एक हाथ में परशुराम का फरसा, दूसरे में संविधान...राहुल गांधी के बर्थडे पर सामने आई इस तस्वीर का संदेश बड़ा है

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन के मौके पर बनारस के गंगा घाट पर यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया. इस दौरान भगवान परशुराम के अवतार में राहुल गांधी का पोस्टर सामने आया, जिसमें एक हाथ में फरसा और दूसरे हाथ में संविधान की कापी लिए हुए दिखाया गया है.

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राहुल गांधी के जन्मदिन पर गंगा में अभिषेक (Photo-PTI) राहुल गांधी के जन्मदिन पर गंगा में अभिषेक (Photo-PTI)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 19 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:06 AM IST

भारतीय सियासत में प्रतीकों का खेल हमेशा से गहरा और दूरगामी रहा है. कांग्रेस के नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन के अवसर पर पार्टी नेता और कांग्रेस जगह-जगह जश्न मना रहे हैं. इस मौके पर राहुल की एक तस्वीर सामने आई है, जिसमें उनके एक हाथ में भगवान परशुराम का फरसा तो दूसरे हाथ में भारत का संविधान है. 

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वाराणसी के गंगा घाट पर 'यूथ कांग्रेस' के कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का जन्मदिन मनाया. इस दौरान राहुल गांधी के भगवान परशुराम के अवतार वाले पोस्टर को दूध से अभिषेक किया.यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राहुल की इस तस्वीर के संदेश नहीं बल्कि एक बेहद सोची-समझी राजनीतिक रणनीति भी छिपी है. 

राहुल गांधी की भगवान परशुराम के अवतार वाली तस्वीर राजनीति के बदलते मिजाज, सामाजिक समीकरणों और नैरेटिव की जंग को बयां करती है. इस तस्वीर के जरिए सियासी संदेश देने की कवायद यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने की है.

परशुराम के अवतार में राहुल गांधी की तस्वीर

यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने बनारस के गंगा घाट पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का जन्मदिन को रीति-रिवाजों के साथ मनाया, जिसमें गंगा नदी में उनकी तस्वीर पर दूध चढ़ाने से लेकर केक काटने तक शामिल है. पोस्टर में राहुल गांधी को  भगवान परशुराम के अवतार में दिखाया गया है. तस्वीर में राहुल के एक हाथ में संविधान तो दूसरे हाथ में फरसा लिए हुए दिखा गया है. 

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— Press Trust of India (@PTI_News) June 19, 2026

 परशुराम के सहारे ब्राह्मण को साधने का दांव

भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं में भगवान परशुराम को न्याय, साहस और ब्राह्मण समाज के अस्मिता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. उनके हाथ का फरसा अत्याचारी राजाओं के खिलाफ कमजोरों की रक्षा और न्याय की स्थापना का शस्त्र रहा है. भगवान परशुराम को ब्राह्मण समाज से जोड़कर देखा जाता है.

राहुल गांधी को परशुराम के अवतार में पेश कर ब्राह्मण समाज को सियासी संदेश देने की कवायद की है. पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर उत्तर प्रदेश और हिंदी पट्टी के राज्यों में, ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच 'परशुराम' के प्रतीक को अपनाने की होड़ देखी गई है. 

राहुल गांधी के हाथ में फरसा दिखाकर कांग्रेस ने एक बड़ा सांस्कृतिक संदेश देने की कोशिश की है. यह तस्वीर दर्शाती है कि कांग्रेस बहुसंख्यक समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से खुद को अलग नहीं रख रही है. भाजपा के 'कट्टर हिंदुत्व' के मुकाबले कांग्रेस खुद को एक ऐसी समावेशी पार्टी के रूप में पेश करना चाहती है, जो सनातन परंपराओं का सम्मान करती है, लेकिन बिना किसी उन्माद के.

'संविधान की रक्षा' का मजबूत नैरेटिव

बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित भारत का संविधान आधुनिक लोकतंत्र में न्याय, समानता और अधिकारों का सबसे बड़ा कवच है. इस तस्वीर के माध्यम से राहुल गांधी को एक ऐसे आधुनिक नायक के रूप में पेश करने की कोशिश की गई है, जो सनातन परंपरा के मूल्यों (न्याय और संकल्प) को साथ लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों (संविधान) की रक्षा के लिए खड़ा है. यह संदेश देता है कि उनके लिए धर्म का वास्तविक अर्थ लोक-कल्याण और अधिकारों की रक्षा है, न कि विभाजन. 

