जुलाई का महीना शुरू होते ही दिल्ली की सड़कों पर मानसून की पहली बारिश गिरी है. दो महीने पहले तक इसी दिल्ली में कई इलाकों में लोग पानी के संकट से परेशान हो रहे थे. मई-जून में 45 से 48 डिग्री की गर्मी में लोग सरकारी और प्राइवेट टैंकरों के पीछे बाल्टी और पाइप लेकर दौड़ रहे थे. लेकिन अब मंजर पूरी तरह बदल चुका है.
लाखों लीटर साफ और मीठा बारिश का पानी गंदे नालों से होते हुए यमुना में बह रहा है और शहर से बाहर चला जा रहा है. यह कोई नई बात नहीं है. हर साल यही होता है. न यह कोई मौसम का करिश्मा है और न कोई प्राकृतिक आपदा. यह दिल्ली के सिस्टम की एक बड़ी नाकामी है, जो सरकार, अफसरशाही और नगर निकायों की लापरवाही से पैदा हुई है. ये दशकों से हो रहा है, इसलिए वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए एक सुचारू सिस्टम तैयार नहीं हो पाया.
आखिर मामला क्या है?
दिल्ली का कुल क्षेत्रफल करीब 1,486 वर्ग किलोमीटर है. यहां हर साल औसतन 611 मिलीमीटर बारिश होती है. अगर इस पूरे पानी को सही तरीके से जमीन के अंदर उतारा जाए या स्टोर किया जाए, तो दिल्ली हर साल करीब 907 अरब लीटर पानी बचा सकती है. इतना पानी दिल्ली की पूरी आबादी की करीब 270 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है. हालांकि, 100 फीसदी बारिश का संरक्षण करना नामुमकिन है. लेकिन अगर 40-50 फीसदी भी कर लेते हैं तो दिल्लीवासियों के लिए काफी मददगार होगा.
लेकिन असलियत में इस पूरे पानी में से 5 फीसदी से भी कम पानी जमीन के अंदर जा पाता है. बाकी 95 फीसदी से ज्यादा पानी सड़कों पर बहकर नालों में मिल जाता है और बाढ़ जैसे हालात बना देता है.
दूसरी तरफ गर्मियों में हालत यह है कि इस साल मार्च से जून के बीच दिल्ली की पानी की मांग 1,200 मिलियन गैलन रोज तक पहुंच गई थी. लेकिन दिल्ली जल बोर्ड पूरी ताकत लगाकर भी मुश्किल से 930 से 950 मिलियन गैलन पानी ही रोज दे पा रहा था. यानी हर दिन करीब 250 मिलियन गैलन पानी की कमी बनी हुई थी.
एक और आंकड़ा समझने वाला है. अगर मानसून के दौरान सिर्फ एक दिन 100 मिलीमीटर अच्छी बारिश हो जाए और उस पूरे पानी को बचा लिया जाए, तो एक दिन में इतना पानी इकट्ठा हो सकता है जो दिल्ली की 14 दिन की पूरी पानी की जरूरत के बराबर है.
गलती कहां हो रही है?
इस पूरी समस्या की तीन बड़ी वजहें सामने आई हैं. पहली वजह है नियमों का मजाक बनना. दिल्ली में नियम है कि जो भी नया मकान या इमारत 100 वर्ग मीटर से बड़ी हो, वहां बारिश का पानी जमा करने का सिस्टम लगाना जरूरी है. लेकिन दिल्ली की करीब 17-18 लाख इमारतों में से मुश्किल से 1 से 2 फीसदी में ही यह सिस्टम चालू हालत में है.
ज्यादातर जगहों पर सिर्फ कागजों पर एक गड्ढा दिखाकर सर्टिफिकेट ले लिया जाता है और बाद में उस गड्ढे को मिट्टी से भरकर वहां पार्किंग बना दी जाती है. इसकी जांच करने का कोई ठोस तरीका ही नहीं है.
दूसरी वजह है सरकार का अपना ही इंतजाम बेकार पड़ा होना. सरकारी स्कूलों, फ्लाईओवर, मेट्रो स्टेशन जैसी जगहों पर बने पानी जमा करने के सिस्टम खुद खराब हालत में हैं. बारिश से पहले इनकी सफाई होनी चाहिए, लेकिन हर साल की तरह इस साल भी 60 फीसदी से ज्यादा जगहों पर यह सफाई नहीं हुई. नतीजा यह हुआ कि पहली ही बारिश में मिट्टी ने इन गड्ढों को बंद कर दिया और पानी जमीन में जाने के बजाय सड़कों पर बहने लगा.
