ट अपडेट जानकर ही जाएं और वहां रहने की उचित व्यवस्था संभव है या नहीं, यह पहले से कंफर्म करके ही आगे बढ़ें.

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प्रकृति का सम्मान करें. मध्यमहेश्वर में कुछ-कुछ जगहों पर कूड़ेदान की व्यवस्था की गई है, लेकिन जिन जगहों पर नहीं है, वहां आपको प्लास्टिक कचरा आदि फेंकने से बचना चाहिए. किसी भी तरीके से नेचर को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है और यही प्रकृति का सम्मान है.

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