इमरान हाशमी पर भारी पड़ा आवारापन 2 का ये सीन, 20 साल पुराने सवाल का आखिर मिला जवाब

इस सीन की शुरुआत होती है, जब शिवम जेल से निकलने के बाद एक खुद को घायल दिखाकर एंबुलेंस से भागने में कामयाब हो जाता है. उसके पीछे थाई पुलिस के दो अधिकारी लगे हैं. कुछ देर बाद शिवम चारों तरफ से घिर जाता है. उसके पास भागने की कोई जगह नहीं बचती.

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आवारापन 2 बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई कर रही है. (Photo: Screengrab) आवारापन 2 बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई कर रही है. (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:06 PM IST

आवारापन-2 इमरान हाशमी के लिए गेम चेंजर साबित हुई है. बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से इतर इस फिल्म ने हाशमी के सिनेमा और उनकी स्टार इमेज को जिस तरह फिर से परिभाषित किया है, उसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फिल्म की असाधारण सफलता के पीछे कई वजहें हैं, लेकिन एक खास सीन सोशल मीडिया पर चर्चा में बना हुआ है और शायद यह सीन फिल्म से कहीं ज्यादा इमरान हाशमी की स्टारडम और 2007 में आई पहली फिल्म आवारापन से जुड़ी उस पुरानी याद के बारे में बताता है, जो आज भी उनके प्रशंसकों के मन में जिंदा है.

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यह सीन फिल्म के दूसरे हिस्से में आता है और अचानक दर्शकों को आवारापन-1 की दुनिया में वापस ले जाता है. यह इसलिए जरूरी है क्योंकि 2007 में रिलीज हुई पहली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भले ही नाकाम रही थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने कल्ट फिल्म का दर्जा हासिल कर लिया था. उस फिल्म के कई सीन इमरान हाशमी के प्रशंसकों की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो गए.

मूल फिल्म की तरह इस बार भी यह सीन भगवान और शिवम पंडित के बीच एक बातचीत का है या यूं कहें तो एक तरह के टकराव के इर्द-गिर्द बुना गया है. इमरान हाशमी का किरदार शिवम पंडित यहां फिर उसी सवाल के साथ खड़ा नजर आता है. ये सीन बेहद खूबसूरत है. कुछ मिनटों के लिए यह फिल्म को उसकी सामान्य कहानी से ऊपर उठा देता है.

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शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है. आवारापन-2 की कहानी भले ही हर जगह एक जैसी असरदार न हो, लेकिन यह सीन जस्टिफाई करता है कि दर्शक वापस आखिर किसके लिए आए हैं, जवाब है शिवम पंडित के लिए. उसके भीतर पल रहे दर्द के लिए और उस एहसास के लिए कि शायद कोई अदृश्य शक्ति अब भी उसके रास्ते को दिशा दे रही है.

इस सीन की शुरुआत होती है, जब शिवम जेल से निकलने के बाद एक खुद को घायल दिखाकर एंबुलेंस से भागने में कामयाब हो जाता है. उसके पीछे थाई पुलिस के दो अधिकारी लगे हैं. कुछ देर बाद शिवम चारों तरफ से घिर जाता है. उसके पास भागने की कोई जगह नहीं बचती. वह हाथ ऊपर कर देता है और पुलिसकर्मी उसकी तरफ बढ़ते चले आते हैं. तभी कुछ ऐसा होता है, जो लगभग चमत्कार जैसा लगता है.

लाल कपड़े पहने बौद्ध भिक्षुओं का एक समूह अचानक शिवम को चारों तरफ से घेर लेता है. शिवम की आंखें बंद हैं और उसके हाथ अब भी ऊपर उठे हुए हैं. जब वह आंखें खोलता है, तो उसे एहसास होता है कि ये बौद्ध भिक्षु उसे रोकने के लिए नहीं, बल्कि आगे बढ़ाने के लिए उसके चारों तरफ खड़े हैं. वे उसे आगे की ओर धकेलते हैं. शिवम चलता चलता जाता है. पहले सहज भाव से. फिर धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगता है कि यह महज संयोग नहीं है. शायद यह भगवान का उसे दिया हुआ संकेत है कि वह अकेला नहीं है. उसके सामने कोई रास्ता है, भले ही इस वक्त उसे यह दिखाई न दे कि वह रास्ता आखिर कहां जा रहा है. तभी संगीत तेज होने लगता है. धुन अपने चरम की ओर बढ़ती है और ये बोल सुनाई देते हैं-

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खुद को न यूं सता, उसको तू दे बुझा
चाहता यही आसमां
अब तेरे प्यार में, दिल के करार में
शामिल तू कर ले जहां.

और जैसे ही 'तेरा मेरा रिश्ता पुराना' बजना शुरू होता है, कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है. दूर भगवान बुद्ध की एक विशाल सुनहरी प्रतिमा दिखाई देती है. शिवम उसकी ओर देखता है और भिक्षुओं के साथ आगे बढ़ता रहता है. पुलिस से दूर और शायद अपनी नियति की ओर. यह दृश्य अपने आप में बेहद प्रभावशाली है लेकिन इसकी अहमियत तब और बढ़ जाती है, जब हमें याद आता है कि पहली आवारापन में 'तेरा मेरा रिश्ता पुराना' का क्या अर्थ था.

