6 सितंबर को जर्मनी में एक ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम हुआ, जिसका असर आने वाले समय में सिर्फ जर्मनी की राजनीति पर ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप की राजनीति पर भी पड़ सकता है. धुर-दक्षिणपंथी पार्टी 'अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' यानी AFD खासकर पूर्वी जर्मनी के राज्यों में तेजी से मजबूत हुई है. हालिया सैक्सोनी-अनहाल्ट चुनाव में 2013 में बनी AFD को करीब 43.8 प्रतिशत वोट मिले. इसके साथ ही वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई और स्टेट असेंबली की 83 में से 39 सीटें जीत लीं. यह पिछले चुनाव के मुकाबले 16 सीटें ज्यादा हैं.
यह नतीजा उस जर्मनी में आया है, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध और नाजी शासन की भयावहता के बाद अपने अतीत की गलतियों को दोहराने से बचने को अपनी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाया. इसी सोच के साथ ‘नी वीदर’ यानी ‘फिर कभी नहीं’ जर्मनी की राजनीतिक और सामाजिक सोच का हिस्सा बना. 1949 में बने उसके संविधान यानी ‘बेसिक लॉ’ में मानव गरिमा, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और कानून के शासन को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया. करीब आठ दशकों तक जर्मनी की राजनीति पर इस इतिहास का असर रहा, लेकिन अब AFD के बढ़ते समर्थन ने देश की राजनीति की दिशा और उसके असर को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
इस नतीजे को सिर्फ जर्मनी की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं देखा गया. इसे यूरोप की बदलती राजनीतिक दिशा के संकेत के तौर पर भी देखा गया. जर्मन चांसलर ने इसे अपनी पार्टी CDU के लिए बड़ा झटका बताया और नतीजों पर गहरे सदमे की बात कही. फ्रांस के मंत्री रोलैंड लेस्क्योर ने इसे यूरोपीय एकता और बढ़ती राष्ट्रीयता के लिहाज से गंभीर पल बताया, जबकि पोलैंड के विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की ने इसे बहुत बुरा संकेत कहा. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उद्योगपति एलॉन मस्क ने भी सोशल मीडिया पर इस जीत से जुड़े रुझानों को साझा कर प्रतिक्रिया दी. रूस के कारोबारी हलकों ने भी इस नतीजे को जर्मन सरकार की नाकामी के रूप में देखा.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जर्मनी में AFD को इतनी बड़ी राजनीतिक जगह क्यों मिल रही है? क्या इसके पीछे सिर्फ राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथ है या आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक असंतोष भी इसकी वजह है? साथ ही यह सवाल भी अहम है कि इस बढ़ते दक्षिणपंथ का जर्मनी और यूरोप पर क्या असर हो सकता है और क्या इसे नाजी विचारधारा की वापसी का प्रीकर्सर माना जा सकता है?
पूर्वी जर्मनी का आर्थिक पिछड़ापन बना बड़ी वजह
JNU के यूरोपीय अध्ययन केंद्र से PhD कर चुके डॉ. मनीष बर्मा के मुताबिक "AFD के उभार की सबसे बड़ी वजहों में पूर्वी जर्मनी का आर्थिक पिछड़ापन शामिल है. जर्मनी के रियूनिफिकेशन के बाद पूर्वी जर्मनी में सोवियत दौर की कई सरकारी फैक्ट्रियां बंद हो गईं. इन उद्योगों से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता था. फैक्ट्रियां बंद होने के बाद बड़े स्तर पर डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन हुआ और इसका सीधा असर लोगों की आय और आर्थिक सुरक्षा पर पड़ा. वहीं पश्चिमी और दक्षिणी जर्मनी के अपेक्षाकृत अमीर इलाकों में इसका असर कम रहा. यही आर्थिक अंतर और उससे पैदा हुआ असंतोष AFD के मजबूत होने की एक बड़ी वजह है."
