बात 27 साल पहले की है. साल था 1999. मई का महीना चल रहा था. तारीख थी 3 मई. लद्दाख में सुबह हो चुकी थी, लेकिन यहां सुबह का मतलब चिड़ियों की चहचहाहट नहीं होता. यहां सुबह होती है बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच, जहां ठंडी हवा हड्डियों तक उतर जाती है और दस्ताने पहनने के बाद भी उंगलियां सुन्न पड़ जाती हैं.
कारगिल जिले का बटालिक सेक्टर. इसी इलाके का एक छोटा-सा गांव है गारखोन. यहीं रहता था एक साधारण चरवाहा, ताशी नामग्याल. उस सुबह वह किसी जंग, घुसपैठ या सरहद की चिंता में नहीं था. उसे तो बस अपने खोए हुए याक की तलाश थी. ताशी अपने एक दोस्त के साथ जुब्बार लंगपा नाले के किनारे करीब पांच किलोमीटर ऊपर पहाड़ की तरफ निकल पड़ा. उसके हाथ में दूरबीन थी. चलते-चलते वह दूर-दूर तक बर्फ से ढकी पहाड़ियों को देख रहा था. उम्मीद थी कि कहीं न कहीं उसके याक नजर आ जाएंगे.
लेकिन उस दिन दूरबीन में जो दिखा, वह याक नहीं थें. दूर एक पहाड़ी पर कुछ लोग दिखाई दिए. ताशी ने दूरबीन का फोकस ठीक किया. अब तस्वीर पहले से ज्यादा साफ थी. कुछ लोग पठानी कपड़ों में थे, जबकि कुछ ने पाकिस्तानी सेना की कैमोफ्लाज वर्दी पहन रखी थी. वे पत्थरों की आड़ लेकर बंकर खोद रहे थे. कुछ के हाथों में हथियार भी थे.
अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर ये कैमोफ्लाज वर्दी क्या बला है? आसान भाषा में समझिए. यह सैनिकों की एक खास तरह की वर्दी होती है, जिस पर हरे, भूरे, खाकी और मिट्टी जैसे रंगों के धब्बेदार पैटर्न बने होते हैं. इसे इस तरह तैयार किया जाता है कि सैनिक पहाड़, जंगल या रेगिस्तान जैसे इलाकों में आसपास के माहौल में घुल-मिल जाएं और दुश्मन की नजर में आसानी से न आएं.
खैर... अब वापस चलते हैं उसी सुबह की तरफ. ताशी उनकी सही संख्या का अंदाजा नहीं लगा सका, लेकिन एक बात उसे साफ समझ आ गई, ये लोग नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार से आए थे. वह उस इलाके को अच्छी तरह जानता था. कौन-सी पहाड़ी पर किस मौसम में कौन आता-जाता है, यह उसके लिए नई बात नहीं थी. इसलिए उसे समझते देर नहीं लगी कि मामला साधारण नहीं है. ऐसे में उसने याक की तलाश वहीं छोड़ दी और जितनी तेजी से हो सकता था, पहाड़ से नीचे उतरकर भारतीय सेना की चौकी की तरफ चल पड़ा. उसे शायद उस वक्त इसका अंदाजा भी नहीं था कि उसकी दी हुई यही सूचना आने वाले दिनों में कारगिल युद्ध की सबसे अहम शुरुआती सूचनाओं में गिनी जाएगी.
बात छोटी थी, लेकिन नजरअंदाज करने लायक नहीं. सरहद पर तैनात जवान जानते थे कि इन पहाड़ों को सबसे अच्छी तरह यहां के स्थानीय लोग ही जानते हैं. इसलिए ताशी की बात को हल्के में नहीं लिया गया. शुरुआत में किसी को यह अंदाजा नहीं था कि मामला कितना बड़ा है. पहले लगा कि शायद कुछ घुसपैठिए होंगे, जैसा पहले भी कभी-कभार होता रहा था. लेकिन एक-एक दिन गुजरता गया और तस्वीर बदलती गई. इसी दौरान 4 जाट रेजिमेंट के युवा अफसर कैप्टन सौरभ कालिया अपनी पेट्रोलिंग पार्टी के साथ आगे बढ़े.
