लोहाघाट के पाटी ब्लॉक की ग्राम पंचायत गागर के तोक साला रज्यूड़ा में आज भी सड़क सुविधा नहीं पहुंच सकी है. रविवार को इसका खामियाजा एक घायल ग्रामीण और उसके परिवार को भुगतना पड़ा. बैल के हमले में घायल हुए कैलाश भट्ट को इलाज के लिए डोली में बैठाकर करीब चार घंटे तक पैदल रास्ते से मुख्य सड़क तक लाया गया.
जानकारी के मुताबिक, साला तोक निवासी पूर्णानंद भट्ट के बेटे कैलाश भट्ट को रविवार सुबह करीब 6:30 बजे अपने गाय-बैलों को पास के खेतों में चारा चुगाने ले जा रहे थे. इसी दौरान एक बैल ने उन पर सींग से हमला कर दिया. सींग लगने से उनके शरीर पर गंभीर चोट आई और काफी खून बहने लगा.
घटना के बाद चोट की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों ने तत्काल उन्हें अस्पताल पहुंचाने की तैयारी शुरू की. करीब सुबह 7 बजे कैलाश भट्ट को कुर्सी की डोली में बैठाकर गागर की ओर मुख्य सड़क तक ले जाया गया. सड़क न होने के कारण घायल को पैदल रास्ते से ले जाने के अलावा ग्रामीणों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था.
खड़ी चढ़ाई और गर्मी के बीच चार घंटे चला सफर
घायल को डोली में लेकर ग्रामीणों को रास्ते में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. खड़ी चढ़ाई और तेज गर्मी के बीच उन्हें सावधानी से आगे बढ़ना पड़ा. रास्ते में चार जगह ऐसी खड़ी चढ़ाई आई, जहां ग्रामीणों को रुककर आराम करना पड़ा.
करीब चार घंटे की मशक्कत के बाद सुबह 11 बजे घायल कैलाश भट्ट को मुख्य सड़क तक पहुंचाया जा सका. इसके बाद वहां से निजी वाहन की मदद ली गई और उन्हें उपचार के लिए हल्द्वानी रवाना किया गया. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में सड़क सुविधा की कमी से पैदा होने वाली मुश्किलों को सामने ला दिया.
ग्रामीणों का कहना है कि अगर गांव तक सड़क पहुंची होती तो गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को समय पर वाहन से अस्पताल ले जाया जा सकता था. लेकिन सड़क नहीं होने के कारण मरीज या घायल को पहले पैदल मुख्य मार्ग तक लाना पड़ता है. कई बार डोली या कंधे के सहारे यह दूरी तय करनी पड़ती है.
सड़क नहीं होने से ग्रामीणों में आक्रोश
इस घटना के दौरान ग्रामीणों में शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी भी देखने को मिली. ग्रामीणों का आरोप है कि साला रज्यूड़ा तक सड़क पहुंचाने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है. इसके लिए कई बार शासन और प्रशासन को ज्ञापन भी दिए गए, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क उनके लिए सिर्फ आवाजाही की सुविधा नहीं, बल्कि आपात स्थिति में जीवन बचाने का जरिया भी है. गांव में किसी के बीमार पड़ने या घायल होने पर उसे मुख्य सड़क तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है. इस दौरान मरीज और परिजन दोनों को परेशानी झेलनी पड़ती है.
ग्रामीणों ने चुनाव के दौरान किए जाने वाले वादों पर भी सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि चुनाव के समय नेता सड़क निर्माण का आश्वासन देते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता. ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से सड़क का इंतजार करने के बावजूद उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है.
आपात स्थिति में डोली ही सहारा
साला रज्यूड़ा में सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा की आवाजाही में भी मुश्किल होती है, लेकिन किसी आपात स्थिति में समस्या और गंभीर हो जाती है. मरीजों और घायलों को कई किलोमीटर तक पैदल ले जाना पड़ता है. इसके लिए ग्रामीण कभी डोली तो कभी कंधे का सहारा लेते हैं.
कैलाश भट्ट के साथ रविवार को हुई घटना भी इसी समस्या की एक मिसाल है. बैल के हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें करीब चार घंटे तक पैदल रास्ते से मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया. रास्ते की खड़ी चढ़ाई, गर्मी और घायल की स्थिति के बीच ग्रामीणों के लिए यह सफर बेहद कठिन रहा.
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से साला रज्यूड़ा तक सड़क सुविधा उपलब्ध कराने की मांग दोहराई है. उनका कहना है कि सड़क बनने से न सिर्फ आवाजाही आसान होगी, बल्कि किसी आपात स्थिति में मरीजों और घायलों को समय पर अस्पताल पहुंचाना भी संभव हो सकेगा. फिलहाल ग्रामीण सड़क निर्माण के ठोस कदम का इंतजार कर रहे हैं.
अंकित शर्मा