हिंदू-सिख गायब, हिजाबी महिलाओं को जगह नहीं? पाकिस्तानी ड्रामा शोज में नहीं दिखता असली कल्चर!

पाकिस्तानी ड्रामा इंडस्ट्री पर जरार खान और काशिफ अफ्रीदी ने सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि शोज में हिंदू-सिख, हिजाबी महिलाओं और क्षेत्रीय भाषाओं को सही जगह नहीं मिलती. जानिए पूरा विवाद.

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पाकिस्तानी ड्रामा की हकीकत क्या? (Photo: Screengrabs) पाकिस्तानी ड्रामा की हकीकत क्या? (Photo: Screengrabs)

आरती गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 28 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:30 AM IST

पाकिस्तानी ड्रामा शोज की दीवानगी सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं है. भारत में भी इन शोज को खूब देखा और पसंद किया जाता है. इनकी कहानियां, रोमांस और इमोशनल ट्विस्ट दर्शकों को बांधे रखते हैं. लेकिन पर्दे पर दिखने वाला पाकिस्तान क्या सच में वैसा ही है, जैसा वहां की असल जिंदगी है? 

इसी सवाल ने अब एक नई बहस छेड़ दी है. पाकिस्तानी एक्टर्स जरार खान और काशिफ अफ्रीदी ने अपने ही ड्रामा इंडस्ट्री की हकीकत पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि पाकिस्तानी शोज में देश की सांस्कृतिक विविधता, अलग-अलग भाषाओं और धार्मिक समुदायों को वो जगह नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं. 

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कहीं हिंदू, सिख और ईसाई परिवार गायब हैं, तो कहीं हिजाब पहनने वाली महिलाओं और क्षेत्रीय भाषाएं बोलने वालों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता. ऐसे में सवाल उठता है कि जब असल जिंदगी इतनी रंग-बिरंगी है, तो टीवी की दुनिया में हर रंग दिखाने से परहेज क्यों?

PAK इंडस्ट्री की खोली पोल!

जरार खान ने अपनी राय रखते हुए कहा कि- पाकिस्तान की ड्रामा इंडस्ट्री पाकिस्तान का रियल कल्चर बिल्कुल नहीं दिखाती है. आप जब सिनेमा भी जाते हैं तो पाक सरजमीं नेशनल एंथम बजता है, फिर फाइटर पायलट्स उड़ते और पहाड़ दिखते हैं. फिर क्रिश्चियन्स और सिख आते हैं हाथ जोड़कर जाते दिखते हैं. फिर हिंदू आते हैं जो पूजा कर रहे होते हैं, फिर वो दिखाते हैं कि पाकिस्तान कितनी विविधता रखता है. 

'लेकिन एक पाकिस्तानी ड्रामा दिखाओ जहां सिख, हिंदू दिखते हों. मैंने एक बार प्रोड्यूसर से बात भी की थी, हम एक ऐसा ड्रामा बनाते हैं जहां कराची का एक मोहल्ला हो, जहां सिख, हिंदू और ईसाई फैमिली रहती हो. आप ऐसा एक ड्रामा लिखें. ताकि उसे देखकर लोगों को सीख मिले हर कल्चर और रिलीजन अच्छा होता है. लेकिन प्रोड्यूसर ने मना कर दिया और कहा कि- वो कैमरा बैन कर देगा. हम कोई और इबादत नहीं दिखा सकते.'

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पाकिस्तानी ड्रामा का एक पोस्टर

हिंदू-सिख कहां हैं, क्षेत्रीय भाषाएं कहां?

जरार ने आगे कहा कि इसलिए मैं कहता हूं पाकिस्तानी कभी अपना कल्चर पूरी तरह नहीं दिखाते. बस उर्दू बोलने वाले घर दिखाते हैं. पाकिस्तान में 60 प्रतिशत पंजाबी बोलने वाले हैं, लेकिन ड्रामा में उर्दू में बात हो रही है. ऐसे ही न तो पश्तून, ना सिंधी भाषी दिखाते हैं. बोलने वाले न हो तो कैरिकेचर डाल देंगे जिसे बोलना ही नहीं आ रहा है.

काशिफ अफ्रीदी ने भी अपनी राय जोड़ी और कहा कि पाकिस्तान में अपना खुद के कल्चर और भाषा को भी ठीक से नहीं दिखाया जाता है. एक ड्रामा शो खाई था, उसमें सब कैरिकेचर की तरह हो बोल रहे थे. इसी के साथ उन्होंने कहा कि यहां पाकिस्तान से आने वाले एक्टर्स तक शामिल नहीं हैं. ज्यादातर सब गोरे हैं. 

एक्टर्स की इस बातचीत के वीडियो के कमेंट सेक्शन में भी लोगों ने अपनी राय दी और लिखा कि- पाकिस्तानी शोज में कभी हिजाबी महिला को लीड के तौर पर भी नहीं दिखाया जाता है. कोई साइड कैरेक्टर होगा नहीं तो होगा ही नहीं. वहीं एक और ने कहा कि फाइनली किसी ने तो इस मुद्दे पर रोशनी डाली. वरना कोई इस बारे में बात भी नहीं करता. एक और ने लिखा कि ये बलोचियों को भी शामिल नहीं करते. 
 
वहीं एक पाकिस्तान की डॉक्टर ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि मुझे एक बार एक ब्रांड शूट के लिए बुलाया गया था, उन्होंने मुझे मेरे इंस्टाग्राम के जरिए कॉन्टैक्ट किया था तो उन्हें पता था कि मैं हिजाबी महिला हूं. और मैं किसी प्रोग्राम के लिए भी अपना हिजाब नहीं उतारूंगी. लेकिन जब शूट होने लगा तो उनके हाईअर मैनेजमेंट ने मना कर दिया कि ये अपने आप को कुछ ज्यादा ही कवर करके रखती हैं. उसे कहो अपने कुछ बाल दिखाए, थोड़ा हिजाब को ढीला करे. तब मैंने उस TVC को मना कर दिया. 

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पाकिस्तानी ड्रामों की असली कहानी क्या

पाकिस्तानी ड्रामा इंडस्ट्री की लोकप्रियता बेशक आसमान छू रही हो, लेकिन इन कलाकारों की बातें पर्दे के पीछे की एक अलग कहानी बयां करती हैं. अगर किसी देश के शोज में उसकी भाषाओं, धर्मों और समुदायों को ही सही जगह नहीं मिलती, तो फिर उसकी असली पहचान दर्शकों तक कैसे पहुंचेगी? जरार खान और काशिफ अफ्रीदी की बातों के साथ हिजाब पहनने वाली महिला के शूटिंग अनुभव ने भी ये सवाल खड़ा किया है कि क्या पर्दे पर दिखने के लिए लोगों को अपनी पहचान से समझौता करना पड़ता है? 

आखिर सिनेमा और टीवी का काम सिर्फ खूबसूरत कहानियां दिखाना नहीं, बल्कि समाज की विविधता को भी जगह देना है. क्योंकि किसी देश की असली खूबसूरती सिर्फ उसकी इमारतों, पहाड़ों या जुबान में नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों में होती है, जो मिलकर उसकी पहचान बनाते हैं. और अगर पर्दे पर उन्हीं की जगह नहीं है, तो कहानी अधूरी ही रहेगी.

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