ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेल लाइन, 125 किमी लंबे रूट में 83% हिस्सा सुरंगों का; चीन बॉर्डर के करीब तक मजबूत होगी पहुंच

Rishikesh Karnaprayag Rail Line: जानिए कैसे 125 किमी लंबी हिमालयी रेलवे परियोजना केदारनाथ-बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा को सुगम बना रही है और भारत-चीन सीमा तक रणनीतिक पहुंच को मजबूत कर रही है.

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ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से बदलेगी उत्तराखंड की तस्वीर.(Photo:ITG) ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से बदलेगी उत्तराखंड की तस्वीर.(Photo:ITG)

पीयूष मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 24 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:26 PM IST

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में रेल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना पर काम किया जा रहा है. करीब 125 किलोमीटर लंबी यह रेल लाइन गढ़वाल क्षेत्र में आने-जाने का सफर आसान बनाएगी. इससे केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्रा में भी मदद मिलेगी. इसके साथ ही भारत-चीन सीमा के करीब स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पहुंच मजबूत करने में भी यह परियोजना अहम होगी. 12 स्टेशनों से होकर गुजरेगी रेल लाइन...

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ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन 12 स्टेशनों के जरिए ऋषिकेश को कर्णप्रयाग से जोड़ेगी. इससे रेल नेटवर्क पहाड़ी क्षेत्रों के भीतर तक पहुंचेगा. परियोजना से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने, रोजगार के अवसर पैदा होने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचने की उम्मीद है.

कर्णप्रयाग इस रेल लाइन का प्रस्तावित अंतिम स्टेशन है. परियोजना से जुड़े इनपुट के मुताबिक, यह भारत-चीन सीमा से करीब 123 किमी दूर है. हालांकि, यह रेल लाइन सीधे अंतरराष्ट्रीय सीमा तक नहीं जाती. इसका उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में परिवहन नेटवर्क को मजबूत करना है.

पहाड़ों के अंदर बनाई जा रही हैं सुरंगें

हिमालय में रेल लाइन बनाना आसान नहीं है. यहां चट्टानें कमजोर हो सकती हैं और जमीन में बदलाव होने का खतरा रहता है. कई जगहों पर पानी से भरी भूगर्भीय परतें भी सुरंग निर्माण को मुश्किल बना सकती हैं. 

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इसी वजह से इस परियोजना में सुरंगों का बड़ा हिस्सा है. रेल लाइन का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरने की योजना है. परियोजना में 28 मुख्य और एस्केप सुरंगों के साथ 57 बड़े और छोटे पुल शामिल हैं.

सुरंग बनाते समय इंजीनियरों को जमीन की मजबूती, चट्टानों की स्थिति और भूजल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. कमजोर जमीन खुदाई के दौरान अपना आकार बदल सकती है और सुरंग की दीवारों पर दबाव डाल सकती है. इस स्थिति में सुरंग को मजबूत बनाने और जमीन को स्थिर रखने के लिए विशेष तकनीकों की जरूरत होती है.

इन चुनौतियों को देखते हुए रेलवे इंजीनियरों ने टनल बोरिंग मशीन (TBM) लगाने से पहले भूगर्भीय जांच की. अलग-अलग तरह की चट्टानों और जमीन के हिसाब से सुरंग बनाने की तकनीक का चुनाव करना भी जरूरी है.

चीन सीमा के करीब कनेक्टिविटी को मिलेगा सहारा

भारत और चीन के बीच हिमालयी क्षेत्र में संवेदनशील सीमा है. यहां ऊंचे पहाड़, खराब मौसम और सीमित परिवहन सुविधाओं के कारण आवाजाही मुश्किल हो सकती है. ऐसे में सड़क, पुल और रेल नेटवर्क को मजबूत करना महत्वपूर्ण है.

ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेल नेटवर्क पहुंचने से गढ़वाल हिमालय के अंदरूनी इलाकों तक पहुंच बेहतर हो सकती है. इससे यात्रियों को मैदानी क्षेत्रों से पहाड़ों तक आने-जाने के लिए रेल परिवहन का विकल्प मिलेगा.

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इस परियोजना का रणनीतिक महत्व क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं को मजबूत करने में है. बेहतर कनेक्टिविटी से आम लोगों, श्रमिकों, सामान और जरूरी आपूर्ति की आवाजाही में मदद मिल सकती है. साथ ही, सड़क और रेल नेटवर्क के जरिए दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना भी आसान हो सकता है.

इस तरह ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन धार्मिक पर्यटन और क्षेत्रीय विकास के साथ हिमालयी इलाकों में परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने वाली अहम परियोजना है.

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