हर साल 12 जून को दुनिया भर में 'बाल श्रम विरोधी दिवस' मनाया जाता है. इस मौके पर तमाम सरकारी और गैर-सरकारी मंचों से बच्चों के अधिकारों को लेकर बड़े स्तर पर चर्चाएं होती हैं, साथ ही नई योजनाएं सामने रखी जाती हैं, ताकि भविष्य की रूपरेखा तय की जा सके. लेकिन अगली ही सुबह जब हमआप किसी नुक्कड़ की दुकान या चाय की टपरी पर बैठते हैं, तो एक 15 साल का बच्चा हाथ में केतली लिए पूछता है "साहब, चाय कड़क बनाएं या मीठी?" हम चाय की चुस्की लेते हैं, अखबार में देश और दुनिया की तरक्की की चमचमाती खबरें पढ़ते हैं, फिर उसी बच्चे के हाथ में पैसे थमाकर आगे बढ़ जाते हैं.
यही हमारे समाज का वो कड़वा सच है, जिसे हम रोज देखकर भी अनदेखा कर देते हैं. एक जिम्मेदार नागरिक के नजरिए से देखें तो, जिस समाज का बचपन चाय के गिलासों, फैक्ट्रियों और ईंट-भट्टों के बोझ तले दबा हो, वहां विकास के वास्तविक पैमानों पर अभी बहुत काम किया जाना बाकी है. भारत से लेकर पूरी दुनिया में लाखों बच्चे आज भी स्कूल जाने की उम्र में बर्तन धोने, कपड़े बुनने और फैक्ट्रियों में कठिन श्रम करने को मजबूर हैं. कई मामलों में तो इन मासूमों की बाकायदा तस्करी करके उन्हें दूर-दराज के इलाकों में ले जाया जाता है और वे काम के जाल में फंस जाते हैं.
2015 में लिया गया था बाल मजदूरी को खत्म करने का संकल्प, लेकिन...
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बात करें, तो संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के तमाम देशों ने साल 2015 में एक बड़ा संकल्प लिया था. दरअसल, सभी देशों ने एक लक्ष्य बनाया था कि हम सब मिलकर साल 2025 तक दुनिया से बाल मजदूरी, इंसानों की खरीद-बिक्री और गुलामी को पूरी तरह से जड़ से खत्म कर देंगे. इसे कागजी भाषा में 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल' (SDG 8.7) नाम दिया गया था.
साल 2025 में आई इस संयुक्त रिपोर्ट के आंकड़ों ने दुनिया के सामने वो जमीनी सच्चाई रख दी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आंकड़े बताते हैं कि दुनिया अपने इस वादे को पूरा करने में नाकाम रही है. कोशिशें जरूर हुईं, लेकिन जितनी तेजी से बाल मजदूरी खत्म होनी चाहिए थी, उतनी तेजी से नहीं हुई और आज भी करोड़ों बच्चे काम करने को मजबूर हैं. यानी आसान शब्दों में कहें तो, जो संकल्प 2025 तक बाल मजदूरी मिटाने की खाई थी, वो समय पर पूरी नहीं हो सकी और लक्ष्य अधूरा रह गया.
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में दुनिया भर में करीब 13.8 करोड़ (138 Million) बच्चे बाल मजदूरी के दायरे में थे. राहत की बात बस इतनी है कि साल 2020 के मुकाबले इस संख्या में 2.2 करोड़ से ज्यादा की कमी आई है, जिसने पिछले सालों में बढ़े ग्राफ को वापस नीचे धकेला है. लेकिन सुधार की रफ्तार इतनी धीमी है कि अगर अगले पांच साल में इस कलंक को मिटाना है, तो मौजूदा कोशिशों की स्पीड को 11 गुना तेज करना होगा. इस वैश्विक आंकड़े में 61 प्रतिशत हिस्सा खेती-किसानी का है, जबकि 27 प्रतिशत बच्चे सर्विस सेक्टर (जैसे घरों में काम करना या बाजारों में सामान बेचना) और 13 प्रतिशत उद्योगों में लगे हुए हैं.
जेंडर का वो पेंच, जो बाहर से नहीं दिखता
इस पूरी वैश्विक रिसर्च का एक और बेहद बारीक और महत्वपूर्ण पहलू जेंडर के अंतर का है, जिसे समझे बिना यह विश्लेषण अधूरा है. अगर आप ऊपरी तौर पर देखेंगे, तो यही लगेगा कि हर उम्र में लड़कियों के मुकाबले लड़के बाल मजदूरी का ज्यादा शिकार होते हैं. लेकिन जैसे ही आप इस रिसर्च की गहराई में उतरेंगे, हकीकत का एक दूसरा रूप सामने आता है.
डेटा कहता है कि जब घर के भीतर किए जाने वाले बिना पैसों वाले कामकाज-जैसे झाड़ू-पोछा, बर्तन, खाना बनाना या छोटे भाई-बहनों की देखभाल को भी इस दायरे में शामिल किया जाता है, तब हकीकत पूरी तरह बदल जाती है. हफ्ते में 21 घंटे या उससे अधिक समय तक घरेलू जिम्मेदारियां निभाने वाली बच्चियों को गिनती में लेते ही यह जेंडर गैप पूरी तरह उलट जाता है. साफ शब्दों में कहें तो लड़के जहां बाहर की दुनिया में दुकानों तथा फैक्ट्रियों में काम करते दिखते हैं, वहीं लड़कियां घर की चारदीवारी के भीतर चुपचाप अपना बचपन गंवाने को मजबूर हैं.