आर्थिक अंतर के साथ एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी जुड़ा हुआ है. पूर्वी जर्मनी के लोगों में लंबे समय से यह भावना रही है कि वे देश के बाकी हिस्सों की तुलना में पिछड़े हुए हैं और मुख्यधारा के जर्मन समाज में उन्हें बराबर जगह नहीं मिलती. वहां के लोगों को लगता है कि देश के बड़े फैसले ऐसे आर्थिक और राजनीतिक लोगों के हाथ में हैं, जिनके पास ज्यादा पैसा और प्रभाव है, जबकि उनकी आवाज उतनी नहीं सुनी जाती.
इसके साथ इमिग्रेशन को लेकर असंतोष भी एक अहम वजह है. यूरोप की कुछ मुख्यधारा की पार्टियां लंबे समय से अपेक्षाकृत खुले इमिग्रेशन का समर्थन करती रही हैं. जर्मनी में 2015 में एंजेला मर्केल की सरकार की शरणार्थी नीति के तहत बड़ी संख्या में इमिग्रेंट्स आए. ये लोग सिर्फ बड़े और अमीर शहरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूर्वी जर्मनी के अपेक्षाकृत कमजोर इलाकों में भी पहुंचे. जिन क्षेत्रों में पहले से ही उद्योग, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक सुविधाओं की कमी थी, वहां इमिग्रेशन को लेकर असंतोष ज्यादा बढ़ा. AfD ने इसी असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश की.
पूर्वी जर्मनी की एक और बड़ी समस्या युवाओं का पश्चिमी जर्मनी की ओर जाना है. खासकर अपेक्षाकृत संपन्न परिवारों के युवा बेहतर भविष्य की तलाश में पश्चिमी जर्मनी की ओर जा रहे हैं. इसका असर पूर्वी जर्मनी के गांवों और छोटे इलाकों पर पड़ रहा है. कई जगह आबादी कम हो रही है, जिससे सामाजिक और जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो रहा है. इसका असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है और यह असंतोष बढ़ाने वाली एक और वजह बनता है.
AFD के उभार को समझने के लिए यह भी देखना जरूरी है कि उसका समर्थन सिर्फ उसके पारंपरिक या कट्टर समर्थकों तक सीमित नहीं रहा. ऐसे मतदाता भी AFD की ओर गए, जो पहले SPD और CDU जैसी मुख्यधारा की पार्टियों का समर्थन करते थे. यानी AFD को मिलने वाला समर्थन सिर्फ राष्ट्रवादी वोट तक सीमित नहीं है. मुख्यधारा की पार्टियों से निराश मतदाताओं का एक हिस्सा भी उसकी ओर गया है. इस तरह पार्टी के उभार के पीछे आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक असंतोष एक साथ काम करते दिखाई देते हैं.
दक्षिणपंथ के उभार के पीछे सिर्फ राष्ट्रवाद नहीं
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज केंद्र के एसोसिएट प्रोफेसर रवि रामेशचंद्र शुक्ला के मुताबिक "मौजूदा बदलाव को सिर्फ राइट विंग के उभार के तौर पर देखना सही नहीं होगा. राष्ट्रवाद कोई नई चीज नहीं है. हर समाज में अपने देश और मातृभूमि के प्रति प्रेम की भावना पहले से मौजूद रहती है. आज जो बदलाव दिखाई दे रहा है, उसके पीछे उन विचारों से लोगों का मोहभंग भी है, जिन्होंने उन्हें बेहतर दुनिया का सपना दिखाया था. इनमें एक सपना मार्क्सवाद और कम्युनिज्म ने दिखाया था और दूसरा वैश्वीकरण के साथ आया उदारवादी आर्थिक मॉडल था."
