जम्मू-कश्मीर को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के एक बयान पर सियासी विवाद शुरू हो गया है. गुलाम नबी आजाद ने उनके बयान को गलत बताते हुए कहा कि पाकिस्तान भारत और जम्मू-कश्मीर के लोगों का दुश्मन है. फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाकर यहां के लोगों की सुरक्षा कर रहा है. आजाद ने इस दावे को खारिज किया है.
गुलाम नबी आजाद ने कहा कि 'पाकिस्तान कभी जम्मू-कश्मीर के लोगों का शुभचिंतक नहीं हो सकता'. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि वह फारूक साहब का सम्मान करते हैं, लेकिन कश्मीर पर उनका बयान पूरी तरह गलत है. आजाद ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) का जिक्र करते हुए कहा कि वहां के लोग अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि 1947 से अब तक जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, अलग-अलग केंद्र सरकारों ने जम्मू-कश्मीर के विकास में योगदान दिया है.
दरअसल, यह विवाद फारूक अब्दुल्ला के बारामूला में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में दिए गए बयान के एक दिन बाद शुरू हुआ. उनके बयान पर बीजेपी समेत कई नेताओं ने भी आपत्ति जताई है.
फारूक अब्दुल्ला ने पाकिस्तान को लेकर क्या कहा था?
नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने शनिवार को उत्तरी कश्मीर के बारामूला में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में पाकिस्तान को लेकर बयान दिया था. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठा रहा है. उनके मुताबिक, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ दुनिया के अलग-अलग मंचों पर कहते हैं कि कश्मीर का विवाद अभी सुलझा नहीं है.
फारूख अब्दुल्ला ने दावा किया कि पाकिस्तान के इस रुख से जम्मू-कश्मीर के लोगों को सुरक्षा मिल रही है. उन्होंने केंद्र सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाए. साथ ही लोगों से अपने अधिकारों और पहचान की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील की.
बीजेपी ने कार्रवाई की मांग की
फारूक अब्दुल्ला के बयान पर बीजेपी ने कड़ी आपत्ति जताई. पार्टी के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई की मांग की. उनका आरोप था कि फारूक का बयान कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख को सही ठहराने जैसा है. वहीं, जम्मू-कश्मीर बीजेपी अध्यक्ष सत शर्मा ने भी फारूक अब्दुल्ला से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा. उन्होंने कहा कि भारत में मिली बोलने की आजादी के कारण ही फारूक इस तरह के बयान दे पा रहे हैं. बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रविंदर रैना ने भी बयान की आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान पिछले कई दशकों से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है.
इमरान अंसारी ने बताया 'किराए का विद्रोह'
शिया नेता और पूर्व मंत्री इमरान अंसारी ने भी फारूक अब्दुल्ला के बयान की आलोचना की. उन्होंने सोशल मीडिया पर कश्मीर के लोगों से अपील की कि वे फारूक की बातों का अनुसरण न करें.
अंसारी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं के विरोध को 'किराए का विद्रोह' बताया. उनका आरोप था कि कुछ नेताओं को सरकार के खिलाफ खुलकर बोलने की छूट है, जबकि आम कश्मीरी ऐसी बात कहे तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. उन्होंने PSA और UAPA जैसे कानूनों का भी जिक्र किया. इन कानूनों के तहत तय कानूनी प्रावधानों के अनुसार हिरासत या मुकदमे की कार्रवाई की जा सकती है.
अनुच्छेद 370 और कश्मीर का मुद्दा
पाकिस्तान लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है. अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटा दिया था. इसके बाद तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया. बीजेपी लगातार पाकिस्तान पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है. वहीं, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है.
बुलडोजर कार्रवाई पर भी फारूक ने उठाए सवाल
बारामूला में अपने संबोधन के दौरान फारूक अब्दुल्ला ने बीजेपी शासित राज्यों में मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों पर बुलडोजर चलाए जाने का भी मुद्दा उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिमों के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जा रहा है. उन्होंने समुदाय के लोगों से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील की.
वहीं, बीजेपी और उसकी सरकारों का कहना है कि बुलडोजर से अवैध निर्माण हटाए जाते हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि इस कार्रवाई में मुस्लिमों की संपत्तियों को खास तौर पर निशाना बनाया जाता है. फारूक अब्दुल्ला ने मीडिया के एक हिस्से पर भी सरकार के पक्ष में खबरें दिखाने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि सत्ता के दबाव और आर्थिक फायदे के कारण कुछ मीडिया संस्थान सरकार की आलोचना करने से बचते हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों पर पुलिस का दबाव बनाया जाता है..
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