पट्टी उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र के पूर्वी हिस्से में स्थित प्रतापगढ़ जिले का एक नगर पंचायत कस्बा और पट्टी तहसील का प्रशासनिक मुख्यालय है. प्रतापगढ़ सदर को जौनपुर और सुल्तानपुर से जोड़ने वाले क्षेत्रीय सड़क मार्गों के किनारे स्थित यह कस्बा आसपास के कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक, न्यायिक और वाणिज्यिक बाजार केंद्र के रूप में कार्य
करता है.
पट्टी के नाम पर एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है, जो 1957 से अस्तित्व में है. 1952 के पहले आम चुनावों में पट्टी का भौगोलिक क्षेत्र कई बहुसदस्यीय सीटों में विभाजित था. भारत निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में इन सीटों को मुख्य रूप से प्रतापगढ़ नॉर्थ वेस्ट-कम-पट्टी नॉर्थ वेस्ट, पट्टी साउथ और पट्टी ईस्ट के नाम से दर्ज किया गया था. 1956 के परिसीमन आदेश के तहत राज्यव्यापी पुनर्गठन के बाद इन अलग-अलग क्षेत्रों को मिलाकर पट्टी नाम का एक विधानसभा क्षेत्र बनाया गया. 1957 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसने पहली बार एक स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र के रूप में मतदान किया. उस समय यह दो विधायकों वाला विधानसभा क्षेत्र था. 1962 के चुनावों से पहले पूरे भारत में इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया था.
पट्टी प्रतापगढ़ लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन आदेश के बाद पट्टी विधानसभा क्षेत्र में पट्टी, कंधईप्रखर और मंगरौरा के कानूनगो सर्किल तथा आसपुर देवसरा कानूनगो सर्किल की निर्धारित ग्राम पंचायतों के साथ पट्टी नगर पंचायत शामिल है. इस क्षेत्र का स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है, जबकि शहरी हिस्सा काफी छोटा है.
पट्टी में विधानसभा क्षेत्र के गठन के बाद से अब तक 18 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 1987 का उपचुनाव भी शामिल है. शुरुआती दशकों में कांग्रेस का दबदबा रहा और उसने यह सीट सात बार जीती. वहीं भाजपा पांच बार इस सीट पर जीत हासिल कर चुकी है. कांग्रेस के पतन के साथ भाजपा का प्रभाव बढ़ा. कांग्रेस ने 1987 के बाद से यह सीट नहीं जीती है और उसका राजनीतिक आधार लगातार कमजोर हुआ है. समाजवादी पार्टी ने तीन बार यह सीट जीती है, जबकि भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी और जनता दल ने एक-एक बार इस पर कब्जा किया है.
2012 में समाजवादी पार्टी ने भाजपा से यह सीट छीन ली. सपा उम्मीदवार राम सिंह पटेल ने राजेंद्र प्रताप सिंह को केवल 156 वोटों के मामूली अंतर से हराया. राजेंद्र प्रताप सिंह ने 1996, 2002 और 2007 में लगातार तीन चुनाव जीते थे. 2017 में सिंह ने पटेल को 1,473 वोटों के अंतर से हराकर पिछली हार का बदला लिया. दोनों पुराने प्रतिद्वंद्वी 2022 में एक बार फिर आमने-सामने आए. इस बार राम सिंह पटेल ने करीबी मुकाबलों का सिलसिला तोड़ दिया. उन्हें 108,070 वोट मिले, जबकि भाजपा के राजेंद्र प्रताप सिंह को 86,019 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर 22,051 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
पट्टी विधानसभा क्षेत्र में मतदान का एक दिलचस्प पहलू यह है कि विधानसभा चुनावों में सबसे सफल दो दलों, कांग्रेस और भाजपा को लोकसभा चुनावों में संघर्ष करना पड़ा है. 2009 में बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस पर 5,885 वोटों की बढ़त बनाई थी, जबकि भाजपा पांचवें स्थान पर रही थी. 2014 में भाजपा की क्षेत्रीय सहयोगी अपना दल ने बहुजन समाज पार्टी पर 36,496 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में बहुजन समाज पार्टी, जिसने उस चुनाव में समाजवादी पार्टी के सहयोगी के रूप में चुनाव लड़ा था, भाजपा से 3,235 वोट आगे रही. समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ अपना गठबंधन समाप्त कर दिया और 2024 का चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ा. यह फैसला उसके लिए फायदेमंद रहा. प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शिवपाल सिंह पटेल को 102,985 वोट मिले, जबकि भाजपा के संगम लाल गुप्ता को 67,978 वोट मिले. इस तरह इस विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को 35,007 वोटों की बढ़त मिली.
पट्टी में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 325,531 से बढ़कर 2017 में 339,194 हो गई. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह संख्या 347,373 थी. 2022 में यह बढ़कर 366,960 हो गई और 2024 में 375,645 तक पहुंच गई. विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में कथित तौर पर 328,521 मतदाता दर्ज थे. यह संख्या 2024 के आंकड़े से 47,124 कम है, जो लगभग 12.54 प्रतिशत की कमी को दर्शाती है.
यहां मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत स्थिर रहा है. 2012 में यह 58.76 प्रतिशत और 2017 में 61.56 प्रतिशत था. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 56.75 प्रतिशत रह गया, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 60.69 प्रतिशत हो गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत फिर घटकर 54.91 प्रतिशत रह गया.
