भारत में मदरसों के रजिस्ट्रेशन और मान्यता को लेकर पूरी तस्वीर सामने आई है. देश में मदरसा शिक्षा मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधीन आती है और हर मदरसे को सबसे पहले एक कानूनी संस्था के तौर पर रजिस्टर होना पड़ता है. उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा मदरसा सिस्टम है, जहां नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मदरसा शिक्षा बोर्ड कानून को ज्यादातर सही ठहराया था. वहीं जनवरी 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ मान्यता न होने की वजह से किसी मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता.
किसी भी मदरसे को चलाने के लिए सबसे पहले उसे कानूनी रूप देना जरूरी होता है. इसके लिए तीन रास्ते होते हैं, सोसाइटी के तौर पर रजिस्ट्रेशन, ट्रस्ट बनाना या सेक्शन 8 कंपनी खोलना. अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती तो मदरसे को न तो कानूनी मान्यता मिलती है, न बैंक खाता खुल पाता है और न ही सरकारी योजनाओं का फायदा मिल पाता है.
इससे अलग एक और प्रक्रिया होती है, जिसे मान्यता कहा जाता है. ज्यादातर राज्यों में इसके लिए मदरसा शिक्षा बोर्ड या इससे मिलती जुलती संस्था होती है. उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2004 के तहत काम करता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में सही ठहराया था.
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार मदरसों में पढ़ाई के स्तर, सिलेबस और परीक्षाओं को नियंत्रित कर सकती है. हालांकि कामिल और फाजिल जैसी बड़ी डिग्रियों को यूनिवर्सिटी स्तर की मान्यता देना यूजीसी कानून के खिलाफ माना गया और उस हिस्से को असंवैधानिक करार दिया गया.
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बिना मान्यता वाले मदरसे भी चल सकते हैं. इस साल जनवरी में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा कि सिर्फ मान्यता न होने के आधार पर किसी मदरसे को बंद करने का कोई नियम नहीं है. लेकिन ऐसे मदरसों को सरकारी अनुदान, बोर्ड की परीक्षा में शामिल होने का अधिकार या बच्चों की डिग्री को सरकारी मान्यता नहीं मिलती.
उत्तर प्रदेश में साल 2017 से हर मान्यता प्राप्त मदरसे का रजिस्ट्रेशन मदरसा पोर्टल पर कराना जरूरी है. इससे पारदर्शिता बढ़ती है और विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे आधुनिक विषयों को भी मदरसों में जोड़ा जाता है. केंद्र सरकार की स्कीम एसपीईएमएम का फायदा भी सिर्फ मान्यता प्राप्त मदरसों को ही मिलता है.
बाकी राज्यों में व्यवस्था अलग है. उत्तराखंड में पुराना मदरसा बोर्ड खत्म करके नया अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाया गया है, जहां राज्य शिक्षा बोर्ड से जुड़ना जरूरी है. पश्चिम बंगाल में भी हाल में अनिवार्य रजिस्ट्रेशन और निरीक्षण का प्रस्ताव आया है. कई राज्यों में बिना मान्यता वाले यानी खारजी मदरसों की संख्या काफी ज्यादा है.
कुल मिलाकर मदरसा चलाना संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत मौलिक अधिकार है, लेकिन राज्य पढ़ाई का स्तर बनाए रखने के लिए नियम बना सकता है. अगर मदरसों को सरकारी मदद, परीक्षा और बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना है तो रजिस्ट्रेशन और मान्यता जरूरी कदम बन जाते हैं.
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