पूरी दुनिया के नक्शे पर नजर डालें तो अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग प्रोग्रेस देखने को मिलती है. एशिया-प्रशांत क्षेत्र ने इस मोर्चे पर सबसे उल्लेखनीय काम करके दिखाया है. साल 2020 के बाद से यहां बाल मजदूरी की दर 5.6% से घटकर सीधे 3.1% पर आ गई है, यानी लगभग 2.1 करोड़ बच्चों को इस चक्रव्यूह से आजादी मिली है. लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई देशों में भी कुल संख्या में 11 प्रतिशत की गिरावट आई है.
लेकिन इन सबके बीच उप-सहारा अफ्रीका आज भी बाल मजदूरी का सबसे भारी बोझ ढो रहा है. दुनिया के कुल बाल मजदूरों का करीब दो-तिहाई हिस्सा यानी 8.7 करोड़ बच्चे अकेले इसी इलाके में हैं, जहां आबादी बढ़ने के कारण दर कम होने के बावजूद बच्चों की कुल संख्या में बड़ी कमी नहीं आ सकी है.
चमकते शहरों के पीछे छिपा भारत का अंधकार
अब जरा अपने देश भारत की स्थिति को टटोलते हैं, जहां के आंकड़े इस समस्या की बदलती दिशा को दिखाते हैं. भारत में करीब 10.1 मिलियन बच्चे बाल मजदूरी की दायरे में हैं. सरकारी जनगणना के आंकड़ों को देखें, तो 2001 से 2011 के बीच इनमें 2.6 मिलियन की कमी जरूर आई थी, मगर इस गिरावट के पीछे एक बहुत बड़ा बदलाव छिपा है. बाल मजदूरी में यह कमी केवल ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिली, जहां यह आंकड़ा 1.14 करोड़ से घटकर 81 लाख हो गया. इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों की कहानी बिल्कुल अलग रही, जहां बाल श्रम कम होने के बजाय और बढ़ गया. शहरों में यह संख्या 13 लाख से छलांग लगाकर सीधे 20 लाख तक पहुंच गई. यह साफ संकेत है कि गांवों से रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ बढ़ता पलायन इन मासूमों के बचपन को भी अपनी लपेट में ले रहा है.
अपराध और कानूनी कार्रवाई के मोर्चे पर बात करें, तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े साफ बताते हैं कि देश में कानूनी मुस्तैदी और मामलों के पंजीकरण में तेजी आई है. 2018 से 2022 के बीच बाल श्रम से जुड़े दर्ज मामलों में 44% की वृद्धि देखी गई है, यानी ये केस 810 से बढ़कर 1169 तक पहुंच गए. यही नहीं, चाइल्ड लेबर एक्ट के तहत दर्ज होने वाली FIR में भी 66% की बढ़ोतरी आई है, जो 464 से बढ़कर 751 हो गई है.
इन चुनौतियों के बीच जमीन पर कई सफल बचाव अभियान भी चलाए गए हैं, जो व्यवस्था की सक्रियता को दर्शाते हैं. साल 2024–25 के दौरान 'Access to Justice for Children' प्रोग्राम के तहत पूरे देश भर में 27,000 से ज्यादा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाए गए. इन अभियानों में कुल 44,902 बच्चों को अलग-अलग तरह के शोषण से मुक्त कराया गया. वहीं,'India Child Protection' द्वारा प्रकाशित 'Building the Case for Zero' रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से 40,414 बच्चे सीधे बाल श्रम से निकाले गए, जबकि 2,971 बच्चों को यौन शोषण और 1,517 बच्चों को भीख मंगवाने वाले रैकेटों से छुड़ाया गया. इसके अलावा, इसी अभियान के तहत 8,749 लापता बच्चों को भी खोजकर उनके परिवारों से मिलाया जा सका.
अगर राज्यवार आंकड़ो पर नजर डालें, तो बच्चों को इस स्थिति से बाहर निकालने के मामले में तेलंगाना सबसे आगे रहा, जहां अकेले 11,000 से अधिक मामले सामने आए. इसके बाद बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और मध्य प्रदेश का नंबर आता है. वहीं दूसरी तरफ, मासूमों के यौन शोषण के मामलों में पश्चिम बंगाल से सबसे ज्यादा बच्चों को रेस्क्यू किया गया, जबकि हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भीख मंगवाने वाले मामलों में बड़े स्तर पर बचाव कार्य किया गया. हालांकि यह डेटा पिछले साल तक की स्थिति को ही दर्शाता है.
कलम की आखिरी बात
कानून और नीतियां अपनी जगह पूरी मजबूती से काम कर रही हैं, लेकिन जब तक समाज के तौर पर हमारी सामूहिक चेतना नहीं जागेगी, तब तक इन आंकड़ों को पूरी तरह शून्य पर लाना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा. बाल श्रम विरोधी दिवस मनाने की सार्थकता तभी है जब हम अपने आस-पास के 'छोटू' को सिर्फ एक कामगार न मानकर, उसे देश का भविष्य देखना शुरू करें. योजनाएं और बजट अपनी जगह चलते रहेंगे, लेकिन जब तक एक जागरूक समाज के रूप में हम अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक बचपन को उसका पूरा हक मिलना मुश्किल होगा. ऐसे में एक सजग समाज की तरह अपने आस-पास नजर दौड़ाने की जरूरत है, जहां भी किसी बच्चे का हक छीना जा रहा हो, वहां एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर अपनी आवाज बुलंद करें. वास्तव में जब हर बच्चा पढ़ेगा, तभी हमारा समाज सही मायने में आगे बढ़ेगा
धीरज पांडेय