पट्टी हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 11.20 प्रतिशत होने का अनुमान है. 2011 की जनगणना पर आधारित विधानसभा क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जातियों की आबादी लगभग 20.94 प्रतिशत है. अन्य प्रमुख समुदायों में ब्राह्मण, ठाकुर, कुर्मी, यादव, मौर्य और अन्य पिछड़ा वर्ग के समूह शामिल हैं. कुर्मी और ब्राह्मण मतदाताओं को अक्सर इस क्षेत्र के प्रभावशाली समुदायों में गिना जाता है. वहीं पासी और जाटव सहित अनुसूचित जातियों के समुदाय भी मतदाता समूह का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. अनुमान के अनुसार, 97.74 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है, जबकि 2.26 प्रतिशत आबादी पट्टी कस्बे की नगरपालिका सीमा के भीतर रहती है. इससे इस विधानसभा क्षेत्र का ग्रामीण स्वरूप स्पष्ट होता है.
पट्टी का इतिहास अवध के पूर्वी हिस्से में मध्यकालीन और प्रारंभिक आधुनिक काल के दौरान कृषि विस्तार से जुड़ा है. पट्टी नाम की उत्पत्ति हिंदी के उस शब्द से हुई है, जिसका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से संयुक्त गांव की संपत्ति में भूमि की इकाई या हिस्सेदारी के लिए किया जाता था. इसका संबंध किसी वनस्पति की पत्ती से नहीं है. मुगल काल से पहले और मुगल शासन के दौरान इस क्षेत्र पर स्थानीय राजपूत सरदारों का शासन था. इनमें मुख्य रूप से बचगोटी और बिसेन वंश के सरदार शामिल थे, जो अवध के व्यापक प्रशासनिक नियंत्रण के तहत पट्टियों या भूमि के हिस्सों का प्रबंधन करते थे. 19वीं सदी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान, 1856 में अवध के विलय के बाद इस क्षेत्र को राजस्व वसूली सर्किल के रूप में प्रतापगढ़ जिले में शामिल कर लिया गया. 20वीं सदी में इसका प्रशासनिक महत्व बढ़ा और यह तहसील बना. इस तरह कृषि आधारित संपत्तियों के समूह से विकसित होकर यह क्षेत्रीय प्रशासनिक केंद्र बन गया.
यह विधानसभा क्षेत्र गंगा बेसिन के उपजाऊ मैदानी इलाके में स्थित है, जहां कृषि स्थानीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है. प्रतापगढ़ के व्यापक क्षेत्र में गेहूं, धान, दालें और तिलहन प्रमुख फसलें हैं. पट्टी आलू की खेती और पान उत्पादन के लिए भी जानी जाती है. हालांकि, यहां औद्योगिक आधार सीमित है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसरों की कमी के कारण अनेक युवा काम की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं. किसान बाजारों तक बेहतर पहुंच और अपनी उपज बेचने के लिए सुविधाएं चाहते हैं. रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं और सार्वजनिक सुविधाएं भी स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की मौजूदगी के बावजूद, लोगों ने इलाज के लिए प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय या जिले से बाहर जाने की जरूरत पड़ने की शिकायत की है. ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर सड़कें, जल निकासी, पेयजल और शैक्षिक सुविधाएं आज भी प्रमुख मांगों में शामिल हैं.
पट्टी सड़क मार्ग से प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर और आसपास के अन्य कस्बों से जुड़ा हुआ है. जिला मुख्यालय प्रतापगढ़ यहां से लगभग 35 किलोमीटर दूर है, जबकि प्रयागराज की दूरी सड़क मार्ग से करीब 78 किलोमीटर और लखनऊ की दूरी लगभग 187 किलोमीटर है. सुल्तानपुर तक भी सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है. प्रतापगढ़ जंक्शन, जिसे मां बेल्हा देवी धाम प्रतापगढ़ जंक्शन के नाम से भी जाना जाता है, इस क्षेत्र का प्रमुख रेलवे स्टेशन है. यह पट्टी कस्बे से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है.
पिछले सात प्रमुख चुनावों, जिनमें तीन विधानसभा चुनाव और चार लोकसभा चुनाव शामिल हैं, के दौरान पट्टी का चुनावी रिकॉर्ड बदलते राजनीतिक रुझानों को दर्शाता है. हालांकि, हाल के समय में समाजवादी पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत की है. पार्टी ने 2012 और 2022 के विधानसभा चुनाव जीते और 2024 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में बढ़त हासिल की. बहुजन समाज पार्टी ने दो चुनावों में बढ़त बनाई, जबकि भाजपा और उसकी सहयोगी अपना दल ने एक-एक चुनाव में बढ़त हासिल की.
हाल के चुनावी रुझान समाजवादी पार्टी के पक्ष में झुके हैं. पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़त बनाई. 2022 में उसकी बढ़त 9.94 प्रतिशत अंक थी, जो 2024 में बढ़कर 16.97 प्रतिशत अंक हो गई. इन दोनों चुनावों में भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा. 2024 की मतदाता सूची से 47,124 मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो लगभग 12.54 प्रतिशत की कमी है. यह संख्या पिछले दो चुनावों में समाजवादी पार्टी की बढ़त से अधिक है और सैद्धांतिक रूप से उसके लिए चुनौती पैदा कर सकती है.
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इसका 2027 के चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि किन क्षेत्रों और मतदाता समूहों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है. समाजवादी पार्टी 2027 के चुनाव में स्पष्ट बढ़त के साथ उतर रही है, लेकिन भाजपा की वापसी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. क्षेत्र में उसके संगठनात्मक आधार और मजबूत वापसी करने की क्षमता को देखते हुए मुकाबला दिलचस्प हो सकता है.
(अजय झा)