मूल फिल्म में यह गाना उस वक्त आता है, जब शिवम भिक्षुओं के बीच शरण लेता है. वे उसे प्रार्थना करना और किसी बड़ी, अदृश्य शक्ति के सामने सिर झुकाना सिखाते हैं लेकिन शिवम ऐसा किरदार नहीं है जो बिना सवाल किए भगवान पर भरोसा कर ले. भगवान के साथ उसका रिश्ता बेहद उलझा हुआ है. उसमें आस्था भी है, नाराजगी भी, उलझन भी और गहरा दर्द भी.

गाने के बोल सुनिए-

तेरा यकीन क्यों मैंने किया
नहीं तुझसे राह क्यों जुदा
मुझ पे ये जिंदगी करती रही सितम
तूने ही दी है पनाह
तेरा मेरा रिश्ता पुराना.

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यह किसी भक्ति गीत से ज्यादा भगवान के साथ एक इंसान की बातचीत जैसा लगता है. जैसे कोई ऐसा शख्स, जिसने जिंदगी से बहुत कुछ खोया है, अपने भगवान से जवाब मांग रहा हो और यही बात आवारापन 2 के उस दृश्य को इतना दिलचस्प बना देती है.

इस बार गाना शिवम से कहता है-

माना है टूटा तू
खुद से है छूटा तू
खुद को तू खुद से मिला
जख्मी परिंदा है
फिर भी तू जिंदा है
मान ले कहना मेरा.

पहली फिल्म का शिवम भगवान से सवाल कर रहा था. सीक्वल का शिवम जैसे उसी सवाल का जवाब सुन रहा है. शायद यही वजह है कि यह दृश्य अपनी कहानी से कहीं आगे निकल गया है. ऊपर से देखें तो यह एक स्टाइलिश एस्केप सीक्वेंस है. एक ऐसा हीरो जो पुलिस से बाल-बाल बचकर निकल जाता है लेकिन इसके भीतर एक ऐसी बातचीत छिपी है, जिसे पूरा होने में लगभग दो दशक लग गए.

इंटरनेट ने भी इस सीन को अपनी एक अलग कहानी दे दी है.लोगों के लिए ये भिक्षु जैसे भगवान के माध्यम बन जाते हैं, जो शिवम को खतरे से बाहर निकालकर उस रास्ते पर आगे बढ़ा रहे हैं, जिस पर शायद उसकी नियति ने उसे पहले से चलने के लिए चुना है.

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फिल्मकार का इरादा वास्तव में यही था या नहीं, शायद अब यह उतना मायने नहीं रखता क्योंकि सिनेमा की खूबसूरती ही यही है कि दर्शक पर्दे पर दिखाई गई कहानी से आगे जाकर अपने अर्थ तलाश लेते हैं और यह दृश्य बिल्कुल वही करता है. इसकी ताकत सिर्फ संगीत, इमरान हाशमी के अभिनय या कहानी में इसकी भूमिका से नहीं आती. इसकी असली ताकत उस अर्थ में है, जिसका यह दृश्य प्रतिनिधित्व करता है. यह आवारापन 2 को पहली फिल्म की भावनात्मक दुनिया से जोड़ता है, लेकिन उसकी नकल करके नहीं. यह संगीत को वापस लाता है, आध्यात्मिकता को वापस लाता है, अकेलेपन को वापस लाता है और सबसे बढ़कर शिवम के उस जटिल रिश्ते को फिर सामने रखता है, जो किसी ऐसी शक्ति से जुड़ा है जो उससे कहीं बड़ी है.

यह याद दिलाता है कि आवारापन अपनी थिएटर रिलीज के खत्म हो जाने के बाद भी दर्शकों के बीच क्यों जिंदा रही. पहली फिल्म को रिलीज के कई साल बाद अपना असली दर्शक वर्ग मिला. उसके गाने जिंदा रहे. शिवम का दर्द जिंदा रहा और सबसे बढ़कर, शिवम पंडित जिंदा रहा. अब लगभग 20 साल बाद वही किरदार फिर चल रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वह भगवान से यह नहीं पूछ रहा कि उसे अकेला क्यों छोड़ दिया गया, बल्कि शायद यह समझ रहा है कि वह कभी पूरी तरह अकेला था ही नहीं.

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शायद यही वजह है कि यह एक दृश्य पूरी फिल्म से भी बड़ा हो गया है क्योंकि नॉस्टैल्जिया तब सबसे ज्यादा असर करता है, जब वह आपको सिर्फ यह याद नहीं दिलाता कि आपको कभी क्या पसंद था, बल्कि उस एहसास को फिर से जीने का मौका देता है और अगर आवारापन 2 ने कुछ साबित किया है, तो वह यही है कि भगवान और शिवम पंडित के बीच शुरू हुई वह बातचीत कभी खत्म नहीं हुई थी.  कम से कम शिवम के लिए तो बिल्कुल नहीं.

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