राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 10 अक्टूबर को हिमालय की सबसे ऊंची चोटियों के बीच से गुजरने वाली अटल टनल का दौरा किया. राष्ट्रपति ने कहा कि यह टनल सिर्फ कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं है, बल्कि यह भारत की तकनीक, मेहनत और अडिग इरादों की पहचान है.
राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अटल टनल वैश्विक मानकों की इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है. सीमा सड़क संगठन(BRO) ने इसे असाधारण समर्पण के साथ बनाया है. यह आइकॉनिक इंफ्रास्ट्रक्चर भारत की तकनीकी ताकत और सबसे मुश्किल इलाकों में भी बिना रुकावट कनेक्टिविटी देने के संकल्प का सबूत है.
अटल टनल से पहले रोहतांग पास सर्दियों में 6 महीने तक बर्फ से बंद रहता था. लाहौल-स्पीति के लोग और सेना दोनों के लिए यह बड़ा संकट था. अब 9.02 किलोमीटर लंबी यह सुरंग मनाली को लेह से जोड़ने वाले रास्ते को साल भर खुला रखती है.
10 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर बनी यह दुनिया की सबसे लंबी हाईवे टनल है. अंदर ऑक्सीजन, लाइट और सुरक्षा के हर इंतजाम किए गए हैं. सेना के टैंक से लेकर आम गाड़ियां तक अब घंटों का सफर मिनटों में तय कर रही हैं.
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बीआरओ ने लिखी मेहनत की कहानी
बर्फीले तूफान, भूस्खलन और ऑक्सीजन की कमी के बीच सीमा सड़क संगठन के जवानों और इंजीनियरों ने दिन-रात काम करके इसे बनाया. कई बार काम रोकना भी पड़ा. राष्ट्रपति ने इसी समर्पण को "अनुकरणीय" बताया. उनके मुताबिक ऐसी परियोजनाएं बताती हैं कि भारत अब चुनौतियों को झेलता नहीं, उन्हें तोड़कर आगे बढ़ता है.
बता दें, अटल टनल का शिलान्यास 2002 में हुआ था. इसे बनाने में करीब 18 साल लगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 अक्टूबर 2020 को इसे राष्ट्र को समर्पित किया था. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर इसका नाम रखा गया.
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