नाना के जाने के बाद फिर देखिए ‘प्रतिघात’… समझ आ जाएगा, वो इतने बड़े एक्टर क्यों थे!

नाना पाटेकर की ‘प्रतिघात’ में भूमिका छोटी थी, लेकिन इसी किरदार में उनकी अलग तरह की एक्टिंग साफ नजर आती है. आगे ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों ने इस पहचान को और मजबूत किया. नाना की सबसे बड़ी खूबी यही रही कि वह किरदार के हिसाब से खुद को बदल लेते थे और स्क्रीन पर नाना नहीं, वही किरदार नजर आता था. यही वजह है कि उनके जाने के बाद भी उनके किरदार याद आते रहेंगे.

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फिल्म ‘प्रतिघात’ के एक सीन में नाना पाटेकर. (Credit: Ultra Video CD) फिल्म ‘प्रतिघात’ के एक सीन में नाना पाटेकर. (Credit: Ultra Video CD)

विश्व मोहन मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 08 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 12:56 PM IST

नाना पाटेकर चले गए. एक ऐसा अभिनेता, जिसके बारे में यह कहना मुश्किल था कि वह पर्दे पर अभिनय कर रहा है. वह जब सामने आते थे तो लगता था जैसे कोई किरदार नहीं, कोई जिंदा आदमी हमारे सामने खड़ा है. उनकी आवाज में गुस्सा होता था, आंखों में बेचैनी, चेहरे पर जिंदगी की खरोंच और खामोशी में भी एक पूरा संवाद.

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नाना को याद करने के लिए उनकी सबसे चर्चित फिल्मों की तरफ लौटना स्वाभाविक है ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’...

लेकिन नाना के अभिनय को समझने के लिए एक फिल्म और है, जिसे उनकी यात्रा के शुरुआती पड़ाव के तौर पर फिर से देखना चाहिए... और वह है ‘प्रतिघात’

छोटा रोल, नाना का विस्फोट

1987 में आई यह फिल्म उस दौर के हिंदी सिनेमा से कई मायनों में अलग थी. कहानी के केंद्र में सुजाता मेहता की लक्ष्मी थीं. सामने था राजनीति और अपराध का गठजोड़. और इसी कहानी में नाना पाटेकर थे- पूर्व पुलिसकर्मी करमवीर के किरदार में.

कितना दिलचस्प है कि आगे चलकर हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में शामिल होने वाले नाना यहां मुख्य नायक नहीं थे.फिर भी उनका किरदार याद रह जाता है. यही नाना की सबसे बड़ी ताकत थी. उन्हें बड़ा किरदार नहीं चाहिए था, वह छोटे किरदार को बड़ा बना देते थे.

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करमवीर कोई चमकदार किरदार नहीं था. वह एक टूटा हुआ आदमी था. एक ऐसा पूर्व पुलिसकर्मी, जिसकी जिंदगी अपराध और हिंसा की वजह से बिखर चुकी थी. उसकी पत्नी के साथ हुई भयावह घटना के बाद उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है.

नाना ने इस किरदार को सिर्फ ‘पागल पुलिसवाले’ के रूप में नहीं निभाया. उन्होंने उसके भीतर का दर्द पकड़ा. उसके गुस्से के पीछे छिपी बेबसी पकड़ी.उसकी बेचैनी के पीछे छिपी हार पकड़ी. और यही वह जगह थी, जहां नाना बाकी अभिनेताओं से अलग दिखाई देते थे.

वह किरदार को सजाते नहीं थे, उसकी खरोंच दिखाते थे. यही खूबी बाद में उनके लगभग हर यादगार किरदार में दिखाई दी.‘परिंदा’ का अन्ना हो या ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप नारायण तिलक. ‘अब तक छप्पन’ का साधु आगाशे हो या ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी.हर किरदार अलग था.

लेकिन हर किरदार में एक चीज समान थी- वह पूरी तरह जिंदा लगता था. नाना अपने किरदारों पर अपनी छाप नहीं लगाते थे. वह खुद किरदार की छाप में ढल जाते थे. यही वजह थी कि पर्दे पर नाना पाटेकर दिखाई नहीं देते थे.

करमवीर दिखाई देता था. अन्ना दिखाई देता था. प्रताप दिखाई देता था. साधु आगाशे दिखाई देता था. और यही किसी महान अभिनेता की सबसे बड़ी पहचान होती है. एक अभिनेता संवाद बोलता है. महान अभिनेता संवाद के पीछे छिपे आदमी को सामने ले आता है.

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करमवीर में छिपा था बड़ा नाना

‘प्रतिघात’ में भी यही दिखाई देता है. यह सिर्फ बदले की कहानी नहीं थी. यह उस दौर की राजनीति और अपराध के रिश्ते पर तीखी टिप्पणी थी. फिल्म में व्यवस्था की विफलता थी, सत्ता का डर था और उसके खिलाफ खड़ी होती एक महिला थी.

लक्ष्मी के साथ हिंसा होती है.व्यवस्था उसके साथ खड़ी नहीं होती. लेकिन वह टूटकर बैठ नहीं जाती. वह लड़ती है.अपने आसपास के लोगों को जोड़ती है. और अंततः उसी सत्ता को चुनौती देती है, जिसने उसे कुचलने की कोशिश की थी.