मार्क्सवाद और कम्युनिज्म ने दुनिया को समानता, शोषण से मुक्ति और अभाव खत्म होने का सपना दिखाया था. इसके तहत राष्ट्र और सीमाओं की जरूरत खत्म होने की बात भी कही गई. लेकिन जिन देशों में यह मॉडल सत्ता में आया, वहां यह अपने बताए गए लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया. इससे लोगों का इस विचारधारा से मोहभंग हुआ. आज सूचना के दौर में लोगों के पास अलग-अलग देशों की स्थिति जानने और किए गए दावों को खुद जांचने के साधन हैं. इसलिए पुराने वैचारिक दावों को पहले की तरह आसानी से स्वीकार करना संभव नहीं रहा.
इसी तरह वैश्वीकरण के साथ आए उदारवादी आर्थिक मॉडल पर भी सवाल उठे. लोगों से कहा गया था कि बाजार खुलने से नौकरियां बढ़ेंगी, चीजें सस्ती होंगी और आर्थिक समृद्धि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी. लेकिन करीब तीन दशक बाद भी इसका फायदा सभी लोगों तक बराबर नहीं पहुंच पाया. वैश्वीकरण के दौरान स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा, छोटे दुकानदार और बुनकर जैसे वर्ग मुश्किल में आए और सार्वजनिक क्षेत्र का आकार भी घटा. इससे लोगों के एक हिस्से में उदारवादी आर्थिक व्यवस्था को लेकर असंतोष पैदा हुआ.
इन दोनों अनुभवों के बाद लोगों ने अपनी ‘मूल चेतना’ और ‘मूल संस्कृति’ की तरफ फिर से देखना शुरू किया है. यूरोसेंट्रिज्म के कमजोर होने और ग्लोबलाइजेशन के रिवर्सल की बात भी इसी संदर्भ में हो रही है. अमेरिका में ‘America First’ और डोनाल्ड ट्रंप के ‘Make America Great Again’ जैसे नारों को भी इसी भावना से जोड़ा जाता है. इसे सिर्फ राइट विंग की राजनीति कह देना इस बदलाव को समझने के लिए बहुत सीमित नजरिया होगा. इसमें अपने समाज और संस्कृति से जुड़ी जनभावना का भी उभार दिखाई देता है.
इसी बड़े बदलाव के संदर्भ में जर्मनी में AFD की बढ़ती ताकत को देखा जा रहा है. करीब 80 वर्ष बाद जर्मनी में इस तरह की पार्टी की इतनी जोरदार वापसी समाज में एक साफ राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा करती है. राइट का उभार सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में इसका असर दिखाई दे रहा है. माइग्रेशन, आर्थिक असंतोष और सांस्कृतिक-सामाजिक सवालों ने कई देशों में लोगों के बीच असंतोष पैदा किया है और इसी वजह से ऐसी पार्टियों के लिए राजनीतिक समर्थन बढ़ा है.
राष्ट्रवाद कब बन सकता है खतरे का कारण?
रवि रामेशचंद्र शुक्ला के मुताबिक राष्ट्रवादी सरकारों के मजबूत होने का मतलब अपने आप वैश्विक संघर्ष पैदा होना नहीं है. राज्य और सरकार बनने के बाद से ही उनका मूल काम अपनी जनता को व्यवस्था देना और अपनी सीमाओं की रक्षा करना रहा है. इसलिए अगर कोई सरकार अपने देश के हितों और अपनी जनता को प्राथमिकता देती है, तो इसे अपने आप टकराव का कारण नहीं माना जा सकता.
किसी भी विचारधारा या सरकार का नुकसानदायक होना उसके राइट विंग या लेफ्ट विंग होने से तय नहीं होता. नुकसान तब होता है जब सरकार निरंकुश हो जाए, जनता के अधिकारों की रक्षा न करे, आर्थिक समस्याओं को ठीक से न संभाले या वैश्विक परिस्थितियों से निपटने में विफल रहे. जिस तरह निरंकुश वामपंथी सरकारों का पतन हुआ और उदारवादी सरकारें भी निरंकुश होने पर कमजोर हुईं, उसी तरह सांस्कृतिक और सभ्यतागत मूल्यों पर राजनीति करने वाली सरकारों का भी पतन हो सकता है, अगर वे जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रहें.
