व्लादिमीर पुतिन की सुरक्षा सिर्फ बुलेटप्रूफ कार, हथियारबंद कमांडो और कड़े सुरक्षा घेरे तक सीमित नहीं है. रूस के राष्ट्रपति की सुरक्षा का एक बेहद संवेदनशील हिस्सा उनकी बायोलॉजिकल सिक्योरिटी भी है. यानी उनके शरीर से जुड़े ऐसे जैविक निशान जैसे बाल, त्वचा के कण, खून या दूसरे जैविक नमूने दूसरों के हाथ न लगें.
वजह यह है कि ऐसे सैंपल किसी व्यक्ति की पहचान और स्वास्थ्य से जुड़ी संवेदनशील जानकारी उजागर कर सकते हैं. इसलिए पुतिन की सुरक्षा में उनके आसपास के हर व्यक्ति, हर जगह और यहां तक कि उनके बायोलॉजिकल फुटप्रिंट को कंट्रोल रखना भी अहम माना जाता है.
दुनिया लगभग सभी राष्ट्राध्यक्ष इस सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करते हैं.
लेकिन इसके पीछे भी एक जासूसी की ऐतिहासिक कहानी है.
ये कहानी 1949 की है. तब सोवियत रूस के नेता स्टालिन थे और और चीन के नेता माओ जेदांग थे. दोनों नेता भले ही कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े थे, लेकिन सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन को चीनी नेता माओ जेदांग पर पूरा भरोसा नहीं था. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्टालिन के दौर में सोवियत खुफिया तंत्र ने विदेशी नेताओं के बारे में जानकारी जुटाने के लिए बेहद अजीब तरीका अपनाया था.
पूर्व सोवियत खुफिया अधिकारी इगोर अतामानेंको के दावे के अनुसार एक गुप्त प्रयोगशाला में विदेशी नेताओं के मल के नमूनों का विश्लेषण कर उनका मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल तैयार किया जाता था.
दिसंबर 1949 में माओ पहली बार मॉस्को पहुंचे और करीब 10 दिन वहां रहे. दावा है कि इस दौरान उनके लिए ऐसे विशेष टॉयलेट लगाए गए थे, जिनमें उनका मल सीवर में जाने के बजाय गुप्त डिब्बों में जमा होता था. बाद में इन नमूनों को प्रयोगशाला भेजकर उनमें मौजूद अमीनो एसिड और पोटैशियम जैसे तत्वों का विश्लेषण किया गया.
सोवियत वैज्ञानिकों का कथित तौर पर मानना था कि शरीर में कुछ रासायनिक तत्वों का स्तर व्यक्ति के स्वभाव के बारे में संकेत दे सकता है. हालांकि, इस पूरे दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.
राष्ट्रपति पुतिन खुद सोवियत संघ के दौर में खुफिया एजेंसी KGB के जासूस रह चुके हैं इसलिए वो जानते हैं कि जासूसी दुनिया में क्या-क्या तरकीबें अपनाई जाती हैं.
दिल्ली में रूसी राष्ट्रपति पुतिन अपनी पूरे सुरक्षा ताम-झाम के साथ दिल्ली आ रहे हैं. उनके विशेष विमान बुधवार को ही दिल्ली में लैंड हो चुके हैं. इन्हें राष्ट्रपति पुतिन का सुरक्षा कवच कहा जाता है. इन विमानों में रशिया का सबसे बड़ा Heavy Military Transport एयरक्राफ्ट भी आया है, जिसका नाम है IL-76. ये सोवियत संघ के ज़माने का चार इंजनों वाला एक भारी विमान है, जिसमें राष्ट्रपति पुतिन की सुरक्षा करने वाले जवान, सैन्य अधिकारी और ज़रूरी साजो-सामान भेजा जाता है.
यानी राष्ट्रपति पुतिन जहां भी जाते हैं, वहां पहले से कड़ी सुरक्षा का एक घेरा बना दिया जाता है. ऐसा घेरा, जिसे भेद पाना लगभग नामुमकिन होता है.
इसके लिए राष्ट्रपति पुतिन के खास सुरक्षा अधिकारी, सैन्य अधिकारी, कम्युनिकेशन एक्सपर्ट, लॉजिस्टिक्स टीम, प्रोटोकॉल अधिकारी, खास गाड़ियां और कई बार राष्ट्रपति पुतिन का पसंदीदा खाना भी भेजा जाता है. ऐसा नहीं है कि ये पूरी व्यवस्था पिछले कुछ सालों में शुरू हुई है. साल 2000 में जब व्लादिमीर पुतिन पहली बार रशिया के राष्ट्रपति बने, तभी से वो होटल के पानी, बर्तन या हाउसकीपिंग में काम करने वाले लोगों पर भरोसा करना बंद कर चुके थे. उस वक्त भी उनके लिए हर विदेशी दौरों पर रूस से पानी, उनके बिस्तर, मेडिकल किट, डॉक्टर और सुरक्षा अधिकारियों की एक खास टीम भेजी जाती थी और जिस होटल में राष्ट्रपति पुतिन ठहरते थे, वहां पहले बिस्तर बदले जाते थे और उसके बाद पूरे रूम को सैनिटाइज़ किया जाता था.
इसके बाद साल 2010 में ये नियम भी बना कि राष्ट्रपति पुतिन जब भी विदेश दौरों पर जाएंगे, उनके साथ एक मोबाइल फूड प्रयोगशाला भी भेजी जाएगी. जिसमें राष्ट्रपति पुतिन द्वारा चुने गए खास शेफ और वैज्ञानिक होते हैं. और इनका काम होता है 'पानी से लेकर सलाद' तक सबकी जांच करना होता है. इसके बाद ही इसे राष्ट्रपति पुतिन को परोसने की अनुमति दी जाती है.
इसी सुरक्षा को साल 2014 में और कड़ा बनाया गया और इस बार ये तय हुआ कि विदेशी दौरों पर राष्ट्रपति पुतिन का कोई भी बॉयलॉजिकल फूटप्रिंट नहीं छूटना चाहिए.
इस दौरान राष्ट्रपति पुतिन जो भी गिलास छूते है, टिश्यू पेपर का इस्तेमाल करते हैं या कोई सामान छोड़ते हैं तो उनकी टीम उसे तुरंत इकट्ठा करके रशिया ले जाती है. और यहां तक कि जिस होटल में राष्ट्रपति पुतिन ठहरते हैं, वहां रूम की प्लम्बिंग यानी नाली तक सील कर दी जाती ताकि कोई जैविक नमूना दूसरे देश में ना छूट सके.
यूक्रेन युद्ध के बाद तो राष्ट्रपति पुतिन की सुरक्षा को और भी कड़ा बना दिया गया है.
उनके खाने और बोतलबंद पानी की बार-बार जांच होती है. वो जिस भी चीज़ को छूते हैं या जिस भी कुर्सी या सोफे पर बैठते हैं, उसे साफ और सैनिटाइज़ किया जाता है. उनकी सुरक्षा के लिए ड्रोन जैमर और एंटी-ड्रोन हथियार भेजे जाते हैं. बुलेटप्रूफ और ब्लास्टप्रूफ गाड़ियां भेजी जाती हैं. और उनकी सुरक्षा के लिए स्नाइपर कमांडो भी मौजूद रहते हैं.
क्रेमलिन ने खुद बताया है कि सेना की एक विशेष ईकाई सिर्फ राष्ट्रपति पुतिन की सुरक्षा के लिए बनाई गई है, जिसमें 800 से ज्यादा जवान हैं.
आजतक ब्यूरो