BRICS समिट में भारत की 5 बड़ी कूटनीतिक जीत, PM मोदी ने कैसे साधा संतुलन?

ब्रिक्स समिट में नई दिल्ली घोषणा पत्र पर सहमति बनी और भारत ने पहलगाम हमले की निंदा तसे ईरान-यूएई मुलाकात जैसे नतीजे दर्ज कराए. युद्ध, व्यापारिक तनाव और बड़े मतभेदों के बीच भारत ने ब्रिक्स को खुला पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोका और वैश्विक दक्षिण के मुद्दों पर फोकस बनाए रखा.

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प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में भारत ने दो दिवसीय ब्रिक्स समिट का आयोज किया गया. (Photo- PTI) प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में भारत ने दो दिवसीय ब्रिक्स समिट का आयोज किया गया. (Photo- PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:31 AM IST

भारत में 12 और 13 सितंबर को दो दिवसीय BRICS समिट का आयोजन हुआ. इस समिट में दुनिया के कई बड़े नेता शामिल हुए. भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे समय में BRICS को एकजुट रखना था, जब संगठन के सदस्य देश अलग-अलग जंग और बड़े भू-राजनीतिक मतभेदों से जूझ रहे हैं. रूस यूक्रेन के साथ जंग में है, जबकि ईरान भी अमेरिका और इजरायल के साथ जंग में उलझा है. पश्चिम एशिया के मुद्दे पर BRICS देशों की राय भी अलग-अलग रही है.

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इसके बावजूद नई दिल्ली में BRICS का साझा घोषणापत्र सर्वसम्मति से पास हुआ. भारत पहलगाम आतंकी हमले की सामूहिक निंदा कराने में भी कामयाब रहा. साथ ही BRICS को सीधे अमेरिका विरोधी मंच बनने से रोकते हुए ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर फोकस बनाए रखा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समिट के दौरान 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें भी कीं. आइए समझते हैं भारत की 5 बड़ी कूटनीतिक कामयाबी.

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1. ईरान-UAE को एक मंच पर लाया भारत

BRICS समिट के सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया की जंग थी. ईरान और UAE इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख रखते हैं. पहले भी पश्चिम एशिया को लेकर मतभेदों की वजह से BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में साझा बयान जारी नहीं हो पाया था.

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लेकिन नई दिल्ली में दोनों देश साझा घोषणापत्र पर साथ आए और पश्चिम एशिया में संयम बरतने की अपील का समर्थन किया. इसके बाद BRICS समिट से इतर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात भी हुई. यह जंग शुरू होने के बाद दोनों देशों के बीच सबसे उच्च स्तर की मुलाकात बताई गई. भारत ने अपने मंच को दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए इस्तेमाल किया.

2. BRICS में फिर बनी सहमति

भारत की दूसरी बड़ी कामयाबी BRICS को एक साझा घोषणापत्र तक पहुंचाना रही. विस्तार के बाद BRICS में अलग-अलग देशों के हित और राय शामिल हो गई हैं, जिससे आम सहमति बनाना मुश्किल हो गया है. इसके बावजूद नई दिल्ली समिट में साझा घोषणापत्र सर्वसम्मति से पास हुआ. इसमें ग्लोबल गवर्नेंस, विकास, ट्रेड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, AI, सप्लाई चेन और दूसरे मुद्दों पर सहयोग की बात कही गई. घोषणापत्र में भारत की BRICS अध्यक्षता की तारीफ भी की गई.

3. घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा

भारत के लिए सबसे अहम उपलब्धियों में से एक पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र रहा. साझा घोषणापत्र में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई. इसमें आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कही गई और आतंकियों, उन्हें समर्थन देने वालों और आतंकी गतिविधियों से जुड़े लोगों को कानून के तहत जवाबदेह ठहराने की बात कही गई.

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घोषणापत्र में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया, लेकिन पहलगाम हमले को सीधे आतंकी हमला बताया गया. चीन जैसे देश की मौजूदगी वाले मंच पर इस तरह की सामूहिक निंदा भारत के लिए अहम कूटनीतिक उपलब्धि रही.

4. BRICS को अमेरिका विरोधी मंच नहीं बनने दिया

भारत के सामने एक और बड़ी चुनौती BRICS को चीन और रूस के प्रभाव वाला अमेरिका विरोधी मंच बनने से रोकना था. रूस पर अमेरिका के कड़े प्रतिबंध हैं, जबकि चीन और अमेरिका के बीच भी ट्रेड और वैश्विक प्रभाव को लेकर मुकाबला है.

भारत ने BRICS के जरिए विकासशील देशों की आवाज को मजबूत किया, लेकिन इसे सीधे पश्चिम विरोधी मंच नहीं बनने दिया. साझा घोषणापत्र में UN और वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की ज्यादा भागीदारी और ज्यादा संतुलित वैश्विक व्यवस्था की बात की गई. साथ ही भारत ने ग्लोबल साउथ के मुद्दों को केंद्र में रखा.

5. अलग-अलग राय के बावजूद BRICS को भारत ने एकजुट रखा

भारत की सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि बेहद मुश्किल दौर में भी BRICS को एक साथ रखा गया. संगठन के देशों की राजनीतिक सोच, आर्थिक हित और दूसरे देशों के साथ रिश्ते अलग-अलग हैं. इसके ऊपर रूस-यूक्रेन और ईरान-अमेरिका-इजरायल की जंग का असर भी है.

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इसके बावजूद घोषणापत्र में पश्चिम एशिया पर संयम, बातचीत और कूटनीति की बात हुई, जबकि देशों के अलग-अलग राष्ट्रीय रुख को भी जगह दी गई. आर्थिक मुद्दों पर सप्लाई चेन, विकास, टेक्नोलॉजी और वित्त जैसे साझा हितों पर फोकस किया गया.

यानी भारत ने दिखाया कि अलग-अलग मतभेदों के बावजूद BRICS काम कर सकता है और ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर साझा रुख बनाया जा सकता है. अब अगली बड़ी चुनौती चीन के सामने होगी, क्योंकि 2027 में BRICS की अध्यक्षता चीन के पास होगी.

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