15 मई 1999. हालात का पता लगाने के लिए भारतीय सेना ने एक गश्ती दल भेजा. इसकी अगुआई 22 साल के युवा अधिकारी कैप्टन सौरभ कालिया कर रहे थे. उनके साथ पांच जवान थे, सिपाही अर्जुन राम, भंवर लाल बगारिया, भीखा राम, मूला राम और नरेश सिंह. उनका काम था बजरंग पोस्ट के आसपास की ऊंचाइयों की टोह लेना और यह पता लगाना कि आखिर वहां क्या हो रहा है. लेकिन जिस इलाके की ओर वे बढ़ रहे थे, वहां हालात पहले ही बदल चुके थे. गश्त के दौरान कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों का सेना से संपर्क टूट गया. इसके बाद वे लापता हो गए.
देश इंतजार करता रहा.
एक दिन...
दो दिन...
फिर कई दिन गुजर गए.
सेना लगातार उनकी तलाश में जुटी रही, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. ऐसे में परिवारों को भी सिर्फ इंतजार ही नसीब हुआ. करीब 22 दिन बाद, 9 जून 1999 को पाकिस्तान ने कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों के शव भारत को सौंपे. जब ताबूत खुले, तो पूरा देश स्तब्ध रह गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट और भारतीय सेना के रिकॉर्ड से पता चला कि कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों को अमानवीय यातनाएं दी गई थीं. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया.
अब तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी थी. यह कुछ घुसपैठियों की हरकत नहीं थी. पाकिस्तान ने सुनियोजित तरीके से भारतीय सीमा के भीतर ऊंची चोटियों पर अपने सैनिक तैनात कर दिए थे. भारत के सामने अब सिर्फ जवाब देने का नहीं, बल्कि अपनी हर इंच जमीन वापस लेने का लक्ष्य था.
उधर, सेना अलग-अलग चोटियों से आने वाली रिपोर्टों को जोड़ रही थी. हर नई रिपोर्ट एक ही बात कह रही थी, दुश्मन कई जगहों पर बैठ चुका है. यानी यह कोई अचानक हुई घुसपैठ नहीं थी. इसके पीछे लंबी तैयारी थी.
अब बारी थी इस चुनौती का जवाब देने की. सेना को समझ आ चुका था कि मामला कुछ लोगों के चुपके से पहाड़ पर चढ़ आने का नहीं है. अगले एक-दो दिनों में द्रास, कारगिल और बटालिक से लगातार ऐसी खबरें आने लगीं, जिन्होंने पूरी तस्वीर साफ कर दी.
इन इलाकों की कई ऊंची चोटियों पर हथियारों से लैस लोग जमे हुए थे. बाद में पता चला कि ये कोई भटके हुए लड़ाके नहीं थे. इनमें बड़ी संख्या पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री (NLI) के सैनिकों की थी. शुरुआत में पाकिस्तान दुनिया को यही बताता रहा कि ये मुजाहिदीन हैं, लेकिन धीरे-धीरे सबूत सामने आने लगे और उसका सच बेनकाब हो गया.
अब सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर पाकिस्तान चाहता क्या था?
इसका जवाब मिलता है 'ऑपरेशन बद्र' में. पाकिस्तान की योजना थी कि सर्दियों में खाली होने वाली भारतीय सेना की कुछ ऊंची चौकियों पर चुपचाप कब्जा कर लिया जाए. मकसद यह था कि भारत को जब तक इसकी भनक लगे, तब तक वहां मजबूत बंकर और मोर्चे तैयार हो चुके हों. इसके बाद उन ऊंचाइयों से आसपास के इलाके और श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर दबाव बनाया जा सके.
इन चोटियों की सबसे बड़ी ताकत क्या थी?