AFD की बढ़ती ताकत और यूरोप की राजनीति
AFD का गठन 2013 में हुआ था और पिछले एक दशक से ज्यादा समय से यह पार्टी जर्मनी में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है. 6 सितंबर को सैक्सोनी-आनहाल्ट में हुए चुनाव में पार्टी को करीब 43.8 प्रतिशत वोट मिले और उसने 39 सीटें जीतीं, जो पिछले चुनाव की तुलना में 16 सीटें ज्यादा हैं. इस चुनाव में उलरिश जिगमुंड ने पार्टी के लिए प्रचार किया. जर्मनी की पत्रिका Der Spiegel ने उन्हें जर्मनी के सबसे खतरनाक लोगों में बताया है.
AFD फिलहाल जर्मनी की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन 16 राज्यों में से किसी भी राज्य में वह अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है. सैक्सोनी-आनहाल्ट में भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है. इसके बाद 20 सितंबर को मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमर्न में भी राज्य चुनाव होने हैं.
AFD के समर्थकों का बड़ा आधार पूर्वी जर्मनी के राज्यों में है. सैक्सोनी-आनहाल्ट, सैक्सोनी, ब्रांडेनबर्ग समेत करीब चार-पांच पूर्वी राज्य शीत युद्ध के दौरान सोवियत रूस के प्रभाव वाले पूर्वी जर्मनी का हिस्सा थे. 1990 में जर्मनी के पुनर्एकीकरण के बाद ये राज्य पश्चिमी जर्मनी में शामिल हुए.
पार्टी की प्रमुख नीतियों में रिमाइग्रेशन शामिल है. पार्टी की नेता एलिस वाइडल ने रिमाइग्रेशन की बात कही है. जर्मनी में लंबे समय से माइग्रेशन होता रहा है और 2015 के शरणार्थी संकट के दौरान जर्मनी में बड़ी संख्या में शरण के आवेदन आए थे. उस समय एंजेला मर्केल की सरकार ने मानवीय आधार पर शरणार्थियों और प्रवासियों का समर्थन किया था. रिमाइग्रेशन को लेकर यह भी कहा गया है कि इसका असर जर्मनी की सेवाओं पर पड़ सकता है. अस्पताल, नर्सिंग और दूसरी कई सेवाओं में प्रवासी लोगों का योगदान है.
AFD असाइलम नियमों को भी सख्त करने की बात करती है. पार्टी का कहना है कि जर्मनी में शरण और नागरिकता देने के नियम आसान कर दिए गए हैं और इन्हें सख्त किया जाना चाहिए. अगर भविष्य में AfD जर्मनी में सरकार बनाती है तो उसकी नीतियों का असर सिर्फ जर्मनी तक सीमित रहने का सवाल नहीं है. जर्मनी यूरोपीय संघ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यूरोप की दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों पर भी इसका असर पड़ सकता है.
रूस-यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा नीति
रूस-यूक्रेन युद्ध भी AFD की राजनीति का एक बड़ा मुद्दा है. जर्मनी और NATO यूक्रेन का समर्थन कर रहे हैं, जबकि AFD यूक्रेन में जर्मन या NATO सैनिकों की तैनाती के खिलाफ है. पार्टी का कहना है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत होनी चाहिए और बातचीत के जरिए समाधान की कोशिश करनी चाहिए. AFD यूक्रेन को जर्मन सरकार की ओर से दी जा रही मदद को भी बंद करने की बात करती है.
विदेश नीति के स्तर पर AFD रूस के साथ बेहतर संबंध चाहती है. ऊर्जा के मामले में भी पार्टी रूस के साथ संबंध बेहतर करने और वहां से गैस की आपूर्ति को लेकर बातचीत की बात करती है. ये रुख जर्मनी की पिछली सरकारों की नीतियों से अलग राजनीतिक दिशा को सामने रखते हैं.
