बारिश में चिता जल रही थी, ऊपर से तिरपाल ताने खड़े थे लोग... महाराष्ट्र के अंतिम संस्कार की कहानी

ये कहानी महाराष्ट्र के ठाणे के शाहपुर की आदिवासी बस्ती की है. यहां बारिश के बीच एक अंतिम संस्कार हो रहा था. लोग चारो तरफ तिरपाल पकड़े खड़े थे. दरअसल, उंभरई गांव में श्मशान भूमि नहीं है. यहां ग्राम पंचायत समिति की सदस्य जयाबाई महादू वाघ की मौत हो गई तो उनका अंतिम संस्कार खुले मैदान में करना पड़ा.

Advertisement
छाता- तिरपाल लगा कर बारिश में अंतिम संस्कार करने को मजबूर लोग. (Photo- Mithilesh Gupta/ ITG) छाता- तिरपाल लगा कर बारिश में अंतिम संस्कार करने को मजबूर लोग. (Photo- Mithilesh Gupta/ ITG)

मिथिलेश गुप्ता

  • ठाणे,
  • 12 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:43 AM IST

ठाणे के आदिवासी बस्ती शाहपुर में उंभरई गांव की एक तस्वीर सामने आई है. यहां ग्राम पंचायत समिति की सदस्य जयाबाई महादू वाघ की मौत हो गई थी. गांव में श्मशान नहीं होने की वजह से उनका अंतिम संस्कार खुले मैदान में करना पड़ा. मंगलवार को इलाके में तेज बारिश हो रही थी, उसी दौरान गांव के लोग तिरपाल तानकर अंतिम संस्कार कर रहे थे.

Advertisement

यहां ग्राम पंचायत समिति की सदस्य जयाबाई महादू वाघ की मौत बीमारी के चलते हो गई थी. उनका अंतिम संस्कार गांव के पास खुले मैदान में किया गया. इस दौरान अचानक तेज बारिश शुरू हो गई. बारिश के कारण चिता की आग बुझने लगी थी. ऐसे में ग्रामीण चिता के ऊपर तिरपाल पकड़कर खड़े हो गए, ताकि बारिश का पानी सीधे चिता पर न गिरे और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी हो सके.

गांव के लोगों का आरोप है कि उंभरई की आदिवासी बस्ती में आज भी श्मशानभूमि नहीं है. इसके लिए पिछले करीब दो साल से प्रशासन से लगातार मांग की जा रही है. ग्रामीणों के मुताबिक, करीब दो साल पहले शाहपुर के तत्कालीन तहसीलदार परमेश्वर कालूसे ने भी गांव में श्मशान के लिए भी जगह देखी थी. उस समय जल्द श्मशान बनाने की बात कही गई थी, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक अब तक इस समस्या का कोई समाधान नहीं हो पाया है.

Advertisement

यह भी पढ़ें: पिता की मौत के बाद भी नहीं पहुंचे तीन बेटे-बेटियां, वृद्धाश्रम संचालिका से बोले- आप ही अंतिम संस्कार कर दो

करीब 100 लोगों की आबादी वाली इस आदिवासी बस्ती के लोगों को आज भी अपने परिजनों का अंतिम संस्कार खुले मैदान में करना पड़ता है. बारिश के मौसम में परेशानी और बढ़ जाती है. कीचड़ और बारिश के बीच अंतिम संस्कार करना ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन  जाता है.

शाहपुर के 250 से ज्यादा गांवों में ऐसी ही समस्या

ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों के लोगों का कहना है कि शाहपुर तालुका के 250 से ज्यादा गांवों में श्मशान भूमि से जुड़ी समस्या बनी हुई है. कहीं श्मशान के लिए जमीन नहीं है. कहीं बजट का अभाव है. शाहपुर तालुका में 110 ग्राम पंचायतें, 227 राजस्व गांव और अन्य 414 ग्रामीण बस्तियां हैं. दूरदराज के कई इलाकों में आज भी सड़कें नहीं हैं. बरसात के दिनों में ग्रामीणों को नाले और नदी पार करके शवों को अंतिम संस्कार के लिए ले जाना पड़ता है.

एक तरफ शाहपुर में करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की बातें होती हैं, वहीं दूसरी ओर कई आदिवासी बस्तियां सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और श्मशान जैसी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं. जयाबाई महादू वाघ के अंतिम संस्कार की तस्वीर प्रशासन और नेताओं के सामने गंभीर सवाल खड़े करती है. ग्रामीणों की मांग है कि श्मशान के साथ सड़क और अन्य सुविधाओं की समस्या का भी जल्द समाधान किया जाए.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »