कलम तलवार से ज़्यादा ताकतवर होती है, जो लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, उनके पास सरकारों से सवाल पूछने, ज़मीनी हकीक़त सामने लाने और जनमत को दिशा देने की ताक़त होती है, लेकिन क्या अगर इस ताक़त का दिखावा महज 599 रुपये में ख़रीदा जा सके तो. 'इंडिया टुडे' ने CJP प्रोटेस्ट 2.0 को कवर कर रहे कुछ ऐसे लोगों को देखा जो पत्रकार होने का दिखावा कर रहे थे.
पड़ताल में ऐसी कई वेबसाइट्स का पता चला है, जो महज 599 रुपये से प्रेस आईडी, रिपोर्टर प्रोफाइल और पत्रकारिता से जुड़े दूसरे पहचान-पत्र बेचने का दावा करती हैं. CJP प्रोटेस्स 2.0 के दौरान जंतर-मंतर पर ऐसे कुछ लोग भी नजर आए, जो इन वेबसाइट्स से जुड़ी पहचान के साथ रिपोर्टिंग करते दिखे.
CJP प्रोटेस्ट 2.0 के दौरान हजारों युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे, इनमें कुछ लोग न्याय की मांग कर रहे थे, तो कुछ राजनीतिक बदलाव चाहते थे, लेकिन नारों और झड़पों के बीच सोशल मीडिया पर लाइक, व्यूज और फॉलोअर्स पाने की होड़ भी दिखाई दी. कुछ लोगों के लिए यह प्रदर्शन वायरल होने का मौका बन गया.
पहले प्रदर्शन के दौरान कई युवा रिपोर्टर अपनी जमीनी कवरेज के कारण चर्चा में आए थे, इनमें से कई के पास बड़े मीडिया संस्थानों का समर्थन नहीं था, लेकिन उनकी रिपोर्टिंग ने लोगों का ध्यान खींचा. दूसरे प्रदर्शन तक कैमरों और माइक्रोफोन की संख्या बढ़ गई. इसी के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि इनमें से कौन वास्तव में पत्रकारिता कर रहा है और कौन सिर्फ पत्रकार होने का दिखावा कर रहा है.
इंडिया टुडे ने सबसे पहले जंतर-मंतर पर एक ऐसे व्यक्ति को देखा, जिसके माइक्रोफोन पर ‘इंडियन प्रेस यूनियन’ का लोगो लगा था. इस संगठन की वेबसाइट और ऑनलाइन गतिविधियों की जांच करने पर पता चला कि वहां प्रेस आईडी, माइक्रोफोन और पत्रकारिता से जुड़े दूसरे पहचान-पत्र पैसे लेकर उपलब्ध कराने का दावा किया गया था.
इसके बाद पड़ताल में कम से कम पांच अन्य वेबसाइट्स भी सामने आईं, जो प्रेस पहचान-पत्र बेचने का विज्ञापन कर रही थीं, इनमें कुछ की कीमत महज 599 रुपये से शुरू होती थी.
599 रुपये से लेकर 25 हजार रुपये तक के पैकेज
इंडिया टुडे ने ऐसी 6 वेबसाइट्स की जांच की, इनमें से चार वेबसाइट्स पर प्रेस आईडी और उससे जुड़ी सेवाओं की कीमतें साफ तौर पर दी गई थीं. इसके अलावा, द फ्रंटमीडिया फेडरेशन नाम की वेबसाइट पर वाहन पास और अंतरराष्ट्रीय प्रेस कार्ड जैसी सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया था.
इन पेशकशों को देखें तो कुछ वेबसाइट्स पत्रकार जैसी पहचान बनाने के लिए जरूरी दिखने वाली लगभग हर चीज उपलब्ध कराने का दावा करती हैं. इनमें पहचान-पत्र, ऑनलाइन प्रोफाइल, प्रकाशित लेख और रिपोर्टिंग के लिए माइक्रोफोन तक शामिल हैं.
बिना अनुभव और मीडिया संस्थान के समर्थन के पत्रकार जैसी पहचान
पड़ताल के मुताबिक, किसी व्यक्ति के पास प्रेस आईडी होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह किसी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थान का पत्रकार है या उसे किसी खास जगह पर रिपोर्टिंग करने की आधिकारिक अनुमति मिली हुई है.
ऐसे पहचान-पत्रों का गलत इस्तेमाल कई तरह से हो सकता है. उदाहरण के लिए, पड़ोसी से विवाद होने पर कोई व्यक्ति प्रेस कार्ड बनवाकर दूसरे पक्ष के खिलाफ एकतरफा या मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित कर सकता है. इसी तरह, किसी सहकर्मी से विवाद होने पर पत्रकार होने का दावा करके उसकी संवेदनशील जानकारी जुटाने की कोशिश की जा सकती है.
