सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को कम करने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. लोकसभा में सोमवार को 'सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026' पारित कर दिया गया. इस विधेयक के जरिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की अधिकतम स्वीकृत संख्या बढ़ा दी गई है. अब सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश (CJI) समेत कुल 38 जज काम कर सकेंगे.
अधिकतम संख्या 33 से बढ़ाकर 37 की गई
केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह बिल सदन में पेश किया. यह विधेयक 'The Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill-2026' 1956 में संशोधन करता है. संशोधन के तहत मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर अन्य न्यायाधीशों (Puisne Judges) की अधिकतम संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है. यानी मुख्य न्यायाधीश सहित अब सुप्रीम कोर्ट की कुल स्वीकृत क्षमता 34 से बढ़कर 38 जज हो जाएगी.
संविधान पीठों के गठन में मिलेगी सुविधा
यह विधेयक मई 2026 में राष्ट्रपति की ओर से जारी किए गए अध्यादेश का स्थान लेगा. सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ रहे लंबित मामलों को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना समय की जरूरत बन गई थी. सरकार के अनुसार, अतिरिक्त चार जजों की नियुक्ति से मुख्य न्यायाधीश को संविधान पीठों (Constitution Benches) का गठन अधिक नियमित रूप से करने में सुविधा मिलेगी.
इसके साथ ही नियमित अपीलों और अन्य मामलों की सुनवाई भी तेज हो सकेगी. इससे संवैधानिक महत्व के लंबे समय से लंबित मामलों और सामान्य अपीलों, दोनों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है. बिल के वित्तीय प्रभाव का भी सरकार ने आकलन किया है. इसके अनुसार, इस फैसले पर करीब 14.04 करोड़ रुपये का प्रारंभिक खर्च आएगा.
इसमें 10.56 करोड़ रुपये का वार्षिक आवर्ती व्यय शामिल है, जो नए न्यायाधीशों, उनके स्टाफ और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर खर्च होगा. वहीं 3.47 करोड़ रुपये का एकमुश्त गैर-आवर्ती खर्च आधिकारिक बुनियादी ढांचे और आवश्यक सुविधाओं के विकास पर किया जाएगा.
अदालत पर लंबित मामलों का बोझ
संसद में पेश किए गए न्यायिक आंकड़ों के अनुसार, 2026 की शुरुआत तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92 हजार से अधिक हो चुकी थी. हालांकि सर्वोच्च अदालत लगभग अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही है, लेकिन हर साल दाखिल होने वाले नए मामलों की संख्या उनके निपटारे से अधिक बनी हुई है. यही कारण है कि अदालत पर मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है.
सरकार का मानना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से मामलों का बेहतर प्रबंधन हो सकेगा, अलग-अलग विषयों के लिए अधिक पीठों का गठन किया जा सकेगा और न्यायिक प्रक्रिया को गति मिलेगी. विशेष रूप से संविधान से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई में तेजी आने की संभावना जताई गई है. लोकसभा से पारित होने के बाद यह विधेयक अब राज्यसभा में पेश किया जाएगा. यदि वहां भी इसे मंजूरी मिल जाती है और इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो जाती है, तो यह कानून बन जाएगा और सुप्रीम कोर्ट की अधिकतम न्यायिक क्षमता आधिकारिक रूप से 38 जज हो जाएगी.
मंजीत नेगी