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राहुल तस्वीर के दूसरे हाथ में भारतीय संविधान की प्रति है. 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के लिए 'संविधान बचाओ' का नारा गेम-चेंजर साबित हुआ था. राहुल गांधी ने अपनी लगभग हर रैली में संविधान की प्रति दिखाकर पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज को यह संदेश दिया था कि उनका हक और आरक्षण सिर्फ संविधान के सुरक्षित रहने पर ही सुरक्षित है.

राहुल गांधी ने चुनाव खत्म होने के बाद भी 'संविधान की रक्षा' का उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ है. नेता प्रतिपक्ष के रूप में वह खुद को देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के सबसे बड़े रक्षक के रूप में स्थापित करने में जुटे हैं.

हिंदुत्व के नैरेटिव का काउंटर प्लान
बीजेपी लंबे समय से कांग्रेस पर तुष्टिकरण और बहुसंख्यक विरोधी होने का आरोप लगाती रही है. कांग्रेस इस नैरेटिव को पूरी तरह से तोड़ने के लिए पिछले कुछ वर्षों से अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है. राहुल गांधी का खुद को 'जनेऊधारी हिंदू' बताना, केदारनाथ-महाकाल की यात्राएं करना और अब हाथ में परशुराम का फरसा थामना. इसी सिलसिले की एक कड़ी है.

भगवान परशुराम ब्राह्मण समाज के साथ-साथ हिंदू चेतना के एक बड़े प्रतीक हैं. उनके फरसे को हाथ में लेकर राहुल गांधी यह संदेश देना चाहते हैं कि सनातन संस्कृति और उसके नायक किसी एक राजनीतिक दल की जागीर नहीं हैं. बहुसंख्यक समाज को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वे अपनी धार्मिक जड़ों से उतने ही मजबूती से जुड़े हैं, जितने देश के संविधान से हैं.

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'मंडल और कमंडल' का अनूठा संतुलन
भारतीय राजनीति लंबे समय से मंडल बनाम कमंडल के होती रही है. इस वक्त 'मंडल' (पिछड़ा वर्ग और सामाजिक न्याय की राजनीति) और 'कमंडल' (धर्म और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति) के ध्रुवों के बीच बंटी रही है. यूथ कांग्रेस के द्वारा राहुल गांधी की तस्वीर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह इन दोनों ध्रुवों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करती है.

फरसा (कमंडल का प्रतीक) है.अगड़ी जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों को यह भरोसा दिलाता है कि कांग्रेस उनके सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान करती है.संविधान (मंडल का प्रतीक), दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है. यह तस्वीर एक नए सामाजिक समीकरण (का संकेत देती है, जहां अगड़े और पिछड़े वर्ग एक साथ एक मंच पर आ सकें.

आक्रामक तेवर और 'न्याय' का संदेश
भगवान परशुराम को शास्त्रों के साथ-साथ अस्त्रों का ज्ञाता भी माना जाता है. परशुराम अन्याय के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाने के लिए जाने जाते हैं. राहुल गांधी के हाथ में फरसा दिखाना उनके बदले हुए राजनीतिक तेवर को भी बयां करता है. अब वे एक रक्षात्मक नेता नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों पर फ्रंट-फुट पर आकर हमला करने वाले नेता प्रतिपक्ष हैं.

 संविधान के साथ न्याय की लड़ाई और फरसे के साथ अन्याय का संहार है, यह इस तस्वीर का केंद्रीय विचार है.राहुल गांधी के जन्मदिन पर सामने आई यह तस्वीर महज एक शुभकामना पोस्टर नहीं, बल्कि कांग्रेस के बदलते वैचारिक दृष्टिकोण का रोडमैप है. यह दिखाता है कि कांग्रेस अब भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के पिच पर बैकफुट पर खेलने के बजाय, अपने तरीके से सांस्कृतिक और संवैधानिक प्रतीकों का मिश्रण तैयार कर रही है.

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ऐसे में यह 'फरसा और संविधान' की जुगलबंदी भारतीय राजनीति की दिशा और दशा तय करने में कितनी प्रभावी होगी यह देखना बेहद होगा? 

 

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