साल 2016 की वो गर्मियां कश्मीर के शोपियां जिले के लिए अपने साथ एक कभी न भूलने वाला अंधेरा लेकर आई थीं. 2016 में महज 14 साल की उस बच्ची की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई. उस समय सिर्फ 14 साल की रहीं इंशा मुश्ताक आज भी उस खौफनाक मंजर को याद कर सिहर उठती हैं. उस मनहूस शाम ने उनकी हंसती-खेलती जिंदगी को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया. 'इंडिया टुडे' से एक खास बातचीत में इंशा ने अपनी आपबीती सुनाई. उन्होंने सरकार से मांग की है कि पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए, क्योंकि यह किसी भी आम हथियार जितनी ही जानलेवा है.
बात साल 2016 की है. हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद पूरे कश्मीर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे थे. इलाके में हालात बेहद तनावपूर्ण थे. शोपियां में भी माहौल बिगड़ा हुआ था. 14 साल की इंशा अपने घर के अंदर थीं. बाहर मचे बवाल को देखते ही जैसे ही वह अपने कमरे की खिड़की बंद करने के लिए आगे बढ़ीं, तभी सुरक्षाबलों की तरफ से चलाई गई पैलेट गन के सैकड़ों नुकीले छर्रे उनकी खिड़की को चीरते हुए उनके चेहरे, आंखों और शरीर में जा घुसे.
इस हादसे में इंशा की दोनों आंखों की रोशनी हमेशा-हमेशा के लिए चली गई. हादसे के 10 साल बीत चुके हैं. लेकिन तब से लेकर आज तक, उनकी जिंदगी एक रोजाना का संघर्ष बन चुकी है. इंशा कहती हैं, ' जो दर्द आज देश के दूसरे हिस्सों में लोग महसूस कर रहे हैं, वैसा ही खौफनाक मंजर कश्मीर बहुत पहले देख चुका है. फर्क बस इतना सा है कि उस वक्त किसी ने हमारे हक में आवाज नहीं उठाई.
दरअसल, भीड़ को काबू करने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल कोई नया नहीं है. साल 2010 की शुरुआत में घाटी में हिंसक प्रदर्शनों को रोकने और सीधे तौर पर गोलियां चलाने के विकल्प के तौर पर उमर अब्दुल्ला की सरकार के दौरान पहली बार पैलेट गन को भीड़ नियंत्रण के हथियार के तौर पर शामिल किया गया था. 2016 के दौरान जब इंशा इस हादसे का शिकार हुईं, तब राज्य में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मुफ्ती और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार सत्ता में थी. इसी दौरान कश्नमीर के कई हिस्सों में इस हथियार का सबसे ज्यादा इस्तेमाल देखने को मिला.
पैलेट गन से 2010 से 2019 के बीच 6 हजार लोग हुए घायल
सरकारी और आधिकारिक आंकड़ें इस बात का गवाह है कि कश्मीर में बड़े स्तर पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया. 2010 से 2019 के बीच कश्मीर में कानून-व्यवस्था की हर बड़ी स्थिति में पैलेट गन प्रशासन ने उपयोग किया। इसका नतीजा बेहद दर्दनाक रहा. इस दौरान तकरीबन 6 हजार से अधिक लोग इन छर्रों की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हुए. पैलेट गन के डॉयरेक्ट अटैक की वजह से कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई.* सैकड़ों युवाओं और बच्चों की आंखों में छर्रे लगने के कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई. पैलेट गन के इस्तेमाल से कई लोगों की जिंदगियां हमेशा के लिए बर्बाद हो गईं. पैलेट गन की चपेट में आए लोग हमेशा के लिए बेबश हो गए.
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इन कहानियों को सुनकर एक सवाल जो मन में आता है, क्या वाकई पैलेट गन 'गैर-जानलेवा' है? दिल्ली के जंतर-मंतर में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की तरफ से छात्रों पर पैलेट गन चलाने के आरोप लगे हैं. प्रशासन का दावा है कि ये पैलेट गन गैर जानलेवा हैं. इसके इस्तेमाल का मकसद सिर्फ भीड़ को कंट्रोल करना हैं. वहीं जानकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि पैलेट गन को 'कम घातक' या 'गैर-जानलेवा' कहना जमीनी हकीकत से बिल्कुल अलग है. एक पैलेट गन के कारतूस से एक बार में सैकड़ों छोटे और नुकीले सीसे के छर्रे निकलते हैं, जो हवा में फैल जाते हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे सुरक्षित तरीके से चलाने के लिए कई नियमों का पालन करना होता है. इसके इस्तेमाल के दौरान प्रदर्शनकारियों से एक तय दूरी (कम से कम 20 मीटर) बनाए रखना और हमेशा कमर से नीचे निशाना लगाना होता है. लेकिन जब सामने हिंसक और तनावपूर्ण भीड़ हो, तो सुरक्षाबलों से इस तरह की सटीक निशाने की उम्मीद करना लगभग नामुमकिन के मुमकिन हो जाने जैसा है. यही वजह है कि छर्रे अक्सर लोगों के चेहरे, गर्दन और आंखों में लग जाते हैं.
इंशा मुश्ताक जैसी पीड़ितों की यह पुरजोर मांग अब मानवाधिकार संगठनों की उस वैश्विक मुहिम का हिस्सा बन चुकी है, जो मानती है कि जो हथियार किसी को हमेशा के लिए अंधा बना दे या अपाहिज कर दे, उसे भीड़ को तितर-बितर करने का जरिया नहीं बनाया जा सकता
मीर फरीद