पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव का नतीजा इस बार सिर्फ कैंपस की राजनीति तक सीमित नहीं है. ABVP के अंकित बिधान लगातार दूसरी बार अध्यक्ष चुने गए हैं. उन्होंने AAP समर्थित छात्र संगठन ASAP के आदिल सिंह बराड़ को 512 वोटों से हराया. पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में यूनिवर्सिटी के इस नतीजे ने राजनीतिक चर्चा जरूर बढ़ा दी है. हालांकि, इसे विधानसभा चुनाव का नतीजा मानना सही नहीं होगा.
तो चलिए, पहले नतीजों की पूरी तस्वीर को समझ लेते हैं. अध्यक्ष पद के मुकाबले में अंकित बिधान को 3,149 वोट मिले, जबकि उनके करीबी प्रतिद्वंद्वी आदिल सिंह बराड़ 2,637 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे. वहीं NSUI के प्रत्याशी गुमान सिंह सिद्धू 2,263 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहे.
पिछले साल एबीवीपी ने 48 साल का सूखा खत्म करते हुए करीब 3,000 वोटों के भारी अंतर से यह पद जीता था. इस बार जीत का अंतर घटकर महज 512 वोट रह गया, जिससे साफ पता चलता है कि कैंपस में मुकाबला कितना कांटेदार रहा.
बाकी पदों पर अलग तस्वीर
पूरे चुनाव का नतीजा देखें तो ABVP सिर्फ अध्यक्ष पद अपने नाम कर सकी. उपाध्यक्ष पद पर PUDF के अरमान भिंडर जीते. सचिव पद निर्दलीय दिव्यन सिंह के खाते में गया. संयुक्त सचिव पद पर भी निर्दलीय उम्मीदवार विशाल ने जीत दर्ज की. इवनिंग डिपार्टमेंट के आठ प्रमुख पदों में से छह पर ASAP के नेतृत्व वाले गठबंधन ने जीत हासिल की. यानी कैंपस में छात्रों का समर्थन किसी एक संगठन के साथ नहीं रहा.
SOI के समर्थन से बढ़ी चर्चा
इस चुनाव में शिरोमणि अकाली दल के छात्र संगठन SOI का समर्थन भी अहम रहा. SOI के उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने के बाद संगठन ने ABVP का साथ दिया. इसके बाद BJP और अकाली दल के बीच संभावित नजदीकी को लेकर चर्चा शुरू हुई. हालांकि, अंकित बिधान ने कहा कि यह समर्थन छात्र चुनाव तक ही सीमित था. उन्होंने इसे विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखने से भी इनकार किया.
जीत में क्षेत्रीय पहचान आड़े नहीं आई
इस बार 16,500 छात्र वोट डालने के लिए पंजीकृत थे. इनमें से 9,610 ने मतदान किया. कुल वोटिंग 58.35 प्रतिशत रही. खास बात यह है कि बाकी प्रमुख उम्मीदवार पंजाब से थे, जबकि अंकित बिधान हरियाणा के जींद से आते हैं. इसके बावजूद वह अध्यक्ष पद जीतने में सफल रहे.
चुनाव प्रचार का तरीका भी बदला हुआ दिखा. छात्र संगठनों ने Instagram, WhatsApp और Reels के जरिए वोटरों तक पहुंच बनाई. छोटे वीडियो से लेकर छात्र मुद्दों से जुड़े संदेश तक सोशल मीडिया पर खूब चलाए गए. इससे साफ है कि कैंपस चुनाव में डिजिटल प्रचार अब पहले से ज्यादा अहम हो गया है.
विधानसभा चुनाव से पहले क्या मायने?
ABVP की लगातार दूसरी जीत संगठन के लिए बड़ी बात है. पिछले साल 48 साल बाद मिली जीत को इस बार दोहराना उसकी कैंपस में मजबूत मौजूदगी दिखाता है. मगर दूसरे पदों पर निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत बताती है कि छात्रों का रुझान सिर्फ एक संगठन तक सीमित नहीं है.
इसी वजह से इस नतीजे को विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत मानना ठीक नहीं होगा. हां, पंजाब की युवा राजनीति में कौन से मुद्दे चल रहे हैं और छात्र किस तरह के उम्मीदवार को पसंद कर रहे हैं, इसे समझने के लिए यह चुनाव एक अहम तस्वीर जरूर देता है.
कमलजीत संधू