एक डील के तीन फायदे... सूखे शेखावटी को पानी, दिल्ली में बाढ़ कंट्रोल, हथिनीकुंड की समस्या भी खत्म

राजस्थान और हरियाणा के बीच 32 वर्षों बाद यमुना जल समझौता हुआ है, जो दोनों राज्यों के पेयजल संकट को कम करेगा और दिल्ली में यमुना की बाढ़ से राहत दिलाएगा.

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साल 2023 में दिल्ली में यमुना की बाढ़ से लालकिला इलाके में पानी भर गया था. साल 2023 में दिल्ली में यमुना की बाढ़ से लालकिला इलाके में पानी भर गया था.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:32 PM IST

करीब तीन दशक से ठंडे बस्ते में रहे राजस्थान और हरियाणा के बीच यमुना के पानी को लेकर अहम समझौता हो गया है. 32 वर्षों के बाद मुकम्मल हुआ ये समझौता अब न सिर्फ दोनों प्रदेशों की सूखी जमीन को तर करेगा, बल्कि इसका सबसे बड़ा दूरगामी परिणाम यह है कि हर साल बारिश के मौसम में दिल्ली में आने वाली यमुना की बाढ़ से भी निजात मिलेगी.

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इस लिहाज से इस समझौते के कई लाभदायक पहलू हैं, जिन पर बारीकी से ध्यान देना और समझना जरूरी है. केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में राजस्थान और हरियाणा ने यमुना जल प्रोजेक्ट को तैयार करने इसको अमल में लाने के समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते का लक्ष्य है कि पश्चिमी यमुना नहर से अंडरग्राउंड पाइप लाइन के जरिए राजस्थान के हिस्से का यमुना जल पहुंचाना है. सरकार का कहना है कि इससे दोनों राज्यों में पेयजल संकट कम होगा, भूजल स्तर सुधरेगा और भविष्य में जल बंटवारे को लेकर विवाद की आशंका भी घटेगी.

30 साल पुरानी समस्या का समाधान

राजस्थान को 1994 के अपर यमुना बेसिन समझौते के तहत यमुना का एक निर्धारित हिस्सा मिला था, लेकिन उस पानी को राज्य तक पहुंचाने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार नहीं हो पाया था. नतीजतन राजस्थान अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा था. अब इस नई परियोजना के जरिए उस पानी को पश्चिमी यमुना नहर से भूमिगत पाइपलाइन के माध्यम से राजस्थान तक पहुंचाया जाएगा.

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किन इलाकों को होगा सबसे बड़ा फायदा?

इस समझौते का सबसे अधिक लाभ राजस्थान के सीकर, चूरू और झुंझुनू जिलों को मिलेगा. ये इलाके लंबे समय से पेयजल संकट और कम वर्षा की समस्या से जूझते रहे हैं. इसके अलावा हरियाणा के भिवानी और फतेहाबाद जिलों को भी इस परियोजना से पीने का पानी उपलब्ध कराया जाएगा. सरकार का दावा है कि इससे लाखों लोगों को नियमित और सुरक्षित पेयजल मिल सकेगा.

कैसे पहुंचेगा पानी?

समझौते के तहत हर साल जुलाई से अक्टूबर के बीच लगभग 580 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पानी पश्चिमी यमुना नहर से तीन बड़ी भूमिगत पाइपलाइनों के जरिए राजस्थान तक पहुंचाया जाएगा. हर एक पाइपलाइन का व्यास 3.6 मीटर से अधिक होगा. अंडरग्राउंड पाइपलाइन होने से पानी के रिसाव, वाष्पीकरण और चोरी जैसी समस्याएं भी कम होंगी.

बारिश का एक्स्ट्रा पानी भी आएगा काम

अब तक मानसून के दौरान बहने वाला काफी पानी बिना उपयोग के आगे निकल जाता था. इस समझौते के बाद उस अतिरिक्त पानी का बेहतर प्रबंधन किया जाएगा. इसका उपयोग लोगों की प्यास बुझाने के साथ-साथ बड़े तालाबों और जलाशयों में संग्रह करने के लिए भी होगा. इससे भूजल स्तर बढ़ाने में मदद मिलेगी और भविष्य में जल संकट की स्थिति कम हो सकती है.

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जल प्रबंधन होगा अधिक वैज्ञानिक

समझौते में केवल पानी की आपूर्ति ही नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन की पूरी व्यवस्था भी तय की गई है. इसमें जल आवंटन, पानी छोड़ने का प्रोटोकॉल, लागत का बंटवारा, परियोजना के संचालन और रखरखाव, निगरानी व्यवस्था, पारदर्शिता और विवाद समाधान जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया गया है. इससे भविष्य में किसी भी प्रकार के भ्रम या विवाद की संभावना कम होगी.

दोनों राज्यों के लिए क्यों है 'विन-विन'?

सरकार इस समझौते को हरियाणा और राजस्थान दोनों के लिए "विन-विन" बता रही है. राजस्थान को अपने हिस्से का पानी मिलेगा, जबकि हरियाणा के कुछ जल संकट वाले क्षेत्रों को भी बेहतर पेयजल सुविधा मिलेगी. साथ ही जल संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग होगा और दोनों राज्यों के बीच सहयोग की भावना मजबूत होगी. केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय, केंद्रीय जल आयोग तथा दोनों राज्य सरकारों ने मिलकर ऐसा प्रारूप तैयार किया है, जिसे भविष्य में भी विवाद-मुक्त बनाए रखने का प्रयास किया गया है.

सामाजिक और आर्थिक असर

परियोजना का असर केवल पेयजल तक सीमित नहीं रहेगा. जिन इलाकों में पानी की कमी रहती है, वहां बेहतर जल उपलब्धता से लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा. गांवों में पानी लाने की परेशानी कम होगी, भूजल रिचार्ज बढ़ेगा और जल उपलब्धता के कारण स्थानीय विकास को भी गति मिलने की उम्मीद है. लंबे समय में यह परियोजना सूखा प्रभावित क्षेत्रों की जल सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है.

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दिल्ली की बाढ़ में कैसे मिल सकती है राहत!
दिल्ली में बाढ़ की सबसे बड़ी वजह हथिनीकुंड बैराज से मॉनसून के दौरान छोड़ा जाने वाला अधिक से अधिक पानी, यमुना का उफान, निचले इलाकों में अतिक्रमण और नदी के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) का सिकुड़ना है. विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इस परियोजना के तहत मॉनसून के दौरान एक्स्ट्रा पानी का एक हिस्सा नियंत्रित तरीके से पश्चिमी यमुना नहर और पाइपलाइन प्रणाली के जरिए आगे भेजा जाता है, तो नदी में पानी के बहाव पर सीमित दबाव कम हो सकता है. 

इसके लिए जरूरी है कि नहर और पाइपलाइन की क्षमता पर्याप्त हो, बाढ़ के समय भी पानी मोड़ने की व्यवस्था तकनीकी रूप से संभव हो. इसके लिए अलग से ऑपरेशन की योजना बनाई जाए.

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