नाजी अतीत, ऐतिहासिक स्मृति और AFD
AFD की राजनीति का एक महत्वपूर्ण मुद्दा जर्मनी का इतिहास और नाजी दौर की याद भी है. अनिश अग्निहोत्री, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के सेंटर फॉर यूरोपियन स्टडीज में पीएचडी स्कॉलर, के मुताबिक दूसरे विश्व युद्ध और होलोकॉस्ट के बाद जर्मनी की सरकारों ने नाजी दौर और होलोकॉस्ट की याद को बनाए रखने पर जोर दिया. इसका मकसद आने वाली पीढ़ियों को जर्मनी के इतिहास के बारे में बताना और यह सुनिश्चित करना था कि ऐसी घटना दोबारा न हो.
1990 में जर्मनी के रियूनिफिकेशन के बाद होलोकॉस्ट की स्मृति को संस्थागत रूप देने पर भी जोर दिया गया. बर्लिन के बीचों-बीच मारे गए यूरोप के यहूदियों के लिए एक स्मारक बनाया गया, जिसे 2005 में जनता के लिए खोला गया. वहीं AFD का कहना है कि जर्मनी का इतिहास सिर्फ नाजी जर्मनी के दौर तक सीमित नहीं है. पार्टी का तर्क है कि जर्मनी का इतिहास काफी लंबा है और 10-15 साल के नाजी दौर के आधार पर पूरी जर्मन हिस्ट्री को नहीं देखा जाना चाहिए.
यह बहस 1980 के दशक में जर्मनी में हुई Historikerstreit यानी इतिहास को लेकर हुए विवाद से भी जुड़ती है. उस समय जर्मनी की राष्ट्रीय पहचान और होलोकॉस्ट की जिम्मेदारी को लेकर बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों के बीच बहस हुई थी. AfD का कहना है कि जर्मनों को हमेशा अपराधबोध में रहने के बजाय अपनी जर्मन पहचान पर गर्व करना चाहिए और पूरे जर्मन इतिहास को सिर्फ नाजी दौर के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए. पार्टी के नेताओं ने बर्लिन स्थित होलोकॉस्ट स्मारक को भी ‘स्मारक ऑफ शेम’ कहा था.
क्या AFD नाजी विचारधारा की वापसी का प्रीकर्सर है?
AFD की नीतियों और नाजी जर्मनी के दौर के बीच तुलना को लेकर सवाल उठते हैं. हालांकि, अनिश अग्निहोत्री के अनुसार "यह कहना अभी सही नहीं होगा कि भविष्य में जर्मनी में हिटलर के दौर जैसी कोई घटना दोबारा होगी. आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में इस तरह की भविष्यवाणी करना सही नहीं होगा. AFD खुद नाजी दौर से किसी तरह का संबंध नहीं मानती और कहती है कि उसका उससे कोई संबंध नहीं है."
हालांकि, पार्टी की नीतियां जर्मनी की पिछली सरकारों की कई नीतियों से अलग हैं. माइग्रेशन, असाइलम, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा नीति और जर्मनी के इतिहास को देखने के तरीके को लेकर AFD का रुख अलग है. AFD को मिल रहा समर्थन कई कारणों से जुड़ा हुआ बताया जाता है. इनमें शरणार्थी संकट, माइग्रेशन, सरकार की आर्थिक और विदेश नीति से जुड़ी समस्याएं और पूर्वी जर्मनी में पार्टी का बढ़ता आधार शामिल हैं.
यही वजह है कि AFD के बढ़ते राजनीतिक आधार को सिर्फ दक्षिणपंथ या राष्ट्रवाद के एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता. पूर्वी जर्मनी की आर्थिक स्थिति, रियूनिफिकेशन के बाद पैदा हुई असमानता, युवाओं का पलायन, इमिग्रेशन को लेकर असंतोष, मुख्यधारा की पार्टियों से निराशा, वैश्वीकरण को लेकर सवाल और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी भावनाएं इस राजनीतिक बदलाव के अलग-अलग पहलू हैं.
आकाश पांडे