यानी ‘प्रतिघात’ अपने समय से आगे की फिल्म थी. लेकिन इस पूरी कहानी में करमवीर एक अलग तरह की त्रासदी लेकर आता है. लक्ष्मी व्यवस्था से लड़कर खड़ी होती है. करमवीर उसी व्यवस्था के भीतर रहकर टूट चुका आदमी है.

एक ने प्रतिरोध चुना. दूसरा टूट गया. और नाना ने इस टूटे हुए आदमी को इतनी सच्चाई से निभाया कि किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रह जाता है.

यहीं से नाना की अभिनय-क्रांति को समझा जा सकता है. उन्होंने हिंदी सिनेमा में यह साबित किया कि अभिनेता को हमेशा खूबसूरत दिखने, नायक जैसा बोलने या संवाद को प्रभावशाली अंदाज में पेश करने की जरूरत नहीं. कभी-कभी एक थका हुआ चेहरा, कांपती आवाज और बेचैन आंखें ज्यादा बड़ा अभिनय कर जाती हैं.

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नाना के अभिनय में यही कच्चापन था. वह चमकदार नहीं थे. वह सच्चे थे. शायद इसलिए उनकी आवाज को कोई दूसरा अभिनेता पूरी तरह दोहरा नहीं पाया. उनका गुस्सा कॉपी नहीं हो सका. उनकी खामोशी की नकल नहीं हो सकी. उनका संवाद बोलने का अंदाज किसी और का नहीं हो सका. क्योंकि नाना की असली ताकत संवाद नहीं थी.

संवाद से पहले की बेचैनी थी. यही वजह है कि उनके छोटे से छोटे दृश्य में भी एक कहानी दिखाई देती थी. और ‘प्रतिघात’ को आज फिर देखने की जरूरत इसलिए भी है कि इसमें नाना पाटेकर का वह रूप दिखाई देता है, जब वह अभी ‘नाना पाटेकर’ नहीं बने थे.

न कोई विशाल स्टारडम. न कोई सुपरहिट संवाद उनकी पहचान. न कोई ऐसा किरदार जिसके नाम से फिल्म बिके. सिर्फ अभिनय. और शायद यही सबसे खूबसूरत बात है. महान अभिनेता बनने से पहले ही उनके अभिनय में महानता दिखाई दे रही थी.

बाद में उन्हें बड़े किरदार मिले. बड़े संवाद मिले. बड़े पुरस्कार मिले. लोगों ने उनकी आवाज पहचानी.उनके गुस्से को पहचाना. उनकी हंसी को पहचाना. यहां तक कि उनकी खामोशी को भी पहचान लिया. लेकिन उस सफर का बीज बहुत पहले बोया जा चुका था.शायद ‘प्रतिघात’ में. करमवीर में.उस टूटे हुए पुलिसकर्मी में, जिसके भीतर गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के नीचे एक बहुत गहरा दर्द भी था.

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यही नाना थे.उन्होंने किरदार को अभिनेता से बड़ा बना दिया. इसलिए नाना पाटेकर को सिर्फ एक सफल अभिनेता कहना उनके साथ नाइंसाफी होगी. वह उन कलाकारों में थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा को यह सिखाया कि अभिनय का मतलब सिर्फ संवाद बोलना नहीं है.

कभी आंखें अभिनय करती हैं. कभी शरीर.कभी आवाज. और कभी सिर्फ खामोशी. नाना इन चारों भाषाओं के अभिनेता थे. उनके जाने के बाद उनकी फिल्में देखना सिर्फ पुरानी यादों में लौटना नहीं होगा. यह उस अभिनेता को फिर से समझने की कोशिश होगी, जिसने अपने किरदारों को अमर कर दिया.

जिसे निभाया, उसे अमर कर दिया

इसलिए नाना की श्रद्धांजलि में ‘क्रांतिवीर’ या ‘परिंदा’ के साथ एक बार ‘प्रतिघात’ भी चलनी चाहिए.

करमवीर को देखिए. उस युवा नाना को देखिए, जो अभी अपने महान सफर की शुरुआत में था. फिर सोचिए- आखिर यह अभिनेता इतना बड़ा कैसे बन गया? जवाब शायद उसी फिल्म में छिपा है. नाना बड़े इसलिए नहीं थे कि उन्हें बड़े किरदार मिले. नाना बड़े इसलिए थे कि उन्होंने जिस किरदार को छुआ, उसे बड़ा बना दिया. और शायद यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी जीत है.

चेहरा चला जाता है. आवाज चली जाती है. इंसान चला जाता है. लेकिन किरदार रह जाता है. नाना भी रहेंगे. करमवीर में. अन्ना में. प्रताप में. साधु आगाशे में. उदय शेट्टी में. और उन तमाम किरदारों में, जिन्हें उन्होंने सिर्फ निभाया नहीं- जिया था. इसीलिए नाना पाटेकर की फिल्मों को देखते हुए एक वक्त के बाद अभिनेता दिखाई देना बंद हो जाता है.

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सिर्फ किरदार बचता है. और जब किरदार बचा रहता है, तो अभिनेता कभी पूरी तरह जाता नहीं. नाना भी नहीं जाएंगे.

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