इन चोटियों से नीचे गुजरने वाले श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (तब NH-1A) पर सीधी नजर रखी जा सकती थी. यही सड़क कारगिल, लेह और आगे सियाचिन में तैनात भारतीय सेना के लिए सबसे अहम सप्लाई रूट थी. अगर इस रास्ते पर लगातार गोलाबारी होती, तो सेना तक हथियार, गोला-बारूद, राशन और दूसरी जरूरी सामग्री पहुंचाना बेहद मुश्किल हो जाता. यानी लड़ाई सिर्फ कुछ पहाड़ों पर कब्जे की नहीं थी. असली मकसद भारत की सप्लाई लाइन पर दबाव बनाना और लद्दाख से उसका संपर्क कमजोर करना था.
उधर भारतीय सेना ने भी साफ कर दिया था कि अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं है. लेकिन चुनौती आसान नहीं थी. दुश्मन ऊंची चोटियों पर मजबूत मोर्चे बनाकर बैठा था, जबकि भारतीय जवानों को नीचे से खड़ी चढ़ाई चढ़कर हमला करना था. पहाड़ों की लड़ाई का यही सबसे कठिन नियम है, जो ऊंचाई पर होता है, उसे स्वाभाविक बढ़त मिलती है. और जो नीचे होता है, उसे हर कदम चढ़ते हुए दुश्मन की गोलियों का सामना करना पड़ता है.
जरा सोचिए, करीब 16 से 18 हजार फीट की ऊंचाई, चारों तरफ बर्फ, सामने ऊंची चोटियों पर बैठा दुश्मन और ऑक्सीजन इतनी कम कि कुछ कदम चलने पर ही सांस फूल जाए. ऐसी मुश्किल परिस्थितियों में भारतीय जवानों को पीठ पर 20-25 किलो का सामान लेकर खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ रही थी. यह सिर्फ गोलियों की लड़ाई नहीं थी. यह मौसम, बर्फ, ऊंचाई और उन चट्टानों से भी जंग थी, जिनके पीछे दुश्मन मजबूत मोर्चे बनाकर बैठा था. हर कदम पर जान का खतरा था, लेकिन भारतीय जवान बिना रुके आगे बढ़ रहे थे.
दिल्ली में लगातार बैठकें चल रही थीं. सेना प्रमुख जनरल वी.पी. मलिक, रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हालात पर पल-पल नजर रखे हुए थे. साफ हो चुका था कि यह सीमित घुसपैठ नहीं, बल्कि अच्छी तरह सोची-समझी सैन्य कार्रवाई थी और इसका जवाब भी उसी स्तर पर देना होगा.
कई दौर की चर्चा के बाद रणनीति तय हुई. सबसे पहले सेना मोर्चा संभालेगी और जरूरत पड़ने पर वायुसेना को भी अभियान में शामिल किया जाएगा. लेकिन एक फैसला बिल्कुल साफ था कि भारतीय सेना नियंत्रण रेखा (LoC) पार नहीं करेगी. इसका मतलब था कि जवाब पूरी ताकत से दिया जाएगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियमों और अपनी सीमा के भीतर रहकर. यही फैसला आगे चलकर भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत बना. दुनिया ने देखा कि भारत युद्ध लड़ रहा था, लेकिन संयम और अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं का भी पूरी तरह पालन कर रहा था. अब बारी थी आसमान से जवाब देने की.
जब आसमान से बरसी आग... और कारगिल में तिरंगा फिर लहराया
मई 1999 का आखिरी हफ्ता था. जमीनी लड़ाई जारी थी, लेकिन साफ हो गया था कि सिर्फ पैदल सैनिकों के दम पर ऊंची चोटियों पर बैठे दुश्मन को हटाना आसान नहीं होगा. ऐसे में फैसला हुआ कि अब भारतीय वायुसेना भी इस अभियान का हिस्सा बनेगी.
26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरू किया. मिराज-2000, मिग-21, मिग-23 और मिग-27 जैसे लड़ाकू विमान मिशन पर निकले. उनका काम था दुश्मन के ठिकानों, सप्लाई रूट और बंकरों को निशाना बनाकर जमीनी सैनिकों का रास्ता आसान करना. हवाई हमलों के बाद भारतीय सेना ने अलग-अलग चोटियों पर कब्जा वापस लेने का अभियान और तेज कर दिया. तोलोलिंग, पॉइंट 5140 और टाइगर हिल जैसी चोटियां एक-एक करके युद्ध का केंद्र बन गईं. कहीं जवानों ने रात के अंधेरे में खड़ी चट्टानों पर चढ़ाई की, कहीं रस्सियों के सहारे ऊपर पहुंचे और कई जगह आमने-सामने की भीषण लड़ाई हुई.
इसी युद्ध में कई ऐसे वीर सामने आए, जिनकी बहादुरी आज भी मिसाल मानी जाती है. कैप्टन विक्रम बत्रा का "ये दिल मांगे मोर" पूरे देश का जोश बन गया. कैप्टन मनोज कुमार पांडे ने अद्भुत साहस दिखाया. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव कई गोलियां लगने के बाद भी आगे बढ़ते रहे, जबकि राइफलमैन संजय कुमार ने घायल होने के बावजूद दुश्मन के बंकर पर कब्जा कर लिया. ऐसे सैकड़ों जवानों के साहस ने धीरे-धीरे हर अहम चोटी भारत के कब्जे में वापस ला दी. आखिरकार 26 जुलाई 1999 को करीब दो महीने तक चले संघर्ष के बाद भारत ने ऑपरेशन विजय की सफलता का ऐलान किया. कारगिल की चोटियों पर एक बार फिर तिरंगा लहरा रहा था.
इस युद्ध में भारत के 527 जवान शहीद हुए और 1,300 से ज्यादा घायल हुए. यह सिर्फ एक सैन्य जीत नहीं थी. यह उन सैनिकों के साहस की जीत थी, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. यह उन परिवारों के धैर्य की जीत थी, जिन्होंने अपने बेटों को खोकर भी देश का सिर ऊंचा रखा. और यह उस सतर्कता की भी जीत थी, जिसने समय रहते खतरे को पहचानकर पूरे देश को एक बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार किया.
ऐसे ही लोगों में एक नाम था, ताशी नामग्याल. उन्होंने कभी खुद को हीरो नहीं माना. कई साल बाद जब पत्रकार उनसे मिलने पहुंचे, तो उन्होंने बड़ी सादगी से कहा, "मैंने वही किया जो मुझे सही लगा. जो देखा, उसकी जानकारी सेना को दे दी." यही थे ताशी नामग्याल. न उन्होंने अपनी बहादुरी का ढिंढोरा पीटा, न किसी सम्मान की उम्मीद की. उन्होंने सिर्फ एक जिम्मेदार नागरिक होने का फर्ज निभाया.
दिसंबर 2024 में ताशी नामग्याल इस दुनिया को अलविदा कह गए. लेकिन कारगिल युद्ध का इतिहास जब भी लिखा या सुनाया जाएगा, उनका नाम हमेशा याद किया जाएगा. इसलिए नहीं कि उन्होंने मोर्चे पर लड़ाई लड़ी, बल्कि इसलिए कि सही समय पर दी गई उनकी एक सूचना ने देश को एक बड़े खतरे से आगाह कर दिया. कारगिल की जीत सिर्फ उन सैनिकों की नहीं थी, जिन्होंने दुश्मन से मोर्चा लिया. यह उन गुमनाम लोगों की भी कहानी है, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के देश का साथ दिया.
आज, 26 जुलाई को देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है. यह दिन सिर्फ जीत का जश्न मनाने का नहीं, बल्कि उन 527 वीर जवानों, उनके परिवारों और ताशी नामग्याल जैसे गुमनाम नायकों को याद करने का भी है, जिनकी वजह से भारत ने कारगिल की चोटियों पर फिर से तिरंगा लहराया. कहा जाता है कि युद्ध जीतने के लिए हथियार जरूरी होते हैं, लेकिन कई बार एक पैनी नजर भी इतिहास बदल देती है. कारगिल की कहानी में वह नजर एक साधारण चरवाहे ताशी नामग्याल की थी.
धीरज पांडेय