तीसरी वजह है कि दिल्ली में पानी के लिए कोई एक जिम्मेदार संस्था नहीं है. दिल्ली जल बोर्ड पानी सप्लाई करता है और बिल भेजता है. एमसीडी छोटे नाले साफ करती है. पीडब्ल्यूडी बड़ी सड़कों के नाले देखता है. डीडीए बड़े डिस्ट्रिक्ट पार्कों और खाली जमीन का मालिक है. जब भी बारिश में पानी भरता है, तो हर विभाग दूसरे पर दोष मढ़ देता है और असली मुद्दा कहीं खो जाता है.
सरकारी रिपोर्टों में क्या सामने आया?
देश की सबसे बड़ी सरकारी ऑडिट संस्था कैग की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है. इसके मुताबिक दिल्ली में जितना पानी ट्रीट किया जाता है, उसमें से 51 से 53 फीसदी पानी लीकेज, चोरी और खराब पाइपलाइन की वजह से लोगों तक पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाता है. जबकि नुकसान 15 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. कैग ने यह भी कहा कि दिल्ली जल बोर्ड के पास आने वाले सालों के लिए कोई ठोस पानी की योजना ही नहीं है.
सीमेंट की वजह से भी बढ़ी दिक्कत
दिल्ली में एक और बड़ी समस्या है शहर का हर तरफ सीमेंट और कंक्रीट से भर जाना. जब बारिश का पानी मिट्टी पर गिरता है, तो उसका करीब आधा हिस्सा जमीन के अंदर चला जाता है. लेकिन जब वही पानी सीमेंट या टाइल वाली सड़कों पर गिरता है, तो उसका 90 फीसदी हिस्सा बिना रुके सीधे आगे बह जाता है. दिल्ली के पार्क, फुटपाथ और गलियां लगभग पूरी तरह टाइल और सीमेंट से भर दी गई हैं, जिससे पानी को जमीन में जाने का कोई रास्ता ही नहीं बचा है.
सरकार क्या कर रही है?
दिल्ली सरकार ने कुछ बड़े प्रोजेक्ट जरूर शुरू किए हैं. पुश्ता रोड और यमुना के किनारे बड़े तालाब बनाए गए हैं ताकि बारिश का पानी वहां रुके और जमीन में जाए. इसके अलावा भलस्वा, संजय झील जैसे करीब 250 पुराने तालाबों को फिर से जिंदा करने का काम भी शुरू हुआ है.
लेकिन इसमें एक बड़ी कमी है. यह सारे काम शहर से दूर बड़ी सरकारी जमीनों पर हो रहे हैं, जबकि दिल्ली की असली आबादी संगम विहार, पटेल नगर, उत्तम नगर, करोल बाग जैसे इलाकों में रहती है, जहां छोटे स्तर पर कोई काम नहीं हो रहा.
यमुना किनारे पानी भरने से करोल बाग का जमीनी पानी ऊपर नहीं आएगा. जब तक हर मोहल्ले का पानी उसी मोहल्ले में नहीं रोका जाएगा, तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी.
अब क्या किया जाना चाहिए?
एक ऐसी संस्था बनानी चाहिए जो सिर्फ पानी के मामलों की पूरी जिम्मेदारी ले, ताकि अलग-अलग विभागों के बीच दोषारोपण खत्म हो. हर बड़ी इमारत के पानी जमा करने वाले सिस्टम की जांच मैन्युअल फिजिकल ऑडिट, फ्लो-मीटर और डिजिटल वॉटर-मीटर चेकिंग के जरिए होनी चाहिए, न कि सिर्फ कागजों पर.
हर मोहल्ले के पार्क में छोटे स्तर पर पानी जमा करने के गड्ढे बनाए जाने चाहिए ताकि उसी इलाके का पानी उसी इलाके में वापस जमीन में जाए. साथ ही नई सड़कों और फुटपाथों में ऐसी टाइल और ब्लॉक इस्तेमाल होने चाहिए जिनसे पानी जमीन के अंदर जा सके.
प्राइवेट टैंकर का कारोबार
दिल्ली में पानी की सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा प्राइवेट टैंकरों से आता है, लेकिन इसका सही आंकड़ा किसी के पास नहीं है. दिल्ली जल बोर्ड सिर्फ अपने टैंकरों का हिसाब देता है. प्राइवेट टैंकर वाले ग्राउंडवॉटर बोरवेल, यमुना के पानी और कई बार जल बोर्ड की सप्लाई से चोरी करके पानी निकालते हैं.
इस पूरे कारोबार में एक अंधेरा पहलू भी है. जल बोर्ड के बोरवेल से चोरी, पुलिस को घूस देना और बिना परमिशन के बोरवेल चलाना आम शिकायतें हैं. लोग सरकारी टैंकर का दिनों तक इंतजार करने के बजाय महंगा प्राइवेट पानी खरीदना ज्यादा आसान समझते हैं, यही वजह है कि यह धंधा और फलता-फूलता जा रहा है.
अनुराग कश्यप