ऐसी पहचान का इस्तेमाल पुलिस की जांच से बचने, प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश पाने या लोगों से जानकारी हासिल करने की कोशिश में भी किया जा सकता है. हालांकि, किसी वेबसाइट से कार्ड खरीद लेने भर से ऐसे अधिकार नहीं मिल जाते.
इंडिया टुडे की पड़ताल में यह भी सामने आया कि इंडियन प्रेस यूनियन की वेबसाइट पर इंटरव्यू, प्रेस कॉन्फ्रेंस और कार्यक्रमों की कुछ ऐसी तस्वीरें प्रदर्शित थीं, जो एआई से बनाई गई प्रतीत होती थीं. इन तस्वीरों के जरिए संगठन की स्थापित और सक्रिय मीडिया संस्था जैसी छवि पेश होती थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ लोगों ने स्थानीय मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए इस तरह की प्रेस पहचान का इस्तेमाल करने के अनुभव भी साझा किए थे, इनमें एक व्यक्ति ने 1,799 रुपये में पहचान खरीदने की बात कही.
सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज, लेकिन जवाबदेही किसकी?
इंडिया टुडे को ऐसे दर्जनों वीडियो मिले, जिनमें इंडियन प्रेस यूनियन से जुड़े लोग CJP Protest 2.0 के दौरान घटनास्थल से रिपोर्टिंग करते दिखाई दिए, उनके पास प्रेस कार्ड और माइक्रोफोन थे और वे खुद को पत्रकार के रूप में पेश करते हुए लोगों से सवाल कर रहे थे.
इनमें से कई वीडियो उनके निजी इंस्टाग्राम और यूट्यूब चैनलों पर पोस्ट किए गए थे और उन्हें लाखों व्यूज मिले थे. यही स्थिति चिंता बढ़ाती है, जब कोई सामग्री पत्रकारिता के रूप में पेश की जाती है, तो दर्शक उससे तथ्यात्मक जानकारी, निष्पक्षता और जवाबदेही की उम्मीद करते हैं, लेकिन अगर सामग्री तैयार करने वाले व्यक्ति या संगठन की पहचान, संपादकीय व्यवस्था और काम करने के तरीकों की जांच नहीं होती, तो गलत या भ्रामक जानकारी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है.
पत्रकारिता केवल कैमरा, माइक या प्रेस कार्ड रखने का नाम नहीं है, इसमें तथ्यों की पुष्टि, दोनों पक्षों को सुनना, निष्पक्षता बनाए रखना और प्रकाशित सामग्री के लिए जवाबदेह होना भी जरूरी है.
कब बनीं ये वेबसाइट्स?
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से कम से कम तीन वेबसाइट्स फरवरी और मार्च 2026 के बीच बनाई गई थीं. NEED24 की शुरुआत 2022 में हुई थी, जबकि FNF यानी फ्रंटमीडिया फेडरेशन 2024 में और इंडियन प्रेस यूनियन (IPU) 2025 में अस्तित्व में आई.
इंडियन प्रेस यूनियन अपनी वेबसाइट पर 2016 से काम करने का दावा करता है, लेकिन इंडिया टुडे की पड़ताल में इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई सबूत नहीं मिला. रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से कुछ संगठनों से जुड़े लोग जंतर-मंतर पर दिखाई दिए, जबकि अन्य वेबसाइट्स का पता इंडिया टुडे को प्रेस पहचान-पत्र बेचने वाली वेबसाइट्स की व्यापक पड़ताल के दौरान चला.
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी वेबसाइट का हाल में बनाया जाना अपने आप में धोखाधड़ी का सबूत नहीं है. इसी तरह, प्रेस कार्ड बेचना अपने आप में किसी व्यक्ति के फर्जी पत्रकार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है. सवाल यह है कि इन कार्डों को जारी करने के लिए क्या जांच की जाती है और इनका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है.
स्वतंत्र पत्रकारिता और फर्जी पहचान के बीच अंतर
पत्रकारिता के लिए किसी बड़े मीडिया संस्थान से जुड़ा होना हमेशा जरूरी नहीं है, स्वतंत्र पत्रकार और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने ला सकते हैं, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता और बिना सत्यापन के पत्रकार होने का दावा करने के बीच स्पष्ट अंतर है. मुख्य सवाल यह है कि इन वेबसाइट्स पर प्रेस पहचान-पत्र जारी करने से पहले आवेदकों की क्या जांच की जाती है? क्या उनके पत्रकारिता के अनुभव, संस्थान या प्रकाशित रिपोर्टों का सत्यापन होता है? अगर कोई व्यक्ति इन पहचान-पत्रों का गलत इस्तेमाल करता है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
बिदिशा साहा / आकाश शर्मा