मध्य प्रदेश में अब मंत्रियों के विभागों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी चल रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से इस संबंध में निर्देश मांगे हैं.
चौहान ने 1 जुलाई को ट्वीट में लिखा था- “जब समुद्र में मंथन होता है तो शिव पूरा ज़हर निगल जाते हैं.” ये ट्वीट शिवराज मंत्रिमंडल के बहुप्रतीक्षित विस्तार से एक दिन पहले आया था. इस ट्वीट में चौहान की मजबूरी दिखती थी कि उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया की मांगों के आगे समझौता करना पड़ा है. मंत्रिमंडल के विस्तार के चार दिन बाद भी 28 नए मंत्रियों को विभागों का बंटवारा नहीं हो पाना भी चौहान की इसी दुविधा को दिखाता है. ये उस रस्साकशी को भी खुल कर दिखाता है जो मूल बीजेपी और कांग्रेस से दलबदल कर आने वालों के बीच हो रही है.
बीजेपी के टॉप सूत्रों के मुताबिक चौहान अपने भरोसेमंद सहयोगियों के लिए गृह, स्वास्थ्य, वित्त, जल संसाधन, परिवहन और जनसंपर्क जैसे विभाग रखने के इच्छुक हैं. वहीं सिंधिया इनमें से कई विभाग अपने विश्वासपात्रों को दिए जाने के लिए जोर लगा रहे हैं.
सिंधिया के लोगों के पास पिछली कमलनाथ सरकार के दौरान स्वास्थ्य, परिवहन, महिला और बाल विकास और स्कूली शिक्षा के पोर्टफोलियो थे. समझा जाता है कि सिंधिया ने इन सभी विभागों को भी अपने वफादारों को दिए जाने की मांग की है.
चौहान ने अपनी सरकार बनने के बाद बीजेपी के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा को अलॉट कर रखा है. इसके अलावा चौहान के साथ गोपाल भार्गव और विजय शाह जैसे कई वरिष्ठ नेता हैं जिन्हें अहम मंत्रालय सौंपे जाने हैं.
भाजपा के टॉप सूत्रों के अनुसार इस मुद्दे पर दिल्ली में मंथन चल रहा है. चौहान रविवार को पार्टी के शीर्ष नेताओं से मिलने के लिए दिल्ली में थे, और आगे का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे थे.
समझा जाता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने चौहान को सिंधिया के महत्व के बारे में बताया. सिंधिया का न केवल कमलनाथ सरकार को गिराने और चौहान की सरकार को बनवाने में हाथ रहा बल्कि उन्हें भविष्य में मध्य प्रदेश की राजनीति और बीजेपी में संभवत: भूमिका निभानी है.
जिन 22 विद्रोहियों ने कमलनाथ सरकार को गिराने के लिए विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी, वो अब दोबारा चुनाव लड़ने के लिए उतरना चाहते हैं और सिंधिया ऐसे नेता नहीं, जिनकी स्थिति कमजोर हो और बीजेपी में अपनी बात न रख सकें.
उधर, विपक्षी कांग्रेस चौहान पर तंज कर रही है, “मंत्रियों के बाद, अब पोर्टफोलियो भी दिल्ली में तय किए जा रहे हैं. श्रीअंत के साथ सहयात्री बनना आसान नहीं होगा.”
हेमेंद्र शर्मा